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Friday, 14 November 2014

छिद्रान्वेषण नहीं समीक्षक का काम

सिनेमा ही क्यों, क्या राजनीति के सामाजिक सरोकार दिखते हैं? क्रिकेटरों और बाकी खिलाडियों के सरोकार के किस्से रोज सामने आ रहे हैं. 50 और 60 के दशक में तब सिनेमा में सामाजिक सरोकार दिखते थे, जब जीवन के बाकी क्षेत्र भी अपने सरोकार के प्रति सचेत थे. जब शास्त्री जी थे, तब विमल राय भी थे. आज इधर कलमाड़ी हैं तो उधर महेश भट्ट भी...

फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम से अमलेश प्रसाद की बातचीत
vinod-anupamफिल्मों से आपका लगाव कैसे हुआ?
फिल्मों से लगाव तो मुझे भी उसी तरह था, जैसा किसी भी किशोर को हो सकता है. लेकिन सिनेमा को लेकर गंभीरता से सोचना तब शुरु हुआ, जब 1988 में प्रकाश झा द्वारा बिहार में सिनेमा को लेकर चलाए जा रहे व्यापक आंदोलन से जुड़ने का मौका मिला. उस दौर में उन्होंने संस्कृति को उत्पादकता से जोड़ने की अभिनव शुरुआत की थी और बिहार के कई स्थानों पर फिल्म एप्रिशिएशन और पटकथा लेखन पर कार्यशालाएं आयोजित की थी. यह वह समय था, जब मैं कहानियां लिख रहा था और मेरी कहानियां सारिका जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रही थी. सिनेमा से भले ही स्वाभाविक आकर्षण से जुडा, लेकिन पुणे से जब फिल्म एप्रिशिएशन कर लौटा तो अहसास हुआ सिनेमा में कितना कुछ करना बाकी है. या कहें तो हिन्दी में कायदे से सिनेमा पर कुछ कहने की शुरुआत भी नहीं हुई है. कहने को उस समय पटकथा जैसी पत्रिका भी निकल रही थी, लेकिन उस सिनेमा पर बात नहीं हो रही थी, जो लोग देख रहे थे. मैंने वहीं से हस्तक्षेप की शुरुआत की.
फिल्म समीक्षक का काम कैसा है?
मैं यहां सत्यजीत रे के साथ जाना चाहूंगा जो कहते थे कि समीक्षक, दर्शक और निर्देशक के बीच सेतु का काम करता है. वह निर्देशक की समझ तक पहुंचकर फिल्म को दर्शकों के लिए सहज बनाता है. मैं मानता हूं समीक्षक का काम फिल्म का छिद्रान्वेषण नहीं, उसकी गड़बड़ियों और अच्छाइयों के प्रति दर्शकों का ध्यान आकृष्ट कराना है. दर्शक यदि मेरी समीक्षा पढ़कर फिल्म नहीं देखना तय करता है तो मैं इसे अपनी असफलता मानता हूं.
दर्शक फिल्मी समीक्षाओं को कितनी गंभीरता से लेते हैं?
इसका अंदाजा तो आप आज की सफल फिल्मों को देख कर लगा सकते हैं. रा.वन हो चाहे क्या कूल हैं हम, समीक्षकों की चौतरफी आलोचना इन्हें झेलनी पड़ी, लेकिन फिल्म ने काफी कमाई की. मैं मानता हूं कि समीक्षक की भूमिका मात्र एक फिल्म तक सीमित नहीं रहती, वह बेहतर फिल्म के लिए एक माहौल बनाती है. आज रोहित शेट्टी के साथ अनुराग कश्यप और तिग्मांशु धूलिया भी आम दर्शकों के बीच स्वीकार्य हैं तो कहीं न कहीं इसमें समीक्षकों की ही भूमिका है.
आज के फिल्मों की दशा-दिशा पर आपके विचार क्या् हैं? 
दशा दिशा को कुछ शब्दों में समेट पाना तो संभव नहीं. इतनी विविधता कि कभी लगता है हम सिनेमा के सुनहरे दौर में हैं, कभी लगता है हमारी फिल्में हमें ही शर्मिंदा कर रही हैं. मल्टीप्लेक्स के साथ सिनेमा को मिली व्यवसाय की सहूलियत ने इसकी रचनात्मकता और कल्पनाशीलता को ठेस भी पहुंचाई तो नए विषयों और नई प्रस्तुति को लेकर जोखिम उठाने की ताकत भी दी. वास्तव में फिल्में समाज के साथ चलती है, यह कभी हमारे सौंदर्यबोध को चुनौती देने की कोशिश नहीं करती.
अक्सर फिल्मकार कहते हैं कि हमें आलोचकों का कोई परवाह नहीं है. वे ऐसा क्यों कहते हैं?
सिनेमा विधा इतनी संप्रेष्य है कि इसे व्याख्या की जरुरत नहीं होती. व्याख्या की जरुरत तब होती जब फिल्मकार दर्शकों के सौंदर्यबोध के स्तर पर उतर कर नहीं, दर्शकों के सौंदर्यबोध को साहित्य की तरह बेहतर बनाने की कोशिश करते. विमल राय हों या सत्यजीत रे, उन्होंने अपने सौंदर्यबोध के अनुरुप फिल्में बनायी, महेश भट्ट ने जख्म बनायी,फिल्म प्रशंसित भी हुई. नेशनल अवार्ड़ भी मिले, लेकिन और कमाई की चाह ने अंततः उन्हें दर्शकों के सौंदर्यबोध पर उतरकर या उससे भी नीचे उतर कर जिस्म और मर्ड़र बनाने को बाध्य कर दिया.
पहले जिन दृश्यों यानी सेक्स, हिंसा, अंग-प्रदर्शन,अश्लीलता, चुंबन आदि पर उंगली उठायी जाती थी, आज वे सब सामान्य बातें हैं. क्या ये बदलाव आलोचकों की हार और फिल्मकारों की जीत है?
इसे जीत हार की तरह नहीं देखा जा सकता. सवाल सेक्स हिंसा का भी नहीं,सवाल है क्या यह जरुरी है. यदि शोले बना रहे हैं तो हिंसा से हम कैसे मना कर सकते हैं, लेकिन जहां थप्पड़ मारने से काम चल जा सकता हो, वहां जब हड्डियों के टूटने की कड़कड़ाहट सुनाई देती है तो स्प्ष्ट लगता है यह हमारे विकृत सौंदर्यबोध को संतुष्ट करने की कोशिश है. यही सेक्स के बारे में भी कहा जा सकता है. फिल्मकार बस अपने को दर्शकों की पसंद के प्रति जवाबदेह मानते हैं, शायद इसीलिए सिनेमा ने कभी समीक्षक को तरजीह भी नहीं दी. आज हर वर्ष दो दर्जन से ज्यादा अवॉर्ड बंटते हैं, कभी किसी समीक्षक को सम्मानित करने की कोशिश हुई है!
हिन्दी कला फिल्में नहीं चलतीं. क्या हिन्दी सिनेमा के दर्शक कला पारखी नहीं हैं? 
कला फिल्में कभी उस तरह नहीं चल सकती, जैसे आम फिल्में चलती हैं. शास्त्रीयता हमेशा विशिष्ट लोगों के बीच ही स्वीकार्य रही है. अमजद अली खान का सरोद हम नहीं समझ पाते, न ही सुनने में रुचि लेते हैं, तो यह नहीं कहा जा सकता कि हम कला पारखी नहीं. साहित्य में प्रेमचंद और गुलशन नंदा का फर्क हमें बताया गया तो हम यह फर्क आज कर पाते हैं. सिनेमा में श्याम बेनेगल और डेविड धवन का फर्क समझाने की कोशिश की ही नहीं गई कभी.
डर्टी पिक्चर में नायिका कहती है- ‘इंटरटेनमेंट, इंटरटेनमेंट एंड़ इंटरटेनमेंट...' क्या अब सिनेमा के सामाजिक सरोकार नहीं रहे? 
सिनेमा ही क्यों, क्या राजनीति के सामाजिक सरोकार दिखते हैं? क्रिकेटरों और बाकी खिलाडियों के सरोकार के किस्से रोज सामने आ रहे हैं. 50 और 60 के दशक में तब सिनेमा में सामाजिक सरोकार दिखते थे, जब जीवन के बाकी क्षेत्र भी अपने सरोकार के प्रति सचेत थे. जब शास्त्री जी थे, तब विमल राय भी थे. आज इधर कलमाड़ी हैं तो उधर महेश भट्ट भी. आज सिनेमा से सामाजिक सरोकार की उम्मीद मैं मानता हूं कि ज्यादती है. वह अपने सामान्य सौंदर्यबोध का निर्वाह कर ले, संतोष इतने पर भी किया जा सकता है, मुश्किल यह है कि आज का सिनेमा उसके लिए भी तैयार नहीं.
सिनेमा के सौ साल के सफर को कुछ लोग उत्थाान, तो कुछ लोग पतन कह रहे हैं. आपकी राय क्या है? 
इतिहास में दौर आते हैं, जाते हैं. इसका उत्थान और पतन जैसे सामान्य शब्दों के साथ मूल्यांकन नहीं किया जा सकता. आज के सिनेमा की विषय और कथ्य के स्तर पर आलोचना कर सकते हैं, लेकिन तकनीक के स्तर पर इसके विकास को नजरअंदाज नहीं कर सकते. यदि विषय के लिहाज से देखें तो यह 100 वर्षों की एक ढलान यात्रा है, यदि व्यवसाय और तकनीकी दृष्टि से देखें तो विकासगाथा.
गीतों और संवादों की भाषा से आप कितना संतुष्ट हैं, संवादों में अब गालियां भी ख़ूब इस्तेमाल हो रही हैं?
हिन्दी सिनेमा में अब गीत हैं ही कहां...संगीत का साथ देने के लिए कुछ शब्द भर गढ़ दिए जाते हैं. संवादों में भाषायी कुशलता की जगह सहजता ने ले ली है, यह सहजता दिनोंदिन सहज होने की होड़ में सीढियां उतरते जा रही हैं, जाहिर है सिनेमा को कला माध्यम समझने वाला कोई व्यक्ति इससे संतुष्ट नहीं हो सकता. मैं भी नहीं हूं, क्योंकि मैं भी मानता हूं कि किसी भी कला की तरह सिनेमा का भी दायित्व हमारे सौंदर्यबोध को समृद्ध करना है.
आपने अपने एक लेख में लिखा है कि पंजाब को प्रेम के पर्याय के रूप में दर्शाया जाता है, जबकि सारे अपराधी हिन्दी प्रदेशों के ही होते हैं. ये अनायास हो रहा है या कोई और बात है?
सिनेमा कला से ज्यादा व्यवसाय हो गया है. आज फिल्मकार नहीं व्यवसायी फिल्में बना रहे हैं, जाहिर है उनके लिए व्यवसाय प्रबल है, और यह कटु सच है कि हिन्दी सिनेमा के व्यवसाय में हिन्दी प्रदेश की भागीदारी नगण्य होती है. स्वाभाविक है प्रस्तुति पर यह दवाब काम करता है. करण जौहर को पता है बिहार—यूपी से उसके व्यसाय पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, क्यों वह फिक्र करे हिन्दी प्रदेश की.
आपके एक लेख का शीर्षक है- “बलात्कार के लिए उकसाता है सिनेमा. इसे जरा स्पष्ट करें?
उकसाने का अर्थ है महिलाओं को मात्र और मात्र भोग्या समझने के लिए यह लगातार दवाब बनाए रखता है. हाल के दिनों में ऐसे फिल्मों की बाढ़ सी दिखी जिसमें महिलाएं सहजता से उपलब्ध होती दिखीं. सिनेमा के साथ मुश्किल यह है कि यह नहीं कहते हुए भी बहुत कुछ कहता है.
कुछ लोग कह रहे हैं कि नया सिनेमा छोटे-छोटे गांवों-मोहल्लों से निकलेगा. इसी मकसद से मशहूर युवा निर्देशक दिबाकर बनर्जी हिन्दी और रीजनल लैंग्वेज़ के लिए एक स्क्रिप्टिंग सॉफ्टवेयर भी बना रहे हैं. क्या उन फिल्मों में गांव अपने मूल स्वरूप में होगा?
छोटी जगह का मतलब गांव थोडे ही होता है. इम्तियाज अली तो जमशेदपुर से गए, उनकी फिल्म में भी मध्य प्रदेश में अपराध दिखता है और पंजाब में प्यार. यह जरुर है कि तकनीक ने सिनेमा को आसान जरुर बना दिया है. यह फिल्मकार को विषय चुनने की सहूलियत भी देगा, लेकिन वह कौन सा विषय चुने इसके लिए मैकेनिज्म तैयार करने की जवाबदेही समाज की ही हो सकती, निश्चित रुप से अभी तो समाज की ओर से ऐसी कोई तैयारी नहीं दिखती.

Sabhar-http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-07-00/5061-chhidranveshan-karna-nahi-film-smeekshak-ka-kaam-for-janjwar-by-vinod-anupam-amlesh-prasad

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