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Tuesday, 18 April 2017

जाने-माने फिल्म पत्रकार और अपने किस्म के अदभुत इंसान ब्रजेश्वर मदान नहीं रहे

Prabhat Ranjan : अचानक बहुत दुखी और अकेला महसूस कर रहा हूँ. आज मैंने अचानक वेबसाईट जानकीपुल.कॉम पर एक कमेन्ट देखा. कमेन्ट कल शाम का था. बस एक लाइन लिखी थी- brajeshwar madan is no more! कमेन्ट आदित्य मदान का था, जो उनका भतीजा है. पढ़कर सन्न रह गया. हालाँकि बरसों से उनसे कोई संपर्क नहीं था. आखिरी बार जब उनसे बात हुई थी तो लकवे के कारण उनके मुंह से आवाज नहीं निकल पा रही थी. उनको उस तरह से बोलते देख मैं इतना डर गया कि मैंने फिर कभी उनसे बात करने की कोशिश भी नहीं की. लेकिन मन में यह संतोष था कि वे जीवित हैं. लेकिन इस कमेन्ट को पढने के बाद वह जाता रहा.
(ये तस्वीरें कई बरस पहले मदान साहब की बीमारी के बाद स्वास्थ्य लाभ की है.)
उनके जाने से ज्यादा इस बात का दुःख है कि वे इस तरह से गए. फिल्मों पर उनके जैसा सम्मोहक लेखन करने वाला लेखक नहीं था. फिल्म लेखन के लिए सबसे पहले जिस हिंदी लेखक को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था वे ब्रजेश्वर मदान ही थे. उनकी कहानियों का भी अपना मिजाज था और 80 के दशक तक हर प्रमुख संचयन में उनकी कहानियां आती रहीं. धीरे धीरे वे खुद को भूलने लगे और हम हिंदी वाले उनको. मेरे उनके बीच इतना कुछ निजी था कि अब याद करने का भी मन नहीं कर रहा. बस इतना ही कि मेरे लेखक बनने में नेपथ्य से उनकी भूमिका बहुत बड़ी थी.
मुझे अपनी पहली कहानी 'जानकी पुल' के लिए 'सहारा समय कथा सम्मान' मिला था. सब यही समझते रहे कि उस ज्यूरी में मनोहर श्याम जोशी थे इसलिए मुझे वह पुरस्कार मिला. आज मैं इस सच को स्वीकार करना चाहता हूँ कि मदान साहब ने अपने बूते वह पुरस्कार मुझे दिलवाया था.
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कहीं भी हों आपको लगता है सर पर एक साया तो है. लेकिन अब मैं उम्र के उस दौर में पहुँच रहा हूँ जब सर से एक एक कर साये उठते जा रहे हैं.
अंतिम प्रणाम मदान साहब!
जानकीपुल डाट काम के संपादक प्रभात रंजन की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं...
Gopeshwar Singh ब्रजेश्वर मदान की समीक्षाएं पढ़कर मैं बड़ा हुआ| वे जिसे अच्छा कहते, वही फिल्म मैं अपने छात्र जीवन में देखता था| उन्हें मेरी श्रधांजलि!
Urmilesh Urmil बेहद तकलीफ हुई सुनकर। मदान जी से अनेक मुलाकातें हैं, खासकर 1982-85के दौर में। प्रतिभाशाली लेखक को सलाम और श्रद्धांजलि।
Dayanand Pandey ब्रजेश्वर मदान सब के अजीज थे , उन के बहुत से मुरीद थे , मैं भी उन के मुरीदों में हूं । मेरी कहानियों पर उन्हों ने ख़ूब लिखा है । बाद के दिनों में उन्हों ने कवितायेँ भी ख़ूब लिखीं । अपनी पत्नी के निधन पर लिखी कविता में जिस तरह दो पल्लों वाले दरवाजे का रुपक उन्हों ने रचा है वह दुर्लभ है । उन की बहुत सी यादें मन में जीवित हैं । उन की कहानियां , उन की कविताएं , उन के फ़िल्मी लेख बहुत याद आते हैं । पर जो उन का सब से चटक रंग है , वह है उन के अनथक संघर्ष का । जैसे फ़िल्मी ग्लैमर में किसी एक्स्ट्रा का संघर्ष हो । हिंदी में उस कठिन समय में फ्रीलांसिंग करना पहाड़ तोड़ना ही था , अब भी है । पर वह यह पहाड़ बड़े मन से तोड़ते रहे । उन से 1981 में पहली बार दरियागंज , नई दिल्ली में मिलना हुआ था । फिर कुछ बरस पहले आख़िरी बार राष्ट्रीय सहारा , नोएडा कार्यालय में । उन के झूठ बोलने और उन के सच के तमाम कहे अनकहे किस्से हैं , जिन को अभी याद करने का कोई सबब नहीं है । उन का लेखन , उन की सरलता उन का बहुत कुछ ढक लेती है । उन का दुःख भी । नि:संतान होना उन का सब से बड़ा दुःख था । नया घर बनवाने के बाद पत्नी का जाना उन्हें बुरी तरह तोड़ गया था । तब दो पल्ले के दरवाजे में एक पल्ला चला गया था । अब दूसरा पल्ला भी चला गया । उन का जाना दुःख तो देता है पर उन्हें दुःख से , बीमारी से मुक्ति मिली , यह सोच कर संतोष भी होता है । विनम्र श्रद्धांजलि !
Sanjay Swatantra कहानी और फिल्म लेखन में एक ऐसा नाम, जो हमेशा याद किया जाएगा। मदान जी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।
Vir Vinod Chhabra सत्तर के दशक में जब कभी दिल्ली जाना होता था तो ब्रजेश्वर मदान से मुलाक़ात ज़रूर होती थी। तब वो चांदनी चौक के भागीरथ पैलेस से प्रकाशित होने वाली एक फ़िल्मी पत्रिका (नाम याद नहीं आ रहा है) में सहायक संपादक होते थे। इसके एडिटर राजकेसरी थे। हम उनसे शिकायत करते थे कि फलां मैगज़ीन वाला पारिश्रमिक नहीं दे रहा है। वो एक फ़ोन खटखटाते और हमें पैसे मिल जाते थे। बहुत बढ़िया किस्सा-गो, लेखक थे और उससे बड़े शानदार मानुस।
मुझे अत्यंत दुःख हुआ उनके निधन की खबर सुन कर।
अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि।
Vinod Anupam ओह, हिंदी फिल्म समीक्षा से परिचित कराने वाले थे,मदान साहब, उनके रहने का अहसास भर ताकत देता था, हार्दिक श्रद्धांजलि
Swapnil Srivastava उनसे एक दो मुलाकाते है। दिल्ली के हिंदी समाज ने उनकी कोई खोज खबर नहीं ली और हम जैसे लोग दूर से उनके बारे में नहीं जान पाये। यह दुखद है।
Jai Narayan Prasad मैं भी ब्रजेश्वर मदान जी को अच्छी तरह जानता था। सिनेमा की समझ उनके लेखन से आई और बढ़ी थी। उनके जाने का अफसोस तो कभी न खत्म होने वाला अफसोस है। क्या उनके बाल-बच्चे नहीं है? आपके जवाब के इंतजार में?
Vimalendu Vimalendu बहुत दुखद खबर है। उनके अनेक आलेख पढ़े हैं। फिल्मों पर लिखने की समझ उन्हें पढ़ते हुए ही बनी है। नमन मदान साहब को।
Manoj Kumar दुखद | हम हिन्दी के पाठकों को ब्रजेश्वर मदन, विनोद भारद्वाज, प्रयाग शुक्ल जैसे लेखकों ने ही फ़िल्म पर होने वाले (और संभव) विमर्श से अवगत करवाया| श्रध्दांजलि |
Naresh Sharma It is really shocking news.........despite my many efforts could not trace him..........Prabhat Ranjan...will connect you via mail box......
Astbhuja Shukla विस्मरण और कृतघ्नता हिन्दी में स्थायी भाव बन रहे हैं विनम्र श्रद्धांजलि
Pushp Ranjan " मौत का एक दिन मुअय्यन है, नींद क्यों रात भर नहीं आती.".
ग़ालिब ने इन शब्दों में ज़िन्दगी का फलसफा लिख डाला था.
ब्रजेश्वर मदान जी की मृत्यु, और उससे पहले उनके लकवाग्रस्त हो जाने वाली बात सचमुच उदास कर देने वाली है.
Mahendra Sharma दुखद। बहुत प्यारे इन्सान थे, मदान जी। उनकी स्मृति को नमन।
Vinit Utpal सर, आपने ही मुझे पहली बार राष्ट्रीय सहारा के ऑफिस में उनसे मिलवाया था. तब से उनका स्नेह बना रहा. नमन.
Rajeev Mittal मदान जी से मिलना नहीं हुआ कभी..पर लेखन से हमेशा परिचित रहा..दुःख यही है आज..कि ऐसे लोग चुपके से निकलते जा रहे हैं..

Sabhar- Bhadas4media.com

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