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Sunday, 14 June 2015

जब 20 मिनट "मिस टनकपुर" देखने के बाद उठ गए अनुराग कश्यप !!!



फ़िल्म मेकिंग की आपने कई कहानियाँ सुनी। कभी आपने एक फिल्म के रिलीज होने की कहानी नहीं सुनी होगी। अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि फिल्म बनाने से ज़्यादा मुश्किल काम है फिल्म को रिलीज कराना। और एक नए production house और डायरेक्टर के लिए तो असंभव !! और production house के पास सिर्फ़ फिल्म बनाने लायक बजट हो , तब तो और भी असंभव !!! बिल्कुल ही असंभव !!
फिल्म बनाने से पहले मुझे इस सच के बारे में ख़ास जानकारी नहीं थी और ये तो बिल्कुल ही पता नहीं था कि भारत में हर साल जितनी फ़िल्मे रिलीज होती हैं , तक़रीबन उतनी ही फ़िल्मे पूरी होने के बाद भी कभी रिलीज नहीं हो पाती हैं !!! पहली बार ये सच सुनकर अंदर तक काँप गया था मैं !! बनी बनाई तैयार फ़िल्मे रिलीज नहीं हो पाती - ये सुनकर कई रात तक मैं सो नहीं पाया। मुझे बताया गया कि तिग्मांशु धूलिया जैसे फ़िल्मकार को "पान सिंह तोमर " जैसी महान फिल्म के लिए तीन साल तक इंतज़ार करना पड़ा । फिल्म बनने के बाद वो तीन साल तक भटकते रहे। मुझे बताया गया कि केतन मेहता जैसे फ़िल्मकार चार साल से "रंगरसिया " लेकर बैठे हैं और रिलीज का इंतज़ार कर रहे हैं। ये सच बहुत ही डरावना था। मैने जानने की कोशिश की कि ऐसा क्यों होता है तो दो तीन मोटी बातें पता चली। पहली ये कि डिब्बे में बंद 90 फ़ीसदी फ़िल्मे तो बनी ही बहुत ख़राब होती हैं तो वो कभी सिनेमा हॉल तक नहीं पहुँच पाती। कुछ मामलों में झगड़े विवाद हो जाते हैं। कुछ फ़िल्मों में पैसे की कमी की वजह से बात आगे नहीं बढ़ पाती और कुछ फ़िल्में बेहतर होते हुए भी इसलिए फँस जाती हैं कि रिलीज करने वाली कंपनी या स्टूडियो , फिल्म के Content को या तो समझते नहीं हैं या समझना ही नहीं चाहते। और एक बार वही content चल गया तो सब credit लेने के लिए आगे आ जाते हैं।
मिस टनकपुर के साथ भी यही हुआ। आप यक़ीन नहीं करेंगे कि फिल्म के trailer के कमाल के रिसपांस के बाद मुझे कम से कम तीन चार ऐसी फ़िल्म कंपनी और स्टूडियो के ये कहते हुए फोन आए कि " यार विनोद !! ये मिस टनकपुर आप हमारे पास लेकर लाए थे। हमने तो कहा था कि ये फिल्म Work करेगी , कुछ करते हैं। फिर आप दोबारा क्यों नहीं हमारे पास आए ?? "
मैं इनके नाम नहीं लिखूँगा कि पर सच ये है कि इन कंपनियों और studios ने फिल्म तक देखने से इंकार कर दिया था , बाक़ी बातें तो बहुत ही दूर की हैं। इस पूरी प्रकिया में मुझे मुंबई से एक ही शिकायत है कि इस शहर में अच्छी कहानियों और फ़िल्मों की बहुत कमी है पर उसके बावजूद जिनका काम ही कहानियाँ सुनना है और फिल्म देखना है , वो ना कहानी सुनने को तैयार हैं और ना फिल्म देखने को । ये मेरी बड़ी शिकायत है। और मैं इसका भुक्तभोगी हूँ !!
किस किस के पास नहीं गया मैं फिल्म लेकर । पहले किसी ने कहा कि पाँच मिनट का ट्रेलर बना कर दिखाओ।किसी ने कहा कि दो मिनट का ट्रेलर दिखाओ। पर किसी ने नहीं कहा कि फिल्म दिखाओ !! कितने लोगो ने दो दो तीन तीन महीने तक लटका कर रखा। मुझे पता था कि फिल्म का मामला है , कोई भी यारी दोस्ती काम नहीं आने वाली। जो भी कोई फिल्म के रिलीज में 4-5 करोड़ लगाएगा , वो कोई भी फ़ैसला यारी दोस्ती में तो बिल्कुल नहीं करेगा।
जब काफ़ी वक़्त निकल गया तो मैं डरने लगा कि कहीं ये इंतज़ार अंतहीन ना हो जाए। पर एक विश्वास तो लगातार था कि देर है पर अंधेर नहीं। वजह थी सिर्फ़ फिल्म। फिल्म के edit , dubbing ,sound के वक़्त ही जो जो नए लोग जुड़ते जा रहे थे , उनकी feedback से ये यक़ीन तो हो गया था कि फिल्म कम से कम ठीक ठाक बन गई है और ये देरसवेर अपने लिए रास्ता ढूँढ ही लेगी। बस ये है कि अपना धैर्य बना कर रखना है।
और फिर सीन में आया मेरा एक बहुत ख़ास दोस्त रविकान्त मित्तल। रवि ने बताया कि "अनुराग कश्यप उसका बचपन का दोस्त है। वो अनुराग से बात कर सकता है पर अनुराग की ये दिक़्क़त है कि वो बहुत मुँहफट है , जो भी उसे लगेगा -मुँह पर बोल देगा। "
यही तो मैं चाहता था। जानना चाहता था कि कोई तो समझदार आदमी बताए कि फिल्म कैसी बनी है ? और फिल्म में दम लगता है तो कुछ करे रिलीज के लिए। ये बात है जून 2014 की।
रवि ने अनुराग से बात की। लेकिन अनुराग से मुलाक़ात हो पाई दो महीने बाद अगस्त 2014 में। 1st August 2014 . अनुराग ने रात के दस बजे अपने घर पर बुलाया। डरते डरते मैं पहुँचा। अनुराग के हाथ में गिलास था scotch का ..मुझे भी ऑफ़र किया पर मैं इतना घबराया हुआ था कि अपनी घबराहट दूर करने के लिए भी हाँ नही बोल सका। घर में अंदर घुसते ही अनुराग ने ये भी बोल दिया कि
" भाई एक बात साफ़ बोल दूँ। एक ख़ास दोस्त की birthday party में मेरा इंतज़ार हो रहा है। मैं रवि के कहने पर तुम्हारी फिल्म देख रहा हूँ , पसंद नहीं आई तो 15-20 मिनट में ही उठ जाऊँगा। "
आप समझ सकते हैं कि उस वक़्त क्या हालत हुई होगी मेरी। फिल्म शुरू हुई। और मैं लगातार घड़ी देख रहा था। पाँच मिनट गुज़र गए , दस मिनट गुजर गए। मेरी हालत बिलकुल उस रिश्तेदार की तरह थी , जिसका कोई बहुत ख़ास ICU में पड़ा हो और Doctor ने कह दिया हो कि 24 घंटे आपका मरीज़ जी गया तो फिर ख़तरे से बाहर है। मेरे लिए ये ख़तरे का वक़्त 20 मिनट का था। और जैसे ही 20 मिनट गुज़रे ,अचानक अनुराग उठे , film को remote से pause किया और कमरे से बाहर चले गए। मुझे लगा कि गई भैंस पानी में। ना इस फिल्म का कुछ भविष्य है , ना मेरा।
दो मिनट बाद ही अनुराग वापस आ गए। इस बार उनके हाथ में scotch और पानी की बोतल भी थी। मेरी जान मे जान आई। एहसास हो गया कि वो अपनी drink लेने गए थे और शायद दोबारा नहीं उठना चाहते थे, इसलिए बोतल और पानी एक ही बार में ले आए। इस बार तो मैं भी चाहता था कि वो ऑफ़र करें और मै लपक लूँ। पर जब तक मैं कुछ और सोचता , फिल्म फिर शुरू हो गई थी। मुझे लगा कि कम से कम पहली परीक्षा में तो पास हो गया। अनुराग "मिस टनकपुर " देख रहे थे और मैं कभी उनको , उनके चेहरे के हाव भाव को और कभी उनके कमरे को - जिसमें कम से कम 5000 फ़िल्मों की DVDs तो रखी ही होंगी।
रात के 12 बजकर 6 मिनट। और मिस टनकपुर हाजिर हो की पहली screening पूरी हुई । फिल्म देखने के बाद अनुराग तेज़ी से उठे और कमरे से बाहर चले गए। मैं अपना सामान और फिल्म की DVD समेटने लगा। मुझे लगा कि ये कैसा आदमी है ? फिल्म देखने के बाद कुछ तो बोलना चाहिए था। सीधे उठा और चला गया। तीन चार मिनट बाद अनुराग आए और बोले कि " यार बहुत देर से रोकी हुई थी, bathroom गया था। और बोलो .. अब क्या programme है तुम्हारा ? " मैं वाक़ई कुछ समझा नहीं। मुझे लगा कि ये फिल्म के बारे में कुछ बताएँगे पर ये तो कुछ और पूछ रहे हैं।
मैने कहा भी कि आप क्या कह रहे हो ? तो वो बोले - यहाँ से कहाँ जाओगे ?
मैने कहा कि घर !!!
तो अनुराग ने सीधे पूछा : दारू पीयोगे ? चलो एक पार्टी में चलते हैं। बार बार फोन आ रहे हैं। मुझे सच में कुछ समझ नहीं आ रहा था कि सारी बात हो रही है पर फिल्म के बारे में कोई बात नहीं हो रही।
मैने धीरे से कहा कि पर मुझे कोई जानता नहीं है और ना मैं invited हूँ।
अनुराग धीरे से मुस्कुराए और बोले कि " भाईसाहब मुंबई में आपका स्वागत है , अब आपको news में वापस नहीं जाना पड़ेगा। चलो मेरे साथ। " मुझे तो अपने कानों पर यक़ीन ही नहीं हुआ।
घर से बाहर आने के बाद अनुराग ने अपनी ही कार में बैठने को कहा। एक दो कॉल निपटाने के बाद अनुराग ने बोलना शुरू किया - " फिल्म अच्छी बनाई है यार तुमने ? मैं तो ये सोचकर ही बैठा था कि party में इंतज़ार हो रहा है , 15-20 मिनट बाद उठ जाऊँगा पर पिक्चर ने उठने नहीं दिया। " पहली बार मेरी सांसे कुछ सामान्य हुई। मैने पूछा कि क्या लगता है आपको ? फ़िल्म कैसा करेगी ?
तो अनुराग ने कहा कि " यार देख box office का तो मुझे अपनी फ़िल्मों का ही पता नहीं रहता। पर ये फिल्म तुम्हे मुंबई में खड़ा कर देगी कि कोई है विनोद , जिसने टनकपुर बनाई है। " इतना ही नहीं अनुराग ने मुझे ये भी ऑफ़र दिया कि टनकपुर का फ़ाइनल एडिट में वो खुद बैठेंगे।
मुझे तो मानो मन माँगी मुराद मिल गई हो । रास्ते भर अनुराग टनकपुर की ही बात करते रहे। फिर क़रीब 12.30 बजे हम एक पार्टी में पहुँचे। अनुराग ने गेट पर ही खड़े एक शख़्स से मिलवाया कि इनका नाम सुनील बोहरा है , आज इन्हीं की birthday party है और तुम्हारी पिकचर अब ये ही रिलीज करेंगे।
सुनील बोहरा भी हैरान। मेरी तरफ़ देखने लगे तो अनुराग ने मेरा परिचय करवाया और बताया कि " इन्होंने फिल्म बनाई है- मिस टनकपुर हाजिर हो , क्या पिक्चर बनाई है। कल देखना तुम। "
सुनील बोले कि अनुराग ने देख ली तो अब मुझे देखने की क्या जरूरत। हम कल बात करते हैं।
जो चीज़ तीन घंटे पहले तक असंभव लग रही थी , वो अब एकदम plate पर सज कर तैयार थी।
बाद में मैने अकेले में सुनील बोहरा को Google करके देखा तो पता चला कि उनकी कंपनी Bohra Bros 100 से ज़्यादा फ़िल्मे बना या रिलीज कर चुकी हैं , जिसमें gangs of Wasseypur , Tanu weds manu -1 , Shahid , Mastram जैसी चर्चित फ़िल्मे भी हैं।
उस रात और अगले दिन तक तक़रीबन सारी बातें तय हो गई ... लेकिन फिर कुछ ही दिनों में ऐसे development हुए कि मिस टनकपुर के साथ Fox star studios खड़ा हो गया .. Fox की तरफ़ से हाँ आने से पहले Viacom motion pictures में भी सबकुछ positive होने लगा ... ये कहानी बहुत ही अविश्वसनीय है , जो फिर कभी ...
और हाँ ...
26 June याद रखिएगा .... !!!!

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