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Tuesday, 31 March 2015

फांकाकशी के दिन थे.. आजतक की नौकरी छोड़ चुका था - Anuranjan Jha

फांकाकशी के दिन थे.. आजतक की नौकरी छोड़ चुका था ... शादी को साल भी नहीं हुए थे और इसी बीच संयोगवश एक छोटी सी न्यूज एजेंसी में टेलीविजन का काम शुरु करने के लिए अनुबंधित किया गया... उसी दौर में अनूप से जान-पहचान हुई.. एजेंसी के प्रिंट का प्रभार अनूप के पास था ... अक्सर अनूप हमसे एजेंसी के लिए लेख लिखवा लेते ...टीवी का काम करते हुए छपना लगातार जारी रहा .. अनूप मित्र से ज्यादा एक भाई हो गए। अनूप हमारे संघर्ष के साथी थे। हमारे सबसे बुरे दिनों में हौसला देने वाले मित्र... कमाल की राजनीतिक समझ रखने वाले पत्रकार। बिहार की मिट्टी के चंद पत्रकार ही होंगे जिनकी हरियाणा की राजनीति में धमक रही हो, अनूप उनमें से एक थे। हरियाणा के कई शहरों में दैनिक भास्कर और आज समाज जैसे अखबारों को प्रतिस्थापित किया और वहां से ऐसा लगाव हुआ कि वहीं के होकर रह गए। करनाल में अपना स्थायी निवास बना लिया। टेलीविजन और जिंदगी की भागमभाग में हमारा मिलना जुलना कम हो गया। फोन पर अक्सर गुफ्तगू होती, मैं फोन करता और शिकायत भी सर आप फोन नहीं करते ... जवाब आता अरे सर आप बड़े व्यस्त रहते हैं भाभी से समाचार जान लेता हूं .. नजर रखता हूं और फिर एक शानदार हंसी। जिंदगी को लेकर इतना लापरवाह इंसान जैसे कभी किसी चीज की कोई फिक्र ही नहीं होती हो। कल जब मैं ए्म्स ट्रॉमा सेंटर के रिसेप्शन पर पहुंचा और उनसे मिलने जाने के लिए पास बनाने को कहा तो उस शख्स ने कहा कि आप नहीं मिल सकते .. आप क्या अब कोई भी उनसे नहीं मिल सकता ... अनूप मैं आपसे मिलना चाहता था... बार-बार मिलना चाहता था .. ऐसे भी कोई जाता है मित्र .. बहुत याद आएंगे आप

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