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यूपी में सरकारी सम्पत्ति पर मीडिया की मण्डी, नियम ताक पर

राज्य सरकार की सम्पत्तियों पर मीडिया की दुकानें सजी हुई हैं। इन कथित खबरनवीसों ने बकायदा अपने अखबार की प्रिंट लाइन में नियम विरूद्ध तरीके से सरकारी आवासों का पता दे रखा है। इतना ही नहीं आरएनआई को भेजे शपथ पत्रों में भी सरकारी आवासों को अखबार का कार्यालय दर्शाया गया है। दूसरी ओर तत्कालीन मुलायम सरकार के कार्यकाल में अनुदानित दरों पर प्लॉट और मकान हथियाने वाले तथाकथित नामचीन पत्रकार भी अपनी गरिमा को ताक पर रखकर नियम विरूद्ध तरीके से अपने मकानों और भू-खण्डों को या तो बेच चुके हैं या फिर उसे किराए पर देकर स्वयं सरकारी आवासों का सुख भोग रहे हैं।
चौंकाने वाला पहलू यह है कि इस बात की जानकारी शासन-प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों से लेकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव को भी है। यहां तक कि सपा सरकार के बड़बोले नेता आजम खां भी कई बार पत्रकारों के इस दुस्साहस पर चुटकी ले चुके हैं। इधर राज्य सम्पत्ति विभाग के अधिकारी मन मसोस कर बैठे हैं। एक अधिकारी ने तो यहां तक कह दिया कि सरकार इन कथित पत्रकारों से बैर नहीं लेना चाहती अन्यथा इस अव्यवस्था को कब का समाप्त कर दिया गया होता। 
लाभ के लिए कलम गिरवी रख दिया लालची पत्रकारों ने
लखनऊ। कुछ तथाकथित नामचीन पत्रकारों ने निजी स्वार्थवश पत्रकारिता के उद्देश्यों को ताक पर रख दिया है। यदि यह कहा जाए कि पत्रकारों को लोभी बनाने में तत्कालीन मुलायम सरकार भी दोषी है तो तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए। तथाकथित भ्रष्ट मंत्रियों और कुछ नौकरशाहों ने समाजवादी पार्टी के खिलाफ खबर लिखने वालों की कलम गिरवी रखने की गरज से शासनादेश जारी कर उन्हें वह लाभ दिया जिसके वे हकदार नहीं थे। तत्कालीन मुलायम सरकार की ओर से फेंके गए लालच के दानों को हासिल करने के लिए उन नामचीन पत्रकारों को सरकार की परिक्रमा और चरण वन्दना करने पर विवश कर दिया जिनकी खबरों से नेता, मंत्री ही नहीं बल्कि तथाकथित भ्रष्ट नौकरशाही तक भय खाती थी।
तत्कालीन मुलायम सरकार ने पत्रकारों के हितार्थ अनुदानित दरों पर लखनऊ के विभिन्न इलाकों में आवासीय प्लॉट और मकानों की व्यवस्था की। इस योजना का लाभ पाने वालों के लिए शर्त यह थी कि अनुदानित दरों पर आवासीय भूखण्ड और मकान उन्हीं पत्रकारों को दिए जायेंगे जिनका निजी आवास लखनऊ में नहीं होगा। प्लॉट और आवासों का आवंटन करने के दौरान शर्त यह भी रखी गयी थी कि सुविधा का लाभ पाने वाले पत्रकारों को सरकारी आवासों से कब्जा छोड़ना पडे़गा। शर्त यह भी थी कि पत्रकार उक्त भू-खण्ड अथवा आवास का इस्तेमाल सिर्फ स्वयं और स्वयं के परिवार के रहने के लिए करेगा। शर्त यह भी थी कि कम से कम 30 वर्षों तक उक्त आवास और भू-खण्ड किसी दूसरे को बेचे अथवा हस्तांतरित नहीं किए जा सकेंगे।
गलत हलफनामे देकर हथियाई सरकारी सुविधाएं 
शासनादेश में सख्त नियमों के बावजूद सरकारी सुविधा का लाभ पाने वाले कथित नामचीन पत्रकारों ने अपनी गरिमा को ताक पर रखकर तत्कालीन मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में फर्जी हलफनामे के सहारे सरकारी अनुदान पर मिली सुविधाओं का जमकर लाभ उठाया। कुछ पत्रकारों ने तो दो-दो मकान/भू-खण्ड हथिया लिए। विडम्बना यह है कि अनुदानित दरों पर आवासीय भू-खण्ड और मकान हासिल करने वाले ज्यादातर तथाकथित नामचीन पत्रकारों ने नियमों की परवाह किए बगैर उक्त आवासों और भू-खण्डों को या तो बेच दिया हैं या फिर व्यवसाय की दृष्टि से उनका निर्माण करवाकर मंहगी दरों पर किराए पर उठा रखा है।

तत्कालीन मुलायम सरकार से लाभ पाने वाले गिने-चुने पत्रकार ही ऐसे होंगे जो सरकार की नियमावली का पूरी तरह से पालन कर रहे हैं जबकि ज्यादातर कथित नामचीन पत्रकार नियम-कानून को अपनी जेब में रखकर सरकारी अनुदान पर भू-खण्ड और आवास प्राप्त करने के बाद भी सरकारी आवासों पर कुण्डली जमाए बैठे हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार विगत वर्ष न्यायपालिका ने भी इस मामले में राज्य सरकार को पर्याप्त कार्रवाई के निर्देश दिए थे लेकिन किसी भी पत्रकार के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं की जा सकी। हालांकि कुछ पत्रकारों को राज्य सम्पत्ति विभाग की ओर से नोटिसें जारी की गयीं थीं लेकिन वे भी नोटिसों की परवाह किए बगैर सरकारी सम्पत्तियों पर कुण्डली जमाकर बैठे हैं।
आरएनआई घोषणा पत्र में सरकारी आवासों का पता
गौरतलब है कि नियमों के तहत सरकारी आवास को किसी भी तरह से व्यवसाय अथवा दूसरे उपयोग में नहीं लाया जा सकता। ऐसा पाए जाने की दशा में उक्त पत्रकार से आवास तो खाली करवाए जाने का प्राविधान है ही साथ ही व्यवसायिक दरों पर किराया वसूलने का भी प्राविधान है। चौंकाने वाला पहलू यह है कि इन सरकारी आवासों पर दर्जन भर से ज्यादा पत्रकारों ने अपने अखबार के कार्यालय स्थापित कर रखे हैं। इतना ही नहीं आरएनआई को दिए घोषणा-पत्रों में भी इन्हीं सरकारी आवासों का पता दिया गया है। इस बात की जानकारी राज्य सम्पत्ति विभाग ने स्वयं और सूचना विभाग के सहारे सरकार तक भी पहुंचा दी है लेकिन राज्य सरकार ने ऐसे किसी भी पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई न करके इस ओर इशारा कर दिया है कि वह किसी भी सूरत में तथाकथित नामचीन पत्रकारों से बैर नहीं लेना चाहती।
दारूलशफा के बी ब्लॉक, आवास संख्या 45 में एक उर्दू दैनिक समाचार-पत्र ‘सबमत’ का कार्यालय खुला हुआ है। यह आवास इफितदा भट्टी के नाम पर आवास के तौर पर आवंटित किया गया था। दारूलशफा बी ब्लॉक का आवास संख्या 95 मोहम्मद शब्बीर के नाम से आवंटित किया गया था। इस सरकारी मकान से उर्दू साप्ताहिक समाचार-पत्र रोजी राह का प्रकाशन दर्शाया जा रहा है।
दारूलशफा ए ब्लॉक का आवास संख्या 155-ए शरत पाण्डेय के नाम से आवंटित किया गया था। इस सरकार आवास से ‘हैदरगढ़ की बात’ शीर्षक से हिन्दी साप्ताहिक समाचार-पत्र का संचालन किया जा रहा है। दारूलशफा का 33-ए भवन संख्या घनश्याम मिश्रा के नाम से आवंटित है। इस सरकारी भवन से एक हिन्दी साप्ताहिक समाचार-पत्र ‘जन छाया’ का प्रकाशन संचालित किया जा रहा है। 5/1 डॉलीबाग की सरकारी कॉलोनी के मकान से संचार प्रकाश नाम से उर्दू दैनिक समाचार पत्र का प्रकाशन दिखाया जा रहा है।
यह दीगर बात है कि यह समाचार-पत्र कहीं नजर नहीं आता लेकिन इस अखबार का पंजीयन कार्यालय सरकारी मकान में दिखाया जा रहा है। यह मकान ममता शुक्ला को आवंटित किया गया है। इसी सरकारी मकान से साप्ताहिक उर्दू समाचार-पत्र विविध रोजगार का प्रकाशन दिखाया जा रहा है। इस अखबार की मुद्रक प्रकाशक भी ममता शुक्ला हैं। 155-ए दारूलशफा के सरकारी मकान से हैदरगढ़ की बात शीर्षक से साप्ताहिक समाचार पत्र का प्रकाशन किया जा रहा है। यह आवास शरत पाण्डेय के नाम से आवंटित है। 116-ए दारूलशफा से क्रांति चेतना नाम के अखबार का प्रकाशन दिखाया जा रहा है। यह आवास शारदानन्द अंचल के नाम से आवंटित है। श्री अंचल का देहान्त हो चुका है इसके बावजूद मकान पर कब्जा बना हुआ है। 
उक्त उदाहरण तो महज बानगी मात्र हैं जबकि दारूलशफा, रॉयल होटल, डालीबाग, गुलिस्तां कॉलोनी, टिकैतराय तालाब की सरकारी कॉलोनी, डायमण्ड डेरी, पार्क रोड, ओसीआर बिल्डिंग और इन्दिरा नगर के सरकारी भवनों से लगभग छह दर्जन समाचार-पत्रों का संचालन किया जा रहा है। इसकी जानकारी राज्य सम्पत्ति विभाग से लेकर सम्बन्धित उच्चाधिकारियों को भी है लेकिन मीडिया से कोई बैर नहीं लेना चाहता। जाहिर है इन परिस्थितियों में सरकारी मकानों में कुण्डली मारकर बैठे कथित नामचीन पत्रकारों से मकान खाली करवाना अब टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।
यह आर्टकिल लखनऊ से प्रकाशित दृष्टांत मैग्जीन से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है. इसके लेखक तेजतर्रार पत्रकार अनूप गुप्ता हैं जो मीडिया और इससे जुड़े मसलों पर बेबाक लेखन करते रहते हैं. वे लखनऊ में रहकर पिछले काफी समय से पत्रकारिता के भीतर मौजूद भ्रष्‍टाचार की पोल खोलते आ रहे हैं.
Sabhar- Bhadas4media.com

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