जर्नलिस्ट को एक्टिविस्ट नहीं होना चाहिए- हरवीर सिंह, संपादक, आउटलुक हिंदी


अभिषेक मेहरोत्रा
डेप्युटी एडिटर
एक्सचेंज4मीडिया समूह ।।
आज के दौर में जहां बड़ी संख्या में पत्रकारों ने पत्रकारिता के साथ-साथ एक्टिविज्म को जोड़कर कई तरह की मुहिमें चला रखी है। ऐसे में तमाम बार पत्रकारिता भी सवालों के घेरे में आ जाती है और तब यह बड़ा सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पत्रकार को एक्टिविस्ट होना चाहिए? ये एक ऐसा प्रश्न है जिस पर अनेक संपादकगण घुमा-फिराकर जवाब देते हैं। पर जब हमने ये सवाल हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिका आउटलुक के संपादक हरवीर सिंह से पूछा, तो उनका स्पष्ट कहना है कि जर्नलिस्ट को कभी भी एक्टिविस्ट नहीं होना चाहिए। इसके पीछे उनका तर्क है कि जब  कोई पत्रकार किसी मुहिम को आगे बढ़ाने का संकल्प ले लेता है, तो वे उसका पक्षकार बन जाता है और पक्षकार बनकर किसी मुद्दे पर काम करना पत्रकारिता के सिद्धांत के अनुरूप नहीं है। किसी एक मुद्दे के पक्षकार के तौर पर पत्रकारिता के मंच का प्रयोग करना गलत ही है।
देश के कई बड़े अखबारों जैसे अमर उजाला, बिजनेस भास्कर आदि में उच्च पदों पर आसीन रह चुके हरवीर मानते हैं कि प्रिंट मीडिया का एक दमदार वजूद है, जो भारत जैसे देश में अभी लगातार बढ़ता रहेगा। वे कहते है कि हाल ही में आए रीडरशिप सर्वे ने पत्रकारों के बीच पाठकों की रुचि और सोच को लेकर बने परशेप्शन को जिस तरह तोड़ा है, वे प्रिंट मीडिया के बढ़ती साख का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि जिस तरह पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग ये मान रहा था कि आज के टीवी-डिजिटल के दौर में प्रिंट मीडिया पिछड़ रहा है, ये सोच गलत साबित हुई। उनका कहना है कि चाहे प्रिंट हो या टीवी, रेडियो हो या वेब जर्नलिज्म, हर माध्यम दूसरे माध्यम के लिए कॉम्पलिमेंटरी है न कि कॉम्पटेटिव। क्योंकि कभी भी कोई एक माध्यम पाठक या दर्शक के लिए पूर्ण नहीं होता है।
वे कहते है कि पत्रिकाओं की रीडरशिप तेजी से इसलिए बढ़ रही है क्योंकि आज भी टीवी या अखबार आपको खबर ही देते हैं, ऐसे में किसी भी विषय का विश्लेषणात्मक विवरण आप मैगजीन की स्टोरीज से ही समझते हैं। पत्रिकाएं ही किसी अहम मुद्दे पर 10-15 पृष्ठों की कवर स्टोरी कर पाठक को विषय का एटूजेड समझा पाती है। मैगजीन किसी भी विषय को 360 डिग्री अप्रोच के साथ प्रस्तुत करने की ताकत रखती है।
आईआरएस 2017 तो ये बता रहा है कि पाठकों की भाषा हिंदी है, पर माना जाता है कि सरकार की भाषा आज भी अंग्रेजी ही है। इस पर सहमत होते हुए वे मानते हैं कि कई विषयों पर अभी भी हिंदी पत्रकारों की अंग्रेजी जर्नलिज्म पर ही निर्भरता है। कई विषयों के एक्सपर्ट्स अंग्रेजी भाषा के ही जानकार है। पर अब ऐसे में ये हिंदी प्रफेशनल्स का ये दायित्व है कि वे इस दृष्टिकोण का खात्मा करें। उनका तर्क है कि मौजूदा सरकार हिंदी को प्रोत्साहित कर रही है, ऐसे में ये हिंदी संपादकों की जिम्मेदारी है कि वे कंटेंट की गुणवत्ता में बड़ा सुधार करें ताकि सरकार के नीतिगत फैसलों में हिंदी मीडिया भी अहम भूमिका निभा सकें।
सोशल मीडिया के इस दौर में फेक न्यूज की बढ़ती संख्या पर चिंतित हरवीर सिंह कहते हैं कि ये एक बहुत बड़ी चुनौती है। और आज मीडिया को इस पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि मीडिया की पूंजी उसकी विश्वसनीयता है और फेक न्यूज आपकी क्रेडिबिलिटी पर ऐसी चोट लगा रही है, जो आपके काम पर ही सवाल उठा रहा है। वे कहते हैं कि अब स्पीड न्यूज की जगह सही न्यूज पर फोकस करना ज्यादा जरूरी है।
आज जिस तरह पत्रकारों के बीच लगातार विवाद, ट्विटर वार और खेमेबाजी हो रही है, उस पर दुखी मन से वे कहते है कि ये बहुत ही अफसोसजनक है कि आज पत्रकारों के बीच डिविजन की बात लगातार सुनने को मिल रही है। वे कहते हैं कि जर्नलिज्म किसी एक व्यक्ति का काम नहीं, ये संस्थान का काम है। पर जिस तरह आज कुछ बड़े पत्रकारों ने अपनी एक खास तरह की इमेज गढ़ना शुरू किया है, वे बहुत ही खतरनाक ट्रेंड है। क्या राष्ट्रवादी है या क्या गैरराष्ट्रवादी, ये तय करने का अधिकार मीडिया को नहीं है। इस देश के संविधान और कानून के पास ये अधिकार है, ऐसे में मीडिया ट्रायल से बचना चाहिए। वे मानते हैं कि टीवी मीडिया के कुछ पत्रकार आज एक ब्रैंड बन गए हैं और खेमों में बंट गए है, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। जिस तरह वे विचार को खबर बनाकर प्रस्तुत कर रहे हैं, उससे मीडिया की क्रेडिबिलिटी कम हो रही है। किसी को टारगेट करके खबर बनाना हम पत्रकारों का काम नहीं है।
Sabhar- Samachar4media.com
जर्नलिस्ट को एक्टिविस्ट नहीं होना चाहिए- हरवीर सिंह, संपादक, आउटलुक हिंदी जर्नलिस्ट को एक्टिविस्ट नहीं होना चाहिए- हरवीर सिंह, संपादक, आउटलुक हिंदी Reviewed by Sushil Gangwar on January 23, 2018 Rating: 5

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