भीड़भाड़ में एकांत की एक कथा-यात्रा


♦ उमेश पंत
हां मुंबई में कई बार आप उस पत्ते की तरह महसूस करने लगते हैं, जो नदी के प्रवाह के बीच किसी पत्थर में अटक गया हो। आसपास सबकुछ लगातार बह रहा हो पर आपके मन का कोई सिरा उस पथरीली सतह पर कहीं दबा रह गया हो। बहता हुआ पानी लगातार आपको धकेलता जा रहा हो। पर आप आगे बढ़ ही नहीं पा रहे हों। चोटिल होते जा रहे हों। अदृश्य सी चोटें, जो दिखती नहीं, शायद होती भी नहीं पर सालती हैं।
नदी जो समय है, बहाव जो वर्तमान है और इस तरह की मन:स्थिति उस बहाव में मन की अटकन है, जो परेशान करती है कभी कभी। जैसे गले में कुछ अटक गया हो। जो अब न निगलते बन रहा हो, न उगलते। मुंबई कभी कभी उस अटकी हुई चीज की तरह परेशान करने लगती है।
ट्रेन पर चढ़ने वालों की भीड़ में रुककर कभी उन सैकड़ों जंग खाये हुए से चेहरों की ओर नजर जाती है, तो लगता है जैसे वक्त की रगड़ खाकर घिस गये से बरतनों को देख रहा हूं। बरतन जिनमें जिंदगी बस इसलिए रख दी गयी है क्योंकि उनमें खाली जगह थी। कुछ इंसानी सांचे जो यूं ही पड़े थे, उनमें बची-खुची सी जिंदगियों को बस भीड़ बढ़ाने के लिए ढाल दिया गया हो जैसे।
अंधेरी स्टेशन के ओवरब्रिज पर दादर जाने वाली ट्रेन पकड़ने के लिए भागते हुए कभी अचानक ठहरने का मन होता है। ओवरब्रिज में एक कोने पर खड़े होकर लोगों को उस डिस्प्ले बोर्ड के नजरिये से देखने का मन होता है, जो अपनी जगह पर रुके रुके इन लोगों को अलग अलग प्लेटफार्मों की तरफ भागने का इशारा कर रहा है। लोग पागलों की तरह उन्माद में भागते से नजर आते हैं। ठहर कर देखो तो इन लोगों पर हंसी छूटती है, पर अगले ही पल एहसास होता है कि इन्हीं उन्मादी पागलों में से एक मैं भी हूं, जो अभी यहां न ठहरा हुआ होता तो शायद इसी भीड़ के बीच कहीं भाग रहा होता। इस भागने के बीच रुकना जो आत्मबोध कराता है, वो रोंगटे से खड़े कर देता है कभी कभी। मैं कुछ देर रुककर खुद को भागने के बावजूद कहीं भी न पहुंचते हुए देखता जाता हूं। ठीक उस पत्ते की तरह जो अब भी अटका हुआ है भागते हुए समय के बीच।
इस अटकने की स्थिति से दूर आने के लिए कुछ दिनों मुंबई से दूर जाने का मन होता है। पागल करती भीड़ से दूर। एक बेवजह सा प्रदूषित ठहराव लाते ट्रेफिक जाम से दूर। उम्र और समय दोनों को किसी निरर्थक सी आपाधापी में धकेलकर चूस लेते इस शहर से दूर।
गेटवे ऑफ इंडिया से एक फेरी ऐसे ही कहीं दूर छोड़ आती है। फेरी आगे बढ़ती जाती है और धीरे धीरे शहर छोटा होता जाता है। जिंदगी की स्याही को चिंताओं के उस स्पंज से सोख लेने वाले उस बड़े से शहर को अपने सामने छोटे होते हुए देखना एक आत्‍मविश्वास सा देने लगता है। इस यात्रा के बीच अपने आसपास लहराता समंदर उस मां की तरह लगने लगता है जो कहीं दूर बैठी अपनी यादों में अब भी हमारा माथा सहला रही है। हौले हौले। प्यार से। समंदर से उठती ठंडी सी हवाएं मां की उन मासूम थपकियों सी लगती हैं, जो न जाने कब से नसीब नहीं हुई। जो दूरियों में कहीं गुम हो गयी। अपने सामने छोटे होते जाते उस शहर ने जो बेवजह ही हमसे छीन ली।
फैरी दूर ले आती और थोड़ी ही देर में वो शहर छोटे छोटे बिंदुओं में बदल जाता है। अथाह सा समंदर उतावले से शहर को अपनी लहरों के बीच कहीं गुम कर देता है। जैसे भागते हुए किसी शैतान से बच्चे को किसी मां ने पकड़कर अपने आंचल में छुपा लिया हो। वो भागता सा शहर यहां इतनी दूर से एकदम रुका हुआ-सा नजर आता है। रुक कर हमें खुद से दूर जाता हुआ देखता सा। जैसे मुंबई भी एक शरारती बच्चा हो जिसे अपनी जगह पर रुके रहने को मजबूर कर दिया गया हो। जैसे वो भी हमारे साथ शांति की तलाश में इसी फेरी में बैठकर कहीं दूर चला जाना चाहता हो। ये सोचकर अपनी मौजूदा रिहाइश के इस शहर मुंबई से सहानुभूति होने लगती है।
फेरी तकरीबन 50 मिनट में मांडवा तक ले आती है। मांडवा से एक घंटे बस में सफर करते हुए अलीबाग की तरफ आते हैं तो लगता है अपनी ही तरफ के कस्बों में से किसी एक कस्बे से गुजर रहे हों। छोटे छोटे एक मंजिले घर। घरों के इर्द गिर्द हरियाली और इफरात की जगह। और उस जगह में वक्त को पसार कर बैठी फुरसत। अलीबाग के बीच तो उतने सुंदर नहीं हैं पर अलीबाग से 13 किलोमीटर दूर नाइगांव का बीच बहुत खूबसूरत है। उस बीच से कुछ ही दूरी पर छोटे छोटे होमस्टे सरीखे रिसॉर्ट या घर बने हैं जहां एक दो दिनों के लिए रहा जा सकता है। इन घरों में आपको जरूरत की सारी चीजें जैसे वक्त वक्त पर खाना, चाय वगैरह मिलती रहेगी। और यहां से 5 मिनट की दूरी चलकर आप समंदर के किनारों पर बपौती का अहसास पा सकते हैं। दूर दूर तक कोई नहीं। सिर्फ आप, आपके अपने और दूर दूर तक फैली शांति जिसे बीच बीच में लहरों की आवाज छेड़ सी जाती है। शाम को सूरज जैसे जैसे नीले से परदे पर नीचे खिसकता जाता है वैसे वैसे और सुंदर होता चला जाता है। उसका लाल रंग और गाढ़ा होता चला जाता है। जैसे परदे के पीछे से छुपकर लगातार कोई सूरज की उस तस्वीर को और खूबसूरत बनाने के लिए फोटोशॉप कर रहा हो। मदधम पीली सी पड़ती रेत पर धीरे धीरे सूरज अपने रंग बिखेरने लगता है। रेत कुछ देर के लिए उसके रंग में रंग जाती है और इस बात से खफा समंदर थोड़ी ही देर में उस उद्दंड सूरज को अपनी लहरों में डुबा देता है। कुछ देर के लिए आकाश में एक फीका सा रंग बिखर जाता है जैसे सूरज को इस तरह से डुबा देने से उसका भी रंग उड़ गया हो। और कुछ ही देर में सारे रंग अपना अपना अस्तित्व खो दे देते हैं और आकाश में काली स्याही बिखर जाती है।
समंदर किनारे बनी छोटी छोटी गुमटियों में कांच के गिलास में चाय पीने और गरम गरम मैगी खाने का अपना लुत्फ है।
नाइगांव से तकरीबन डेढ़ घंटे का सफर एक और खूबसूरत समुद्री किनारे तक ले आता है। काशिद नाम के इस बीच में लोग समंदर की लहरों से इत्मिनान के साथ साथ थोड़ी थोड़ी मस्तियां बटोरने चले आते हैं। यहां पर बनाना राइड, पैराशूट, स्ट्रीमर वगैरह का मजा भी लिया जा सकता है।
काशिद से आगे फिर सवा घंटे का सफर मुरुड के समुद्री किनारे का है। इस किनारे से पाल वाली कुछ नावें जंजीरा नाम के एक किले तक ले जाती हैं। इस किले के स्थापत्य की खासियत ये है कि इसका मुख्य द्वार तब तक नहीं दिखाई देता जब तक आप इसके बिल्कुल सामने न हों। एक द्वीप पर बना यह किला इसलिए भी मशहूर है क्योंकि पश्चिमी समुद्री तटों में यह एक अकेला किला है जिसे डच, मराठा और ईस्ट इंडिया कंपनी जैसे आक्रामक भी जीत नहीं पाये। यह किला रामपाटिल नाम के एक मछुआरों के नेता ने बनाया था जिसका मकसद समुद्री डाकुओं से मछुआरों के समाज की रक्षा करना था। बाद में अहमद नगर के निजाम ने अपने सिपहसालारों को भेजकर इसपर अपना कब्जा कर लिया और तत्कालीन किले को तोड़कर एक अभेद्य किले का निर्माण किया। एक ऐसा किला जो भारतीय समुद्री किलों में सबसे मजबूत किलों में से एक बन गया।
अगर आप कुछ और लंबी समुद्री यात्राओं का मन बना रहे हैं तो सफर और लंबा चल सकता है। मुरुड से ही एक और स्ट्रीमर दिग्गी नाम के एक सदूर गांव की तरफ जाता है। लगभग 30 मिनट समुद्री यात्रा के बीच डूबते हुए सूरज को देखने का अपना ही सुख है। किसी दूसरी दुनिया में लाने के से इस अनुभव के बाद दिग्गी पहुंचना और वहां से 15 मिनट की दूरी पर दिव्यागार नाम के एक सुंदर एकांत से समुद्री किनारे पर पहुंचना इत्‍मीनान से दोस्ती कर लेने सा लगता है। यहां भी रहने के लिए होमस्टे के इंतजाम हैं। आप लोगों के घरों में बने अतिरिक्त कमरों में एक दो दिन ठहरकर उनके घर में बने कोंकणी खाने का लुत्फ ले सकते हैं।
इस लंबी यात्रा के बाद आप जब मुंबई लौटते हैं तो मुंबई को नये नजरिये से देखने की ललक होती है। मुंबई भले ही अफरातफरी से भरा शहर हो पर मुंबई के आसपास इस अफरातफरी से उपजे मानसिक तनाव को बहा आने के तटीय प्रबंध भी मौजूद हैं। पर आपको खुद के लिए और इन तटों तक पहुंचने के लिए वक्त निकालना होगा। और निस्‍संदेह ये वक्त मुंबई में लंबे अरसे तक टिके रहने की प्रेरणा और सामर्थ्य दोनों ही आपके हिस्से में डाल देगा। एकांत से घिरे एक शोर जैसा शहर है मुंबई जो दोनों में से किसी एक को बारी बारी से चुन पाने का मौका भी मुहैय्या करता है।
Umesh Pant(उमेश पंत। सजग चेतना के पत्रकार, सिनेकर्मी। सिनेमा और समाज के खास कोनों पर नजर रहती है। मोहल्‍ला लाइव, नयी सोच और पिक्‍चर हॉल नाम के ब्‍लॉग पर लगातार लिखते हैं। यूपी से ग्रामीण पाठकों के लिए निकलने वाले अखबार गांव कनेक्‍शन से भी जुड़े हैं। उनसे mshpant@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)
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भीड़भाड़ में एकांत की एक कथा-यात्रा भीड़भाड़ में एकांत की एक कथा-यात्रा Reviewed by Sushil Gangwar on April 08, 2014 Rating: 5

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