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पेशेवर संपादक और मालिक संपादक में बुनियादी अंतर है और वह रहेगा ही!


sanjay kumar singh
कबूलनामे पर प्रतिक्रिया… एएनआई की मालकिन स्मिता प्रकाश के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कथित इंटरव्यू और उसपर राहुल गांधी द्वारा उन्हें प्लायबल (लचीला या नर्म) कहे जाने के बाद एडिटर्स गिल्ड का बयान के बाद देश में पत्रकारिता और राजनीति की स्थिति लगभग साफ हो गई थी। मेरा मानना है कि उसके अलग-अलग पत्रकारों की बात छोड़ दें तो मीडिया और पत्रकारों के संगठनों की स्थिति बहुत साफ हो गई थी। उसपर बात करने को बहुत कुछ बचा नहीं था। लेकिन निजी रूप से पत्रकार इसपर हमेशा और बहुत कुछ बोल सकते हैं। मैं उम्मीद कर रहा था कि इसपर लोग अपने अनुभव बताएंगे। ऐसे ही अनुभवों में एक bhadas4media पर दिखा। शीर्षक है, एक वरिष्ठ पत्रकार का कबूलनामा- ‘हां, मैंने भी दो बार फिक्स्ड इंटरव्यू किए हैं!’
गुंजन सिन्हा ने इस कबूलनामा में दो घटनाओं का जिक्र किया है और कहा है कि इंटरव्यू या प्रेस कांफ्रेंस कवर करने के अलावा दूसरा विकल्प यही था कि कवर नहीं किया जाए, बहिष्कार किया जाए. लेकिन क्या वह उचित होता? इसके आगे उन्होंने लिखा है, …. ऐसे में अगर किसी भी पत्रकार को प्रधानमंत्री से बिना कोई प्रतिप्रश्न पूछे इंटरव्यू करने का मौका मिले तो उसे क्या करना चाहिए? क्या मना कर देना चाहिए? अगर आप को ये मौका मिलता तो आप क्या करते? मेरा उत्तर होगा मना कर देना चाहिए। मैं मना कर देता। लेकिन नौकरी कर रहा होता तो। अगर मैं स्मिता प्रकाश की स्थिति में होता तो सोचता …. और चूंकि मैं उनकी स्थिति नहीं जानता हूं इसलिए उसपर नहीं बोल रहा।
वैसे, पत्रकार के रूप में मेरा झुकाव ऐसे इंटरव्यू नहीं करने की तरफ ही होता। हो सकता है मेरा निर्णय गलत होता। पर इसीलिए मैं स्मिता प्रकाश नहीं हूं या उनकी जगह नहीं हूं। कायदे से संपादक का काम इंटरव्यू करना नहीं कराना है। संपादक को स्थितियों और शर्तों को भांपते हुए सर्वश्रेष्ठ को भेजना था। तब इंटरव्यू भी अच्छा होता (मुमकिन है, हो ही नहीं पाता) और संपादक पर प्लायबल होने का आरोप भी नहीं लगता। पेशेवर संपादक और मालिक संपादक में बुनियादी अंतर है और वह रहेगा ही। एक रिपोर्टर स्थितियों से समझौता कर ले पर संपादक क्यों करे और पेशेवर संपादक को करने की जरूरत भी नहीं है। जैसे कि गुंजन सिन्हा ने लिखा है, … देखिये कि स्मिता के इंटरव्यू का नतीजा क्या निकला? प्रधानमन्त्री की और फ़जीहत ही हुई. कई बार कितने भी लिहाफ डाल दीजिये, बगैर प्रति-प्रश्न किये भी सच सामने आ जाता है।
मेरा कहना है कि यह एएनआई या स्मिता प्रकाश की साख की कीमत पर हुई। इसलिए नहीं कि कोई दांव चल रहा था अनुमान लगा रहा था। सभी पक्षों को (लगभग) पता था कि क्या होगा। और वही हुआ। किसी ने अपेक्षा की होगी, किसी ने नहीं। पर कुछ भी अनअपेक्षित नहीं था। वरना कोशिश उससे भी की जा सकती थी जो रोड चुनौती देता है। पर उसका भी सबको पता था। उसकी जरूरत नहीं थी। सर्वश्रेष्ठ का चुनाव किया गया। ऐसे ही (अच्छा) संपादक भी अपने सर्वश्रेष्ठ रिपोर्टर का चुनाव करता है। करना चाहिए। वह अमूमन मना नहीं करता है और इसके बाद जो करता है वह अपेक्षित होता है। कुछ लोग नर्म के उलट सख्त होते ही हैं और वे उसी के लिए जाने जाते हैं। उनसे वैसा ही काम कहा जाता है।
इसलिए, स्मिता प्रकाश ने अगर किसी कर्मचारी को भेजा होता (मुझे नहीं पता उनके पास कोई इस योग्य है कि नहीं) इस आश्वासन (और कर्मचारी को निर्देश के साथ) के साथ कि इंटरव्यू वैसा ही होगा जैसा प्रधानमंत्री चाहते हैं। तो बात भी बन जाती लाठी भी नहीं टूटती। रिपोर्टर इंटरव्यू करके या बिना किए – कुछ अच्छा करता तो देश को एक अच्छा पत्रकार मिलता। जो कम से कम एक चीज सीखा हुआ होता। गुंजन सिन्हा ने आगे लिखा है, “मैं स्मिता को नहीं जानता। अपने इकबालिया बयान के बाद मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि जो फिक्स्ड परिस्थितियां मेरे सामने थीं उनमें मैंने गलत किया या सही। तब शायद मैं स्मिता के गलत या सही होने के बारे में अपनी राय बना सकूँ।” मेरा मानना है कि संपादक / मालिक को पता होता है, होना चाहिए कि कोई रिपोर्टर कैसा है। यही उसकी सफलता है। उसे अंदाजा होगा कि आप करेंगे इसलिए आपसे कहा गया। आपने किया क्योंकि आप ना नहीं कह सकते थे या ना कहने लायक स्थितियां नहीं थीं। (आगे आपने नौकरी की जरूरतों आदि के बारे में लिखा ही है)। इसके अलावा, यह भी संभव है कि आपको पता होगा कि मालिक कैसा है।
यह भी सही है कि जो लोग ना कहते वो इन्हीं स्थितियों में कहते हैं। उन्हें आप नहीं जानते उनका संपादक जानता है या कोई नहीं जानता हो। लेकिन वो आप नहीं होता – वो वही होता है। अगर नौकरी करने के लिए गलत करना सही है तो थोड़ा गलत करके ज्यादा कमा लेना कैसे गलत है। खासकर तब जब लाला कमा रहा हो। ऐसी नौकरी क्यों करना जिसमें गलत करने वाले लाला / संपादक की बात माननी पड़े। इसलिए, ऐसी बहस का अंत नहीं है। पहले सही को सही कहने वाले संपादक चाहिए उसके बाद ऐसे पत्रकार बनेंगे। लाला के सही और संपादक के सही में फर्क होता है। संपादक लाला बनना चाहे तब भी होगा। इसमें सूत्र वाक्य यही है, मैंने बचपन में ही समझ लिया था। रूसी मोदी ने कहा था, करप्शन इज अ मैटर बिटवीन मैन एंड हिज कनसाइंस (यानी भ्रष्टाचार व्यक्ति और उसके विवेक के बीच का मामला है)। यहां भ्रष्टाचार को टीआरपी बढ़ाने की कोशिशों या नौकरी बचाने की मजबूरी के रूप में देखिए। मुद्दा यही है कि आदमी उतना ही झुकता है जितना वह चाहता है। ऐसे ही लोगों में कुछ लचीले होते हैं कुछ सख्त। मैं गुंजन सिन्हा को निजी तौर पर नहीं जानता और मेरे मित्र नहीं है। स्मिता प्रकाश को भी नहीं।
लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक हैं. संजय सोशल मीडिया पर अपने बेबाक लेखन के लिए जाने जाते हैं
Sabhar- Bhadas4media.com

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