कभी-कभी दिल करता है, पत्रकारिता की ये डिग्री फाड़ कर फेक दूं...



Kavish Aziz Lenin : कभी कभी दिल करता है डिग्री फाड़ के फेक दूं...  पता नहीं, जर्नलिज्म में ही डिग्री की वैल्यू नहीं है या फिर और भी फील्ड में ये हाल है... जब बिना डिग्री के आदमी जर्नलिस्ट बन सकता है तो प्रोफेशनल एजुकेशन के नाम पर सभी एजुकेशनल इंस्टीट्यूट को मास कॉम की क्लासेज बंद कर देना चाहिए... हम स्क्रिप्ट लिखना सीखते हैं, फोटोग्राफी सीखते है, voice over देना सीखते हैं, masthead से लेकर slug तक की जानकारी सीख कर आते है, tripod उठाना, लगाना, आर्टिकल लिखना ये सब कुछ सीखने के लिए ढाई तीन लाख रुपये के साथ साथ ज़िन्दगी के 3 साल खर्च करते हैं और हाथ लगता है बाबा जी का ठुल्लू...
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अब कमज़ोर नहीं, गिर चुका है। यहां डिग्री लेकर नौकरी करने वालों की ज़रूरत नहीं है. किसी भी आम आदमी को जिसको लिखना पढ़ना भी न आता हो, 5000 रुपये देकर काम कराइये. अखबार के पन्ने यूँ ही भरवाईये, इक्का दुक्का पढ़े लिखों को रखिये ताकि करेक्शन कर सकें... कितने पढ़े लिखे पत्रकार हैं जिनकी मान्यता है, उसकी काउंटिंग भी कराइये... पुराने लोगों की कोई बात नहीं क्योंकि तब ये डिग्री हर जगह दी भी नहीं जाती थी लेकिन आज के दौर में जब जर्नलिस्ट बनने के लिए आपको क्लासेज लेना जरूरी हो चुका है, ऐसे में इन डिग्री धारकों को नज़रंदाज़ करना गलत है...  पत्रकारों के पकौड़े बेचने के दिन करीब आ रहे..
फोटो जर्नलिस्ट कविश अज़ीज़ लेनिन की एफबी वॉल से
Sabhar- Bhadas4media.com
कभी-कभी दिल करता है, पत्रकारिता की ये डिग्री फाड़ कर फेक दूं... कभी-कभी दिल करता है, पत्रकारिता की ये डिग्री फाड़ कर फेक दूं... Reviewed by Sushil Gangwar on February 19, 2018 Rating: 5

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