Top Ad 728x90

  • Sakshatkar.com - Sakshatkar.org तक अगर Film TV or Media की कोई सूचना, जानकारी पहुंचाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. आप मेल के जरिए कोई जानकारी भेजने के लिए mediapr75@gmail.com का सहारा ले सकते हैं.

Tuesday, 10 May 2016

सिनेमा मे सेंसर की जरुरत हमने ही पैदा की है :- मिहिर भुट्टा



केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के वर्तमान सदस्य मिहिर भुट्टा से सिनेमा शोधार्थी

मनीष कुमार जैसल की बातचीत

अभियक्ति की आज़ादी का मामला इन दिनों अपने चरम है और हमेशा से ही

अभिव्यक्ति के लिए नागरिक सत्ता से लड़ते आए हैं । साहित्य के अलावा

सिनेमाई अभिव्यक्ति पर भी लगाम लगाने का चलन भारत की गुलामी के दिनों

से चलता आया हैं । वर्तमान में चलचित्रों पर बने कानून तो आज़ाद भारत के है

पर 21वीं सदी के हिसाब से काफी पुराने महसूस होते है । खुद सिनेमा से जुड़े

लोग सेंसरशिप जैसी व्यवस्था को नकारते है ।

फ़िल्मकार मुकेश भट्ट,अपनी फिल्म के सेंसर से खफा सरकार के रवैये पर भी

सवाल उठाते हैं.और कहते है "सरकार बदलने के साथ ही सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष

बदल जाते हैं. सरकार का ही कोई नुमाइंदा कुर्सी पर बैठता है और फिर शुरू

होता है नया खेल. सिनेमा वाले सबसे आसान निशाना होते हैं तो पहले हमला

वहीं निर्माता दिवाकर बनर्जी भी यह मानते है कि हमे सेंसरशिप कानून की

समीक्षा करने की जरूरत है । सरकार या नौकर शाही द्वारा मनमाने ढंग से

अपने उद्देश्यों कि पूर्ति के लिए सेंसर बोर्ड का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए

। फिल्म निर्माता होमी अदजानिया एक समझदार और बेहतर सेंसरशिप

विकसित करने कि जरूरत की बात कहते है । अपनी खुद की फिल्मों मे

सेंसरशिप के चलते लगने वाली अटकलो से जूझते फ़िल्मकार अनुराग कश्यप

इन्टरनेट युग मे सेंसरशिप को बेकार मानते है । कश्यप कहते है यहा कोई आदर्श

दुनिया नहीं है जहां हम हर तरह की सेंसरशिप के अधीन हो । सेंसर बोर्ड की

भूमिका को सीमित करना इस दिशा मे सबसे बेहतर कदम होगा ।

सेंसरशिप को लेकर रोज नए नए प्रयोग होते दिख रहे है फिल्म मे सूचना

प्रसारण मंत्रालय द्वारा फ़िल्मकार श्याम बेनेगल की अध्यक्षता मे एक कमेटी

बनाई गयी जो जल्द ही सेंसरशिप के प्रसार तथा उनकी नीतियों पर अपनी बात

सेंसरशिप के नैतिक मानदंड तथा हिन्दी सिनेमा विषय को लेकर मैंने सेंसर बोर्ड

के वर्तमान सदस्य श्री मिहिर भुट्टा जी से संपर्क किया और और सेंसरशिप के

संदर्भ में बोर्ड की गतिविधियों को लंबी चर्चा की । श्री मिहिर भुट्टा जी लेखक

और निर्देशक हैं इन्होने चाणक्य, महाभारत, रज़िया सुल्तान, जैसे टीवी सीरियल

में सराहनीय और महत्वपूर्ण योगदान दिया । मिहिर जी से मेरी मुलाक़ात

सपनों के शहर मुंबई में हुई । सड़कों पर हमेशा रेड लाइट जलने वाले इस शहर

के ट्रैफिक में मैं भी फ़सा और मिहिर जी से मिलने में थोड़ी देर हुई हालांकि

उन्होने मेरा इंतजार किया इसके लिए उनका धन्यवाद...... पेश है उनसे

बातचीत के मुख्य अंश :-- -- -- -- --

1. आप मिटेश पटेल के साथ प्रधानमंत्री मोदी जी पर कोई फिल्म बना रहे हैं

? क्या यह सच है ?

मितेश पटेश एक दम झूठा आदमी हैं, इसकी बातों को मैं सिरे से नकारता

2. आप सेंसर बोर्ड के सदस्य है इन दिनों सेंसरबोर्ड बोर्ड की गतिविधियों पर

आपकी क्या टिप्पणी हैं ?

सबसे पहले तो हमने सोचा हैं और हमारे राज्य मंत्री जी की ओर से आश्वासन

भी मिला है, हम लोग सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेशन बोर्ड कहलाने की ओर जाएंगे ।

हम अमेरिकन और ब्रिटिश मे से किसी एक सिस्टम को उठाएंगे । दोनों काफी

हद तक समान है । हम भी 17+ 18+ इत्यादि वर्ग के लिए प्रमाणीकरण की

व्यवस्था करने की ओर अग्रसर हैं ।

3. आपको क्या लगता है कि सिनेमा मे सेंसर की जरूरत हैं ?

हिंदुस्तान मे हर चीज पर सेंसर की जरुरत हमने ही पैदा कर दी हैं । हम इतनी

बेवकूफ प्रजा है कि सेंसरशिप नहीं करेंगे तो मार काट पर उतर आएंगे । आप

देखिये थियेटर मे तो सेंसरशिप नहीं हैं तो अमेरिकन प्ले को देखिये मार्डननिटी

के नाम पर क्या क्या दिखा देते हैं ।

4. ऐसे मे तो आप अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का पूरी तरह हनन कर रहे हैं ?

देखिये 2-3 बातें हैं एक तो अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता मेरे दृष्टिकोण से अमर्यादित

नहीं हो सकती है या तो मर्यादा हम खुद समझे या फिर सरकार जो कर रही है

ठीक हैं । दूसरा आप देखिये हमारे देश कि स्थिति थोड़ी सोचनीय हैं। हमारे देश

मे बस्ती बहुत ज्यादा हैं, अनपढ़ लोग बहत हैं, सिर्फ अपना साइन करके निकल

जाने वाले,10वीं आठवीं तक पढ़ने वाले लोगो को पढे लिखे नहीं कहेंगे । अलग

अलग धर्म अलग अलग भाषा अलग अलग राज्य के होते हुए अगर हमारे यहाँ

सेंसरशिप या मर्यादा नहीं लगाई गयी बहुत जल्द खुनमारकी तक बात पहुच

जाएगी ऐसा मेरा मानना हैं । जो कि हो रहा हैं एवरि डे ।

सबसे पहले तो एक विचार जो चला था कला के लिए कला उस विचार से मैं

बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं रखता हूँ । मुझे लगता हैं आप अपनी कला बेचने

निकलते हो समाज को ध्यान मे रखकर अपनी कला को तैयार करना पड़ेगा ।

हालांकि फिलहाल में हमारा बोर्ड बहुत ज्यादा सकारात्मक नहीं हैं इसे

सर्टिफिकेशन बोर्ड बनाने कि तरफ जल्द से जल्द प्रयास किया जाना चाहिए ।

क्यो अभी हमारे पास 4 ही तो कटेगरी हैं उसमे से ua का तो कोई मतलब ही

नहीं हैं । इसी पर एक बात और कहना चाहूँगा कि सर्टिफिकेशन की व्यवस्था

बढ़ा लेने से भी ग्रामीण भारत मे कौन जाकर यह देखने वाला हैं कि कौन 17+ हैं

या 18+ । फिर भी सर्टिफिकेशन हो तो उसे वर्गीकृत किया जा सकता हैं कि कि

फिल्म मे क्या हैं । कौन देखे ।

अभी क्या हैं कि अ सर्टिफिकेट वाली फिल्म बहुत वाइलेंट बहुत सेक्सुयल अभद्र

भाषा की भी हो सकती हैं पता नहीं चलता आपको । इसीलिए कैटेगरी बढ़ाना

जरूरी हैं । मैं कहूँ तो सेंसरशिप शब्द बहुत बुरा हैं लेकिन उसके पीछे जो आशय

हैं वो उतना बुरा नहीं हैं । ऐसा मेरा मानना हैं ।

5. अगर जरूरी हैं सेंसरशिप तो मानदंड क्या होने चाहिये ?

इसके मानदंड क्या होने चाहिए .... यह सवाल तो काफी पेंचीदा हैं। सबसे पहले

तो हमे यह सोचना पड़ेगा कि हमारा देश अनपढ़ देश हैं, दूसरा डायवर्सिटी बहुत

ज्यादा हैं । डायवर्सिटी मे अभी जो मुद्दा धर्म भाषा को छिड़ा हैं [कोंकोक्सन]

चला हैं इसमे कहीं न कहीं बात हिंसात्मकता तक न पहुँच जाये, समाज पूरी

तरह टूट न जाए, इससे निपटने के लिए इस प्रकार का मानदंड रखना जरूरी है

। आप कोशिश करे कि सेक्सुयल कंटेन्ट , वायलेंट कंटेन्ट बच्चे न देखे । ऐसा मानते

हैं .... प्राब्लम तब पैदा होती हैं इयब किस खास समुदाय के बारे मे कुछ कहा

गया हू उनको हार्ट किये जाने वाली बात फिल्म मे की गयी हो तो उसके मापदंड

अलग बनने पड़ेंगे । सिर्फ इससे नहीं चलेगा कि बच्चे इसे देख पाये न या देख पाये

। इस पर बोर्ड बातें कर रहा हैं पिछले दिनों इन्ही मुद्दों को लेकर बड़ी बोर्ड

मीटिंग आयोजित हुई थी हालांकि मैं यू एस गया हुआ था तो अटेण्ड नहीं कर

6. अब तक जो मानदंड अपनाए जाते रहे हैं क्या आप उनसे संतुष्ट है ?

नहीं... बिलकुल नहीं । ऐसा कोई ठोस आधार ही सिनेमेटोग्राफ एक्ट मे बनाया

ही नहीं गया जिससे संतुष्ट हुआ जा सकें । सब लोग अपना ही चलाने मे आमादा

देखिये हर साल पूरे भारत में करीब 13000 यूनिट्स देखे जाते हैं जिनमे फिल्में

हो, प्रोमोस हो विज्ञापन हो वृत्तचित्र हो, इन्हे 25 आदमी का बोर्ड तो देख नहीं

सकता तो सरकार व चेयरमैन ने सिस्टम ये बनाया कि एड्वाइजरी बोर्ड मेम्बर

कि नियुक्ति हो। हालांकि इनमे कोई सदस्य की सीमा निर्धारित नहीं हैं । और तो

और ये कोई सिनेमा कि फील्ड से जुड़े हुए भी मेम्बर भी नहीं होते है तो वो लोग

अपने हिसाब से ही फिल्मों के प्रमाण पत्र का निर्धारण करते हैं । वो सिर्फ एक्ट

को ही ध्यान मे रखकर जो समझ आता है निर्णय लेते है । कभी साला शब्द भी

फिल्म से निकलवाते है वही भ म च वाली गालियां भी नहीं निकलवाते । तो वो

उनके हिसाब से चलता रहता है । हो सकता है इन सब मामलों मे कभी कोई

करप्शन भी रहा हो हालांकि मेरे सामने तो हुआ नहीं ।

7. वर्तमान सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष निर्मित फिल्मों में भी इसी तरह के शब्दों का

प्रयोग आम हुआ करता था । और वही उन्होने फिलहाल मे 31 शब्दों कि

लिस्ट जारी की है जिनहे फिल्मों मे बैन किया जाना प्रस्तावित किया है ।

हा हा हा ..... बहुत ही अच्छा सवाल है । देखिये होता ये है कि मार्केट फोरसेस

हमेशा चलते रहते है । अगर आपकी फिल्म मे सपोज एक आइटम नंबर दिखा

और फिल्म चल पड़ी तो मैं जब अपने 5 करोड़ या अधिक लगा कर फिल्म

बनाऊँगा तो 1 आइटम नंबर डालने कि कोशिश तो जरूर करूंगा । हमारे यहा

तो ये भी कहा जाता है कि हिट फिल्म का कुत्ता भी हिट होता है उसको ले आओ

उसी तरह आइटम नंबर का भी कांसेप्ट है । वही काम पहलाज जी ने अपने

समय मे किया होगा । और यह भी सच है कि जो काम आज पहलाज जी कर रहे

है वो कम उन दिनों के सेंसर बोर्ड ने किया होता तो पहलाज जी ऐसी फिल्में

कभी नहीं बना पाते । और यह कहना तो बिलकुल जायज़ भी नहीं लगता कि

पहलाज जी ने किया तो अब वो क्यो बैन कर रहे है ।

8. आने वाले दिनों मे सेंसर बोर्ड की क्या नयी योजनाएँ है

एक तो सिंप्लीसिटी लाने कि कोशिश, सेंसर बोर्ड की जगह सर्टिफिकेशन बोर्ड

कहलाने कि ओर बढ़ रहे है । स्पीड लाने कि कोशिश जैसे अभी बोर्ड थियेटर

किराए मे लेकर फिल्मों का परीक्षण करता हैं उसे इन्टरनेट से अपलोड

डाउनलोड कर कही भी कभी भी देखकर उसे एक दिन के अंदर प्रमाणित किए

जाने की भी योजना है । प्रोड्यूसर के साथ वीडियो कान्फ्रेंसिंग करने कि भी

योजना बना रहे है । कुल मिलकर इन्शोर्ट प्रोद्योगिकी का ज्यादा इस्तेमाल किए

जाने कि योजनाएँ है ।

9. फिल्म प्रमाणित होने के बाद क्या आपको लगता है कि आपने दर्शक की

अंतिम रेखा खींच दी । सपोज किसी फिल्म को वयस्कों के लिए प्रमाण पत्र

दिया गया तो क्या गारंटी है कि उसे सिर्फ वयस्क ही देखेगा । क्योकि इसी

देश मे यू ट्यूब जैसे अन्य माध्यमों मे भी नई फिल्मों का मिल जाना आम है

देखिये मैं आपको यही बताने कि कोशिश कर राहा हूँ कि हमारी बस्ती बहुत बढ़

गयी है । फिल्में बहुत बढ़ गयी है और ये जो सेंसर बोर्ड और एड्वाइजारि बोर्ड

इनके लिए बहुत छोटा पड़ रहा है । प्रमाणपत्र देने से आगे का काम सेंसर बोर्ड

कर नहीं सकता है हालांकि बोर्ड मेम्बर को एक कार्ड दिया जाता है कि आप

काही भी किसी भी थियेटर मे जाके वो फिल्म देख सकते है ताकि आपको पता

चले कि आपने ओ सीन काटा है वो फिल्म से काटा है या नहीं । हालांकि यह

थियरि बेस्द है प्रकटिकली इसे करने का साहस सेंसर बोर्ड ने अभी नहीं लिया है

10. आपके सहयोगी बोर्ड सदस्य श्री चन्द्र प्रकाश द्विवेदी की फिल्म

मुहल्ला अस्सी के बिना रिलीज हुए अन्य माध्यमों मे उपलब्ध होने की

घटना पर आप क्या कहना चाहेंगे ।

अभी यह फिल्म सेंसर बोर्ड के सामने आई ही नहीं इसके अलावा मैं कुछ नहीं कह

11. सेंसर बोर्ड का वर्तमान रवैया अगर देखा जाएँ तो क्या यह कहना

गलत होगा कि फिल्म कि कहानी भी इन्ही मानदंडों को देख कर लिखी

जाएंगी इसमे समाज का सच और अभिव्यक्ति की आजादी कहाँ तक

समय बदल चुका है पहले फिल्में मनोरंजन और शिक्षा का काम दोनों साथ करती

थी पर आज समाज का सच दिखाने का जिम्मा अन्य माध्यमों ने भी उठाया है ।

फिल्म को इंटरटेनमेंट तक सीमित रखना चाहिए ऐसा मेरा मानना है । शिक्षा

आधारित फिल्म हो तो आप भले ही इसकी नयी कटेगरी बना सकते है ।

जब आप शिक्षा कि बात करेंगे तो ...... भारत में जो मानदंड बनाए जाएंगे वो

भारत कि मानसिकता को ध्यान मे रखकर ही बनाए जाएंगे ।।

12. अपने हर हर महादेव के संवाद ,रज़िया सुल्तान की कहानी ,

महाभारत के संवाद कर्ण के पहले सात एपिसोड का निर्देशन किया क्या

आपने कभी सोचा कि आगर इनमे भी सेंसर जैसी व्यवस्था लागू होती तो

एक लेखक की अपनी भी मर्यादा होती है मैं उसी में रह कर काम करने की

कोशिश करता आया हूँ और करूंगा ।

13. भविष्य में आप कैसे फिल्में बनाना चाहेंगे ।

हिस्टोरिकल मेठोलोजिकल का मेरा रुझान रहा है । कामेडी । गोलमाल फ़र्स्ट मेरे

कॉमेडी प्ले पर आधारित है । कभी जरूरत पड़ी तो इनहि दोनों विषयों को

लेकर फिल्म बनाऊँगा । फिलहाल लेखक हूँ उसी पेशे मे खुश हूँ ।

14. प्रतिबंधित होने के बाद सिनेमा और भी चर्चित हो जाता है इस पर

आपका क्या कहना है ।

अच्छा है निर्माता को फायदा होता है ।

15. सेंसर बोर्ड के मानदंड सिर्फ सिनेमा तक सीमित है । ऐसे में

सेंसरबोर्ड की ज़िम्मेदारी भी सिनेमागृहों तक ही मान ली जाए । आप क्या

कहना चाहेंगे ?

देखिये गाँव मे आज भी नेटवर्क की सुविधा जितनी होनी चाहिए उससे कहीं कम

है और जिनके पास इन्टरनेट है वो शिक्षित भी है । आप की बात से सहमत हुआ

जा सकता है की सिनेमा गृहों के अलावा भी ये फिल्में हमें मिल सकती है पर

इंटरनेट की कम उपलब्धता के के कारण गाँव का आदमी आज भी फिल्में देखने

सिनेमा ग्रहों तक ही जाता है । इसी लिए सेंसरबोर्ड ने अपने मानदंडों को

सिनेमगृहों तक बनाया है जैसे जैसे प्रोद्योगिकी का विकास होगा वैसे वैसे बोर्ड

भी अपने मानदंडों मे परिवर्तन करता जाएगा जिससे एक स्वस्थ और सभ्य

समाज बना रहें और हमें फिल्में मनोरंजन कराती रहें ।

धन्यवाद सर

महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय

नोट :- शोधार्थी सेंसरशिप के नैतिक मानदंड तथा हिन्दी सिनेमा विषय

पर पीएचडी कर रहें हैं । यह साक्षात्कार उनके द्वारा इसी विषय के

उद्देश्यों को पूरा करने हेतु किया गया हैं ।

सेंसरबोर्ड सदस्य मिहिर भुट्टा जी के साथ साक्षात्कार के दौरान की

एक छवि साथ मे मनीष जैसल

0 comments:

Post a Comment

Top Ad 728x90