क्या सिर्फ जनता दरबार फेल हुआ? या फिर इसके मायने गंभीर हैं.


क्या सिर्फ जनता दरबार फेल हुआ? या फिर इसके मायने गंभीर हैं.

अबतक तो हम यही सुनते आए थे कि अरविंद केजरीवाल देश में व्यस्था परिवर्तन करना चाहते हैं. संविधान निर्माताओं ने भारत के विशालता और जनसंख्या को ध्यान में रखते हुए भारत को एक रिप्रेजेंटेटिव डेमोक्रेसी यानि प्रतिनिधि प्रजातंत्र बनाया था. जिसमें लोग अपने प्रतिनिधि को चुनते हैं और वही जनता की ओर से फैसले लेते हैं. इसमें कई कमियां जरूर हैं, जिसे दुरुस्त करने की जरूरत है लेकिन अरविंद केजरीवाल के दिमाग में कुछ और ही हैं.

अरविंद केजरीवाल भारत को डायरेक्ट-डेमोक्रेसी यानि सहभागी-प्रजातंत्र में तब्दील करना चाहते हैं. इस व्यवस्था में सरकार के हर फैसले में जनता की राय जरूरी है. इसलिए सरकार को सीधे जनता के बीच ले जाना, जनता के द्वारा ही नीतियां बनाना व जनता से पूछ कर सरकार चलाना जैसी बातें अरविंद केजरीवाल करते हैं. इसी बात को साबित करने के लिए अरविंद केजरीवाल ने जनता-दरबार को सड़क पर बुलाया. लेकिन जब जनता आई तो न सिर्फ जनता-दरबार की पोल खुली बल्कि अरविंद केजरीवाल के व्यवस्था परिवर्तन के नजरिए पर सवाल खड़ा हो गया.

आजादी के बाद से भारत की जनसंख्या साढ़े तीन गुणा ज्यादा हो चुकी है. डायरेक्ट या पार्टिसिपेटरी डेमोक्रेसी भारत जैसे में देश में संभव नहीं है. वैसे अरविंद केजरीवाल ने जनता दरबार को फिर करने का ऐलान किया है. देखना यह है कि इसका स्वरूप नीतीश कुमार के जनता दरबार से कितना अलग होगा? रही बात अरविंद के “स्वराज” के सपने की जो उन्होंने अपने किताब में लिखी है.. उसका विश्लेषण वक्त आने पर करूंगा.

वैसे मजेदार बात यह है कि जनता दरबार में भगदड़ के डर से भागने वाले सबसे पहले भागने वाले स्वयं अरविंद केजरीवाल थे लेकिन जब वो सचिवालय के छत से लोगों से मुखातिब हुए तो वो चिल्ला चिल्ला कर जनता-दरबार को जन-अदालत कहते नजर आए. ये बड़ा हास्यास्पद है. मुख्यमंत्री अदालत नहीं लगा सकते.... वैसे देश में जन-अदालत लगती है जहां गैरकानूनी तरीखे से इंसाफ दिया जाता है... थप्पड़ मारने से लेकर मौत का भी फरमान सुनाया जाता है.. ऐसे जन-अदालत देश में नक्सली लगाते हैं.. एक मुख्यमंत्री के मुंह से ऐसी बाते नहीं निकलनी चाहिए.. हैरानी की बात यह है कि देश की “सबसे ईमानदार पार्टी” के पहले कार्यक्रम में ही कई महिलाओं के साथ छेड़छाड़ हुई.. चैनलों पर ये रो-रो कर अपनी व्यथा सुना रही थी.. कई लोगों के फोन गायब हो गए और उन्हें पता नहीं चला.. साथ ही कई लोगों के बटुए को पॉकेटमारों ने गायब कर दिया. फिलहाल, इन मामलों में पुलिस ने शिकायत तो ले ली हैं.
क्या सिर्फ जनता दरबार फेल हुआ? या फिर इसके मायने गंभीर हैं. क्या सिर्फ जनता दरबार फेल हुआ? या फिर इसके मायने गंभीर हैं. Reviewed by Sushil Gangwar on January 11, 2014 Rating: 5

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