पिताजी कहते हैं, मजाक नहीं है सफल कॉमेडियन होना- जवेद जाफरी

मेरी दादी के एक शेर को जीवनमूल्य की तरह अपनाते हुए मेरे पिताजी (जगदीप) ने सफलता की एक लंबी यात्रा तय की है। जिसे कहते हैं न, शुन्य से शिखर तक। वह शेर था-“वो मंजिल क्या जो आसानी से तय हो। वो राही क्या जो थककर बैठ जाए।” उन्होंने कई बार अपनी कहानी हमें सुनाई है। वे बंटवारे के बाद मुंबई आए थे। वहां सब कुछ तबाह हो गया था। पिताजी के एक भाई मुंबई (तब बांबे) में रहते थे।

मुश्किल भरे दिन थे। मेरी दादा ने यतीमखाने में काम किया। पिताजी ने टीन की फैक्ट्री में काम किया। पतंगें बनाई। उन मुश्किल भरे दिनों में एक दिन पिताजी दादी के साथ पैदल कहीं जा रहे थे, कि भयानक आंधी आई और टीन का एक टुकड़ा पिताजी के पैरों पर आकर लगा। खून बहने लगा।

पिताजी रोने लगे। तब उनकी उम्र सात-आठ साल रही होगी। मां ने साड़ी के टुकड़े से खून का बहना रोका। पिताजी ने कहा कि मां अब रूक जाते हैं, बाद में आगे जाएंगे। तब मेरी दादी यानी पिताजी की मां ने कहा था–“वो मंजिल क्या जो आसानी से तय हो। वो राही क्या जो थककर बैठ जाए।”

इसके बाद शायद पिताजी थककर नहीं बैठे कभी। वे एक दिन लगभग नौ साल की उम्र में टीन का डब्बा बना रहे थे कि एक आदमी औया और पूछा-“फिल्मों में काम करोगे?” पिताजी आवाक!-“पूछा ये फिल्म क्या होता है? क्या करना है? ” उस आदमी ने कहा,”एक्ट करना है । तीन रुपए मिलेंगे।”

पिताजी ने कहा, “तीन रुपए मिलेंगे, तो अभी चलो।” वह महान फिल्मकार बीआर चोपड़ा साहब की फिल्म थी-‘अफसाना।’ढेर सारे बच्चों का रोल था। शूटिंग के दौरान एक उर्दू डॉयलॉग बोलना था। यश चोपड़ा साहब भी सेट पर थे। बोले, “कौन बोलेगा। किसकी उर्दू अच्छी है।” पिताजी ने अपने बगल के बच्चे से पूछा कि बोलेंगे तो क्या होगा। बच्चा बोला,”तीन के छह हो जाएंगे।”

पिताजी ने हाथ खड़े कर दिए और कहा –मैं बोलूंगा? बात जम गई। पिताजी की गाड़ी चल निकली। इसके बाद उन्हें एक और फिल्म मिली-‘धोबी डॉक्टर।’ उसमें पिताजी लोगों को रूलाने वाली भूमिका मे थे। उसे देखकर बीमल राय साहब ने कहा-“मुझे यह लड़का चाहिए। 300 रुपए दूंगा।” और इस तरह पिताजी 3 रुपए से 300 रुपए पर थे और ‘दो बीघा जमीन’ जैसे महान फिल्म में पहुंचे।

वहीं शूटिंग के दौरान पिताजी ने बिमल राय साहब से पूछा कि आपने तो मुझे एक ऐसी भूमिका में दखा है, ज सबको रूलाता है, फिर दो बीघा जमीन में एक हास्य भूमिका के लिए क्यों चुन लिया? तब बिमल राय साहब ने कहा था-“देखो जगदीप, जो बहुत रूला सकता है, वही अच्छा हंसा सकता है। तुम हंसा सकते हो।”

इसके बाद पिताजी एक हास्य अभिनेता के सफर पर लगातार आगे बढ़ते रहे। न किसी की नकल की, न कभी किसी की आलोचना।

पिताजी के साथ ढेर सारी यादें जुड़ी हुई हैं। हालांकि जब मैं युवा था तो पिताजी के साथ अच्छे संबंध नहीं थे। एक दूरी सी बन गई थी। लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ, मैंने अपने पिता की इज्जत करना सीखा। उनके संघर्ष को याद करता हूं तो आज मुझे ताकत मिलती है।

वे हमेशा मानते रहे कि कर्म ही पूजा है। उन्हें कभी निर्माता का समय बर्बाद करना पसंद नहीं था। वे तब भी फिल्म के काम को देखते थे, जब शॉट के लिए उनकी जरूरत नहीं होती थी’।

जब मैंने भी फिल्मों में एंट्री ली और कुछ एक हास्य किरदारों की ओर मुड़ा तो पिताजी ने समझाया था-“ देखो जावेद,एक सफल कॉमेडियन होना कोई मजाक की बात नहीं है। लोगों को हंसाना बहुत मुश्किल काम है। आजकल के दर्शक बहुत समझदार हैं। आप उन्हें हल्का-फुल्का तमाशा दिखा के बेवकूफ नहीं बना सकते। ”

वे हमेशा इंडस्ट्री में एक कॉमेडियन के रूप में अपने स्थान से खुश दिखे। होड़ करने की आदत नहीं थी उनकी। एक सफल कॉमेडियन बनने के बाद कॉमेडियन के अलावा कोई और रोल करके किसी तरह का एक्स्पेरिमेंट नहीं किया उन्होंने। वे कहते रहे-“ क्योंकि दर्शक मुझे पुराने जगदीप के रूप में ही देखते हैं और वे मुझे विलन या किसी दूसरे रोल में अपना नहीं पाएंगे। कुछ नया करने के लिए अब वक्त गुजर चुका है।”

एक सफल पारी खेली उन्होंने। हमेशा खुश रहे। हां, दादी के इंतकाल के दिन मेरे कंधे पर सर रखकर फूट-फूट कर रोए थे वे। शूटिंग पर थे। मैं ही बताने गया था। जानता था कि यह खबर पिताजी पर क्या कर गुजरेगी। खूब समझाया था कि जाना तो सबको है। वे रोते रहे, सिर्फ रोते रहे। लेकिन आज भी वे दादी के उस शेर को दिल से लगाए रहते हैं। उनसे हमने बहुत सीखा। और सबसे बड़ी बात तो यही सीखी कि मजाक नहीं है सफल कॉमेडियन होना।

http://manoranjantoday.com/yaadein/dad-said-its-not-easy-to-be-a-successful-comedian/
पिताजी कहते हैं, मजाक नहीं है सफल कॉमेडियन होना- जवेद जाफरी पिताजी कहते हैं, मजाक नहीं है सफल कॉमेडियन होना- जवेद जाफरी Reviewed by Sushil Gangwar on December 13, 2016 Rating: 5

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