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Wednesday, 16 July 2014

वेद प्रताप वैदिक ने एक समय टाइम्स कर्मचारियों की पीठ में छुरा भी भोंका ।

यह बात तो बहुतेरे लोग जानते हैं कि वेद प्रताप वैदिक लंबे समय तक नवभारत टाइम्स में कार्यरत थे । एक समय वह संपादक विचार भी बने । पर बहुत कम लोग यह बात जानते हैं कि वेद प्रताप वैदिक ने एक समय टाइम्स कर्मचारियों की पीठ में छुरा भी भोंका । यह अस्सी के दशक की बात है । धर्मयुग बेनेट कोलमैन का प्रतिष्ठित प्रकाशन था । नवभारत टाइम्स और टाइम्स आफ इंडिया भी इसी बेनेट कोलमैन के प्रकाशन हैं । तो धर्मयुग को बंद करने के लिए , कर्मचारियों को धता बताने के लिए बेनेट कोलमैन ने धर्मयुग को बेच दिया । पर किस के हाथ ? जानते हैं आप ?
इन्हीं वेद प्रताप वैदिक के हाथ ।
एक कर्मचारी इतना बलवान हो जाए कि अपने मालिकान का एक प्रतिष्ठित प्रकाशन खरीद ले ? वह भी टाइम्स समूह से ? यह वेद प्रताप वैदिक ने कर दिखाया । अब अलग बात है कि इस सौदे में भी कहा जाता है कि वैदिक जी ने धर्मयुग को न सिर्फ 'खरीदा ' बल्कि खरीदने की भारी-भरकम रकम भी वसूली । ऐसा कहा जाता है । और नतीज़ा सामने था । धर्मयुग बंद हो गया । कोई कर्मचारी कहीं लड़ने लायक भी नहीं रह गया । किस से लड़ता भला? यह एक ऐसा दाग है वेद प्रताप वैदिक के चेहरे पर जिसे वह अपनी विद्वता , अपनी भाषा, अपनी सत्ता गलियारों में तमाम पैठ के बावजूद मिटा नहीं पाए हैं , न कभी मिट पाएगा यह दाग वेद प्रताप वैदिक के चेहरे से ।
आतंकवादी हाफिज सईद से मिलना तो कोई अपराध नहीं है, न यह कोई दाग है वेद प्रताप वैदिक के नाम पर। लेकिन धर्मयुग के साथियों के साथ की गई गद्दारी उन के मरने के बाद भी उन्हें अपराधी ही ठहराएगी और कि यह दाग अमिट है । दाग और भी बहुत हैं वेद प्रताप वैदिक के नाम पर । पर हाफिज सईद से मिल कर वह देशद्रोही तो नहीं ही हैं यह बात मैं अपने पत्रकार साथियों से फिर दुहराना चाहता हूं । वेद प्रताप वैदिक को घेरना ही है तो उन को घेरने के लिए और भी तमाम मुद्दे हैं पर यह मुद्दा सिवाय फुलझड़ी के कुछ और नहीं है । 

Sabhar- Fb Dayanand Padey .. 

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