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Friday, 3 January 2014

क्या अरविंद केजरीवाल के लिए सादगी अपनाना (या दिखावा) करना ज़रूरी है?


कल से एक सवाल मन में कौंध रहा है कि क्या अरविंद केजरीवाल के लिए सादगी अपनाना (या दिखावा) करना ज़रूरी है? और सादगी की परिभाषा क्या है?

सत्ता और संपत्ति के फ़ूहड़ प्रदर्शन पर तालियाँ बजाने वाला समाज अचानक इनता संवेदनशील कैसे हो गया कि उसे एक मुख्यंत्री को आवंटित होने वाले पाँच कमरों के फ्लैट में आलीशान बंगला दिखने लगा?

और एक मुख्यमंत्री या नेता से हम चाहते क्या हैं? कि वो ज़मीन पर सोए, सड़क पर आम आदमी की तरह चले. मेट्रो और बस में दिखे? 

या फिर कि वो सार्वजनिक संपत्ति और धन का कम से कम उपयोग करे और ज़्यादा से ज़्यादा काम करे!

हम केजरीवाल को सादगी का प्रतीक बनाने की कोशिश क्यों कर रहे हैं जबकि हम स्वयं अपने जीवन में मूलभूत सुविधाओं की वक़ालत करते हैं.

क्या घर और कार होना एक मुख्यमंत्री की मूलभूत ज़रूरत नहीं है?

केजरीवाल की आलोचना उन मौक़ों के लिए बचाकर रखिए जब
1. वे अपने किसी करीबी को फ़ायदा पहुँचाने के लिए अपने दफ़्तर या सत्ता का ग़लत इस्तेमाल करें.
2. दिल्ली में भ्रष्टाचार के प्रति आँख मूँद ले
3. मामूली कामों के लिए फ़ाइव स्टार खर्चें करें
4. किसी अपराधी को छुड़वा दें
5. किसी बेग़ुनाह को गिरफ़्तार करवां दे

या जब आपको लगे कि उनके किसी कार्य से सार्वजनिक धन की बर्बादी हो रही है या कोई क़ानून टूट रहा है.

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