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Friday, 7 November 2014

सीएजी ने बढाई वाड्रा की मुश्किल


प्रमोद भार्गव
लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।
प्रमोद भार्गव
सत्ता के दुरूपयोग से आर्थिक साम्राज्य कैसे खड़ा किया जा सकता है,इसका ताजा उदाहरण दुनिया की सबसे ताकतवर महिला हस्ती सोनिया गांधी के दामाद राॅर्बट वाड्रा का हैं। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की बेटी प्रियंका गांधी के पति और राहुल गांधी के बहनोई वाड्रा की एकाएक बड़ी आर्थिक हैसियत का सनसनीखेज खुलासा पिछले माह अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार ‘द वाॅल स्ट्रीट जर्नल‘ ने किया था और अब इसकी पुष्टि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक सीएजी ने कर दी है। सीएजी की मसबिदा रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि वाड्रा ने हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा की सरकार के दौरान जमीन सौदों में 44 करोड़ रूपय का अप्रत्याशित मुनाफा कमाया,जबकि यह मुनाफा महज 2.15 करोड़ रूपए का बैठता है। हैरानी इस बात पर है कि राज्य सरकार ने इस सरकारी धन को वसूलने की भी कोई कोशिश नहीं की।
44 साल के राॅर्बट वाड्रा सिर्फ दसवीं तक पढ़े हैं। अपने देश में दसवीं के प्रमाण-पत्र को बाबू की नौकरी की पात्रता भी नहीं है। लेकिन जब आप किसी राजनीतिक घराने के वंश-वृक्ष से जुड़े हों तो आपको तुच्छ सरकारी नौकरी करने की जरूरत ही क्या रह जाती है ? सीएजी से पहले वाॅल स्ट्रीट ने अपनी खोजी रपट में जमीन-जायदाद के जानकारों से बातचीत,राॅर्बट वाड्रा की कंपनियों की फाइलें और जमीनों से संबंधित दस्तावेजों के आधार पर जमीन गड़बडि़यों की जानकारी दे दी थी। खबर के अनुसार वाड्रा ने 2007 में एक लाख रूपए की धनराशि से शुरू की गई कंपनी से 2012 में 12 मिलियन डाॅलर यानी करीब 72 करोड़ की संपत्ति बेची। जबकि फिलहाल उनके पास 42 मिलियन डाॅलर यानी लगभग 253 करोड़ से ज्यादा के भूमि और भवनों पर मालिकाना हक है। मसलन वाड्रा की कंपनी ने पांच साल के भीतर सत्ता की जादुई छड़ी हवा में लहराकर 325 करोड़ रूपए से अधिक की संपत्ति बना ली। संपत्ति में यह रहस्मयी बढ़ोत्तरी चैंकाने वाली है।
खबर में दावा किया गया था कि 2004 में जब सोनिया गांधी के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार सिंहसनारूढ़ हुई,तब उनके दामाद वाड्रा सस्ते गहनों के निर्यात का व्यापार बहुत छोटे पैमाने पर करते थे। 2007 में वाड्रा जायदाद के कारोबार में उतरे और स्काई लाइट हाॅस्पिटेलिटी प्राइवेट लिमिटेड नाम से एक कंपनी बनाई। काॅपोरेट आफ आफेयर्स मंत्रालय के मातहत काम करने वाले रजिस्ट्रार आफ कंपनीज के मुताबिक इस कंपनी की शुरूआत वाड्रा ने महज एक लाख की पूंजी से की थी,जिसने बहुत छोटे समय में चैंकाने वाली तरक्की करके मेहनतकश कारोबारियों को हैरत में डाल दिया। क्योंकि ऐसा क्रोनी कैपिटल मसलन आवारा पूंजी के इस्तेमाल बिना संभव ही नहीं है। इस लंपट पूंजी की लंपटता के बरक्ष अच्छे-अच्छों के ईमान डोल जाते हैं। फिर जिस समय वाड्रा ने जायदाद के कारोबार की बुनियाद रखी थी,तब वे न केवल जबरदस्त आर्थिक संकट झेल रहे थे,बल्कि अपने परिवार में हो रहीं लगातार अकाल मौतों के चलते मानसिक परेशानी से भी गुजर रहे थे। इस विपरीत परिस्थिति में उन्हें इस लंपट पूंजी ने जीने की नई जमीन तैयार करने का काम किया।
राॅर्बट वाड्रा की इस अनुपातहीन संपत्ति का दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ सिलसिलेवार खुलासा सबसे पहले आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने किया था। किंतु तब दिग्गज कांग्रेसियों ने आगे आर सफाई दी थी कि राॅर्बट वाड्रा ने सब कुछ वैधानिक तरीकों से हासिल किया है। लेकिन इस वैद्यता की प्रमाणिकता के संबंध में सफाईगीर कोई प्रमाण पेष नहीं कर पाए थे। तत्कालीन कानून मंत्री सलमान खुर्षीद ने तो चाटूकारिता का चरम पेष करते हुए कहा था कि सोनिया गांधी ने हमें मंत्री बनाया है,इसलिए हम उनके लिए जान भी दे सकते हैं। कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज भी मर्यादा की सभी सीमाएं लांघकर सफाई अभियान की बहती गंगा में डूबकी लगा बैठे थे। जबकि राज्यपाल संवैधानिक पद  है और उसका महत्व दलगत राजनीति से ऊपर है। गोया,इन पदाधिकारियों ने सोनिया के उपकारों का बदला चुकाने के लिए तत्काल तो पद की गरिमा को ताक पर ही रख दिया था।
केजरीवाल ने प्रषांत भूषण के साथ उस समय वाड्रा की अवैध संपत्ति का जो खुलासा किया था,उसके मुताबिक 2007-08 में वाड्रा ने 50 लाख की पूंजी से अपने और अपनी मां के नाम से पांच कंपनियां पंजीकृत कराई थीं। कालांतर में 2012 तक वाड्रा 300 से 500 करोड़ के मालिक बन बैठे। भूमि और भवन निर्माण की बड़ी कंपनी डीएलएफ ने वाड्रा को 65 करोड़ वापिसी की कोई षर्त तय किए बिना ब्याज मुक्त कर्ज दिया। इस दया के अलावा पांच फ्लैट भी वर्तमान बाजार मूल्य से कम कीमत पर दिए। कोई भी पेशेवर व्यापारी बिना किसी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष लाभ के ऐसी अनुकंपा किसी पर नहीं करता।
इस खुलासे के चार दिन बाद केजरीवाल ने नए रहस्य से पर्दा उठाकर यह भी साफ कर दिया था डीएलएफ के मालिक केपी सिंह ने वाड्रा पर यह मेहरबानी किसलिए की थी। दरअसल उस समय हरियाणा में कांग्रेस सरकार थी। सरकार के अदृश्य इशारे पर डीएलएफ को अनुचित लाभ पहुंचाया गया। कानून ताक पर रखकर 1700 करोड़ रूपए की 350 एकड़ जमीन डीएलएफ को दी गई। इसमें 75 एकड़ जमीन हरियाणा विकास प्राधिकरण की थी। यही नहीं राज्य सरकार ने किसानों के साथ धोखाधड़ी करते हुए गुड़गांव में जो 30 एकड़ जमीन सरकारी अस्पताल के निर्माण के लिए अधिग्रहण की थी,वह जमीन विषेश आर्थिक क्षेत्र निर्माण के लिए डीएलएफ को स्थानांतरित कर दी थी। इसी दौरान वाड्रा ने डीएलएफ के 25 हजार शेयर खरीदे और सेज में पचास फीसदी के भागीदार भी बन गए। इससे इस भूमि के अधिग्रहण और उसके उपयोग में परिवर्तन के सवाल भी खड़े हुए ? जो भूमि जन सामान्य के स्वास्थ्य को दृष्टिगत रखते हुए अस्पताल के निर्माण के लिए तय थी,उसके बुनियादी उपयोग को दरकिनार कर कारोबारी लाभ में बदल दिया। गुड़गाव के आईएएस आधिकारी अषोक खेमका ने जब भूमि के उपयोग संबंधी परिर्वतन की जांच शुरू की तो हरियाणा सरकार ने उन्हें निलंबित कर दिया। और फिर सरकार के पिट्ठू अधिकारियों से जांच कराकर मामले की लीपापोती कर दी।
अब सीएजी की रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हाॅस्पिटेलिटी को गुड़गाव के पास शिकोहपुर में हरियाणा सरकार से मिली 3.5 एकड़ जमीन का करार डीएलएफ यूनिवर्सल से हुआ था। इससे स्काईलाइट हाॅस्पिटेलिटी को 43.66 करोड़ का मुनाफा हुआ। सीएजी ने रेखांकित किया है कि राज्य सरकार और स्काईलाइट के बीच हुए अनुबंध की शर्तों के मुताबिक इस मुनाफे में वाड्रा केवल 2.15 करोड़ रूपए के हकदार थे। जबकि उन्होंने पूरी धनराशि अपने पास रख ली और सरकार ने इस राशि को वसूलने की कोई कार्रवाही ही नहीं की। यहां यह भी गौरतलब है कि जब सीएजी ने इस जांच का मसौदा हरियाणा सरकार के पास भेजा था तब वहां कांग्रेस की सरकार थी और वह सोनिया गांधी के दबाव में थी। किंतु अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और उसके मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर वाड्रा के जमीन घोटालो को उछालकर सत्तारूढ़ हुए है,लिहाजा अब उनका दायित्व बनता है कि अपने वायदा का पालन करते हुए इस घोटाले को मुकाम तक पहुंचाने का दायित्व निभाएं।
Sabhar- Pravakta.com

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