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भड़ासी रंग में रंगा होटल रेडिसन ब्लू…. पांच सितारे धरती पर लाकर लुढ़काए गए!

Yashwant Singh : पांच सितारा होटल रेडिशन ब्लू में जब भड़ास का जलसा शुरू हुआ तो घण्टे भर बाद ही मैंने प्रोग्राम को सफल हो जाने का साक्षात सबूत देख लिया था। वॉशरूम के सारे सिंक पान-गुटके की पीक के कारण जाम हो चुके थे। मल्लब कि जनता आ चुकी थी। पांच सितारे आसमान से धरती पर लाकर लुढ़काए जा चुके थे। इसे कहते हैं जमीन पर पांव टिकाए रखना।
भड़ास का आयोजन चाहें जहां हो, इसके चाहने वाले दूर दूर से चलकर न सिर्फ वहां पहुंचेंगे बल्कि अपने ओरिजनल तेवर के कारण उस जगह को अपने जैसा बना भी लेंगे। भड़ास ने कभी एलीटों को पसंद नहीं किया और न उन्हें तरजीह दी। अपन कभी एलीट न बनना चाहेंगे। देसजपने की खुशबू ही आत्मा की सेहत को जीवंत बनाए रख सकती है। एलीट लोग मरी आत्माओं वाले सचल लाश होते हैं। इसी कारण दिल्ली-मुम्बई में दिल नहीं पाए जाते।
देखें कार्यक्रम के शुरुआत होने और हर्बल फार्मिंग पर अपना प्रशिक्षण देने वाले डॉ. राजाराम त्रिपाठी का वीडियो….
जो लोग आयोजन में आ सके, उनका दिल से आभार।
जो लोग न आ सके, उनका दूर से आभार।
जै जै
 
Amrendra Rai : कल भड़ास के कार्यक्रम में मैं भी पहुंचा। भड़ास के बारे में किसी को बताने की जरूरत नहीं है। दस साल से पत्रकारों के दुख-सुख, आवा-जाही, संघर्ष-विमर्श में लगातार अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। मैं तो उसे देखकर ही पूरे पत्रकार जगत का हाल जान लेता हूं। यह भी कि आजकल कौन नौकरी देने की स्थिति में हैं और कौन सड़क पर संघर्ष करने के लिए आ गया। जैसे भड़ास परिचय का मोहताज नहीं, वैसे ही इसके संपादक यशवंत को भी किसी परिचय की जरूरत नहीं। मस्तमौला, फक्कड़, बिंदास। जेल गए तो वहां से भी कुछ ले आए। जाने मन जेल।
उनके भड़ासी रूप को बहुत लोग जानते हैं पर उनके लेखन को उतना महत्व नहीं मिला, जितना मिलना चाहिए। भाषा के धनी हैं, बेबाक लिखने वाले भी हैं। जितनी दूसरों की बजाते हैं उससे कम अपनी भी नहीं बजाते। उनके पुराने संस्मरण देखेंगे तो पाएंगे कि कैसे उनकी जागरण से नौकरी गई और कैसे जेल पहुंचे। सुलह-सफाई की बातें भी आप जान जाएंगे। भड़ास के दस साल पूरे होने पर मने जश्न में गंभीर बातें भी हुईं और खाना-गाना भी। आनंद आया। मुुझे इस कार्यक्रम को देखकर ऐसा लगा कि यशवंत अपने आप में एक संगठन हैं।
जैसे पत्रकारों के संगठन कार्यक्रम आयोजित करते हैं, वैसा कार्यक्रम इन्होंने अकेले दम पर कर डाला। जम्मू, हरियाणा, हिमाचल, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि सभी जगहों के भड़ासी पत्रकारों ने हिस्सा लिया। उत्तर प्रदेश से तो कहना ही क्या। इस कार्यक्रम में कई पुराने मित्रों से बहुत समय बाद भेंट हुई। अनेहस शास्वत लखनऊ से पधारे थे, तो कष्णभानु शिमला से। दिल्ली में रहने वालों से भी आजकल कहां भेंट हो पाती है। शंभू जी से भी करीब तीन साल बाद भेंट हुई तो संजय सिंह से तो शायद कई साल बाद। कुल मिलाकर बहुत मजा आया।
पूजन प्रियदर्शी : संदेह नहीं कि भड़ास की दसवीं वर्षगांठ के कार्यक्रम की रूपरेखा बनाते समय जिस मकसद को चिन्हित किया गया होगा, उसे वाकई हासिल कर लिया गया. राजाराम त्रिपाठी जी ने मौजूदा तंत्र को बेनकाब किया तो अशोक दास जी ने मीडिया को. दोनों ही व्यक्ति हैमिंग्वे की उस सोच पर खरे हैं कि मनुष्य को हराया जा सकता है, पर नष्ट नहीं किया जा सकता. तमाम वक्ताओं ने मुद्दे की बात की और भटके नहीं. अनिरूद्ध बहल ने पूर्व संपादकों की असली भूख यानि खबर तलाशने की भूख को चिन्हित किया तो दयानंद पांडेय ने उसकी तस्दीक की.
थानवी जी की चिंता मौजूदा दौर के अघोषित आपातकाल व इशारा सत्ता की खरीददार होने की प्रवृत्ति की ओर था, कि कैसे जनता के पैसे से वे मीडिया पर अंकुश लगाते हैं. ओम जी यहीं नहीं रुके. उऩ्होंने भविष्य का आईना भी दिखाया. बताया कि आईआईएमसी के रंगरूट अपने भगवानों (यानि जो आदर्श होते हैं उनके) को भी नहीं पहचानते हैं. मीडिया में भाषा के स्तर पर हो रहे खिलवाड़ पर भी उनकी चिंता रेखाकन योग्य थी. राजीव नयन बहुगुणा खुसरो का उदाहरण देकर साफ कह गये कि जन से जुड़ोगे तो शब्द स्वयं ही संचालित करेंगे.
गुरदीप सिंह सप्पल जी और क्षमा शर्मा जी ने भी बहुत मार्के की बातें कहीं. क़मर वहीद नक़वी जी ने हमारे जमीर को जगाने की कोशिश की. रामबहादुर राय साहब की राय बेमानी नहीं थी. उन्होंने बता दिया कि संगठन में ही शक्ति है. यशवंत सिंह जी आभारी हूं कि उन्होंने मुझे भड़ासी के रूप में चिन्हित किया और आमंत्रण दिया. रेडिसन हैंगओवर से मुक्ति मिले तो बस्तर की तैयारी करूं.
Ashok Anurag : भड़ास वो प्लेटफॉर्म है जहाँ हम सब ने सुख से कहीं ज़्यादा अपना दुःख अपनी परेशानी को यहाँ आपस में बांटा है साझा किया है। मीडिया जगत में ख़बर बनाते बनाते कब हम सब ख़बर बन जाते हैं पता ही नहीं चलता… और जब पता चलता है तो देर हो चुकी होती है। नौकरी अचानक एक झटके से चली जाए तो तकलीफ़ निश्चित होती है लेकिन एक समय के अंदर नौकरी छोड़ने का फ़रमान निकल जाए तो एक एक पल मुश्किल से बीतता है या शायद… बहुत मुश्किल होता है, मीडिया का ये पहलू भी आप में से ज़्यादा लोगो ने भोगा होगा, दरअसल हमारी चुप्पी हमें भीतर से तोड़ देती है, ऐसे में एक कन्धा हम ढूंढने लगते हैं जहाँ अपना दुःख कह सके, सुना सके, दिखा सकें …
भड़ास 4 मीडिया वो कन्धा है जहाँ हमने अपना दर्द साझा किया है, अपनी तकलीफ़ कह कर हल्का और सुकून महसूस किया है और बदले में भड़ास 4 मीडिया ने हमारी आवाज़ बनकर हमारे अधिकारों की लड़ाई को न सिर्फ़ बल दिया बल्कि हमारी आवाज़ मैनेजमेंट तक पहुँचाने की हर संभव कोशिश की है।
किसी भी संस्थान या मैनेजमेंट टीम से अधिकार प्राप्त कर लेना यक़ीनन बहुत मुश्किल काम है, भड़ास 4 मीडिया के यशवंत भाई मुश्किल से मुश्किल हालातों से कैसे लड़ना है ये जानते हैं और समय समय पर बताते भी रहे हैं, आज के वर्तमान हालत और हालात में स्वावलंबी बन कर भी सम्मान के साथ कैसे जिया जाए ये मन्त्र भी यशवंत जी हम सब की कान में फूंकते रहे हैं, आपने भड़ास 4 मीडिया में अक्सर इन्हें बाबा के नाम से भी सम्बोधित करते देखा और पढ़ा भी होगा। यशवंत जी का यही फक्कड़ अंदाज़ इन्हें भीड़ से अलग पहचान दिलाता है।
वक़्त बदलता गया और कभी कभी ऐसा भी होता है जब आपके टेबल पर काम आना बंद हो जाता है, एक दिन, दो दिन, दस दिन और फिर …… आपको मान लेना चाहिए कि इस संस्थान को अब आपकी ज़रुरत नहीं है, जब कभी भी ऐसा लगे तो अपना बस्ता उठाइये और बाहर निकल जाइये कभी वापस नहीं आने के लिए… कोई इस्तीफ़ा नहीं, पैसे रख लेगा रख ले, शायद यही कारण था की यशवंत भाई किसी लॉबी में नहीं रहे,
भड़ास 4 मीडिया के इस आयोजन पर अज्ञेय के शब्दों में यशवंत भाई के लिए इतना ही कहना चाहूंगा-
ठीक है दोस्त मैंने लहर चुनी
तुमने पगडण्डी
तुम अपनी राह पर सुख से तो हो
जानते तो हो कि कहाँ हो
-अशोक अनुराग
वरिष्ठ पत्रकार यशवंत सिंह, अमरेंद्र राय, पूजन प्रियदर्शी और अशोक अनुराग की फेसबुक वॉल से.
Sabhar- Bhadas4media.com