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ऋण चुकाना ही पड़ता है…..


*अनसुलझे रहस्य*
आज से करीब 40-45 साल पूर्व की एक घटित घटना है। मकराणा की एक धर्मशाला में पति पत्नी अपने छोटे से नन्हे-मुन्ने के साथ टिके। कच्ची धर्मशाला थी। दीवालों में दरारें पड़ गई थी। ऊपर पतरे थे। आसपास में खुला जंगल जैसा माहौल था। पति-पत्नी अपने छोटे से बच्चे को प्रांगण में बिठाकर कुछ काम से बाहर गये। वापस आकर देखते हैं तो बच्चे के सामने एक बड़ा फणीधर नाग कुण्डली मारकर फन उठाये बैठा है। यह भयंकर दृश्य देखकर दोनों हक्के बक्के रह गये। बेटा मिट्टी की मुट्ठी भर-भरकर नाग की फन पर फेंक रहा है और नाग हर बार झुक-झुककर सहे जा रहा है। माँ चीख उठी… बाप चिल्लायाः ‘बचाओ….. बचाओ हमारे लाडले को बचाओ।’ लोगों की भीड़ हो गई। उसमें एक निशानेबाज था। ऊँटलारी पर बोझा ढोने का धन्धा करता था। वह बोलाः “मैं निशाना तो मारूँ, सर्प को ही खत्म करूँगा लेकिन निशाना चूक जाऊँ और बच्चे को लग जाय तो मैं जिम्मेदार नहीं। आप लोग बोलो तो मैं कोशिश करूँ।” पुत्र के आगे विषधर बैठा है। ऐसे प्रसंग पर कौन-सी माँ इन्कार करेगी ? वह सहमत हो गई और बोली “भाई ! साँप को मारने की कोशिश करो। गलती से बच्चे को चोट लग जायगी तो हम कुछ नहीं कहेंगे।” ऊँटवाले ने निशाना मारा। साँप जख्मी होकर गिर पड़ा मूर्छित हो गया। लोगों ने सोचा कि साँप मर गया। उसको उठाकर बाड़ में फेंक दिया। रात हुई वह ऊँटवाला उसी धर्मशाला में अपनी ऊँटगाड़ी पर सो गया। पिछली रात की ठण्डी हवा चली। मूर्छित साँप सचेतन हो गया और आकर ऊँटवाले को पैर में डसकर चला गया। सुबह में लोग देखते हैं तो वह मरा हुआ पड़ा था। दैवयोग से सर्पविद्या जाननेवाला एक आदमी वहाँ ठहरा हुआ था। वह बोलाः “साँप को यहाँ बुलाकर जहर को वापस खिंचवाने की विद्या मैं जानता हूँ। यहाँ कोई आठ-दस साल का निर्दोष बच्चा हो तो उसके चित्त में साँप के सूक्ष्म शरीर को बुला दूँ और वार्तालाप करा दूँ।” मकराणा गाँव में से आठ दस साल का बच्चा लाया गया। उसने उस बच्चे में साँप के जीव को बुलाया। उससे पूछा गयाः “इस ऊँटवाले को तू ने काटा है ?” ” हाँ. ” “इस बेचारे को क्यों काटा ?” बच्चे के द्वारा वह साँप बोलने लगाः “मैं निर्दोष था। मैंने उसका कुछ बिगाड़ा नहीं था। उसने मुझे निशाना बनाया तो मैं क्यों उसका बदला न लूँ ?” “वह बच्चा तुम पर मिट्टी डाल रहा था उसको तुमने कुछ नहीं किया !” “बच्चा तो मेरा तीन जन्म पहले का लेनदार है। तीन जन्म पहले में भी मनुष्य था, वह भी मनुष्य था। मैंने उससे तीनसौ रूपये लिये थे लेकिन वापस दे नहीं पाया। अभी तो देने की क्षमता भी नहीं है। ऐसी भद्दी योनियों में भटकना पड़ रहा है। संयोगवश वह सामने आ गया तो मैं अपना फन झुका-झुकाकर उससे माफी ले रहा था। उसकी आत्मा जागृत हुई तो धूल की मुट्ठियाँ फेंक-फेंककर मुझे फटकार रहा था कि लानत है तुझे ! कर्जा नहीं चुका सका…..।” उसकी यह फटकार सहते-सहते मैं अपना ऋण अदा कर रहा था। हमारे लेन देने के बीच टपकनेवाला यह कौन होता है ? मैंने उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ा था फिर भी उसने मुझे मार गिराया। मैंने इसका बदला लिया।” सर्पविद्या जानने वाले ने साँप को समझायाः “देखो, तुम हमारा इतना कहना मानो, उसका जहर खींच लो।” “मैं तुम्हारा कहना मानूँ तो तुम मेरा कहना मानो। मेरी तो वैर लेने की योनि है। और कुछ नहीं तो नहीं सही मुझे यह ऊँटवाला पाँचसौ रूपये देवे तो अभी इसका जहर खींच लूँ। इस बच्चे से तीन जन्म पूर्व तीन सौ रूपये मिले थे। दो जन्म और बीत गये उसके सूद के दौ सौ मिलाकर कुल पाँच सौ रूपये लौटाने हैं।” किसी सज्जन ने पाँच सौ रूपये उस बच्चे के माँ बाप को दे दिये। साँप का जीव वापस अपनी देह में गया, वहाँ से सरकता हुआ मरे हुए ऊँटवाले के पास आया और जहर वापस खींच लिया। ऊँटवाला जिन्दा हो गया। यह बिल्कुल घटित घटना है। इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है। ‘कल्याण’ मासिक में यह घटना छपी थी। इस कथा से स्पष्ट होती है कि इतना व्यर्थ खर्च नहीं करना चाहिए ताकि सिर पर कर्जा चढ़ाकर मरना पड़े और वापस चुकाने के लिए फन झुकानी पड़े, मिट्टी से फटकार सहना पड़े। जब तक आत्मज्ञान नहीं होता तब तक कर्मों का ऋणानुबन्ध चुकाना ही पड़ता है। अतः निष्काम कर्म करके ईश्वर को सन्तुष्ट करें। अपने आत्मा परमात्मा का अनुभव करके यहीं पर, इसी जन्म में शीघ्र ही मुक्ति को प्राप्त करें।
साभार प्राप्त पत्रिका कल्याण
*JD*

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