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Thursday, 2 January 2014

बदलती राजनीति और लोकसभा चुनाव : जनसंदेश टाइम्स में प्रकाशित लेख


  • शिवानन्द द्विवेदी सहर 

विगत वर्ष 2013 भारतीय राजनीति की
विसात पर बड़े परिवर्तनों की चाल चल कर गया है.अबतक जो कुछ दिखा वो राजनीति में प्रयोग का एक रूप था लेकिन अब जो कुछ दिख रहा है वो सबकुछ लोकसभा चुनावों के समीकरण साधने की कवायद के अलावा कुछ भी नहीं है. चाहे इकत्तीस विधानसभा सीट जीतने के बाद भाजपा का बिना कुछ दांव-पेंच किये विपक्ष में बैठ जाना हो या आम आदमी पार्टी के हाथों करारी शिकस्त खाकर कांग्रेस द्वरा फिर उसी को आलिंगन भरने को आतुर दिखना हो, ये सारी कवायदें लोकसभा चुनाव में अपने सियासत का तापमान संतुलित रखने की प्रक्रिया मात्र है. इस समय आम जनता की नजर दिल्ली के आकर्षित करने वाली राजनीति पर है जबकि जबकि दिल्ली की सियासत करने वालों की नजर देश पर है. कांग्रस और भाजपा जैसे अनुभवी राजनितिक दल इस बात को बखूबी समझते हैं कि राजनीति में हार से सबक लिया जाता है न कि हार का बदला लिया जाता है. गले में मफलर बांधे और सर पर आम आदमी की टोपी लगाए अरविन्द केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री किसी भी हाल में बन जायें ये ये इच्छा केजरीवाल से भी ज्यादा कांग्रेस और भाजपा की थी. केजरीवाल का मुख्यमंत्री बनना भले ही सैद्धान्तिक तौर पर आप-कांग्रेस गठबंधन की परिणिति है, मगर अंदरखाने का मिजाज यही कहता है कि केजरीवाल भाजपा-कांग्रेस के अंदरूनी गठबंधन के परिणाम स्वरुप दिल्ली के मुख्यमंत्री बने हैं. दरअसल केजरीवाल और उनकी पार्टी के बारे में एक बात कहना गलत नहीं होगा कि वो भाजपा और कांग्रेस के लिए तब ज्यादा खतरनाक साबित होते जब वो सरकार की बजाय विपक्ष में होते. केजरीवाल जैसा व्यक्ति सत्ता में रहते हुए अपने विरोधियों के लिए कम खतरनाक होगा बजाय कि विपक्ष में रहकर. लोकसभा चुनाव में अधिक समय शेष नहीं है ऐसे में अगर केजरीवाल सत्ता से बाहर होकर विपक्ष की भूमिका में होते तो उनका हमलावर होता और वो लोकसभा चुनाव में अधिकतम उर्जा लगा पाते. वर्तमान हवा का रुख जिस तरह से बहा है वो इस दोनों पारंपरिक पार्टियों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कैसे भी लोकसभा चुनाव तक केजरीवाल के तेवरों को नरम करके उन्हें दूसरे कार्यों में व्यस्त किया जाय. मीडिया की नजर में एक राज्य के तौर पर दिल्ली जितनी महत्वपूर्ण दिख रही है और केजरीवाल जितने बड़े बनाकर दिखाए जा रहे हैं, देश की केन्द्रीय राजनीति के लिहाज से ऐसा कुछ भी नहीं है. छ: महीने की सरकार और वायदों के मुताबिक़ की गयी घोषणाओं को अमली जामा पहनाने के बाद जनता को संतुष्ट करने में केजरीवाल और उनकी टीम को दिल्ली के दायरे में समेटने की यह संयुक्त चाल कांग्रेस एवं भाजपा की है. गौरतलब है कि आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास खुद अमेठी से चुनाव लड़ने के लिए आवेदन किये हैं और संभावना है कि वो लड़ेंगे भी, मगर अब चुनाव लड़ने से पहले दिल्ली के वायदों की जवाबदेही के साथ जाना चुनाव मैदान में आम आदमी पार्टी को भी जाना पड़ेगा. अब आप के लोग उस स्तर पर हमलावर होकर नहीं जा सकते जिस स्तर पर पहले जाते थे क्योंकि आप पार्टी भी अब सत्ताधारी है. इस बात को समझना होगा कि लोकसभा चुनाव और दिल्ली जैसे राज्य के विधानसभा चुनाव के बीच जमीन आसमान का फासला है. क्षेत्रफल के नजरिये से देखें तो दिल्ली के बराबर मध्यप्रदेश एवं उत्तरप्रदेश के एक-एक लोकसभा क्षेत्र ही हो जाते हैं. हर राज्य के अपने समीकरण और वोटबैंक है. अत: लोकसभा चुनाव के नीति-निर्माण एवं कार्ययोजना के लिए पूरा समय देने की जरुरत होती है. ऐसे में क्या आम आदमी पार्टी दिल्ली की सत्ता के समानांतर लोकसभा चुनाव के लिए भी पूरी तरह से खुद को तैयार रख पायेगी, कहना बड़ा मुश्किल है. इसी राजनितिक दाँव के तहत पारंपरिक राष्ट्रीय राजनितिक दलों द्वारा आम आदमी पार्टी को दिल्ली में सरकार बनाने पर मजबूर किया गया. हालाकि अरविन्द केजरीवाल अगर वाकई राजनीति की धारा को बदल पाने में कामयाब हो जाते हैं और शुचिता के सभी पैमानो पर अपनी पार्टी को खरा उतारते हैं तो यह भाजपा एवं कांग्रेस दोनों के लिए नहले पे दहला साबित होगा. फिलहाल की राजनीतिक कवायदों में तो साफ़ तौर पर यही नजर आ रहा है कि भाजपा और कांग्रेस की नजर दिल्ली की स्थानीय राजनीति की बजाय लोकसभा की तैयारियों की तरफ है. आम आदमी पार्टी के लिए वर्तमान में लोकसभा चुनाव से ज्यादा बड़ी चुनौती ये है कि वो दिल्ली की जनता को दिये वायदों एवं अपनी घोषणाओं को अमली जामा पहनाए. बिजली और पानी को लेकर बेशक केजरीवाल अपने वायदे के मुताबिक़ घोषणाएं कर चुके हैं लेकिन हमें याद रखना होगा कि जनता घोषणाओं की बजाय अपने निजी हित को ही ध्यान में रखती है. जिस फार्मूले के तहत केजरीवाल 666 लीटर पानी प्रति परिवार प्रतिदिन मुफ्त देने की बात किये हैं, सबसे उस फार्मूले से कौन सा वर्ग कितना संतुष्ट होता है यह देखने वाली बात होगी. तय सीमा से ज्यादा पानी और बिजली की खपत करने वाले मध्यम वर्ग को केजरीवाल कैसे संतुष्ट करेंगे ये भी देखने वाली बात होगी. साफ़ है कि जनता सरकार के अर्थशास्त्र की बजाय अपनी जेब का अर्थशास्त्र समझती है. अगर उसकी जेब का अर्थशात्र सरकार के अर्थशास्त्र से मेल नहीं खाता तो वो यही मानती है कि सरकार उसके हित में काम नहीं कर रही है अथवा सरकार की नीतियों से उसे कोई लाभ नहीं है. अत: केजरीवाल के सामने घोषणाओं को बिना सब्सिडी दिये आडिट कराकर जनता तक पहुचाने की चुनौती है और अगर केजरीवाल सरकार जनता को अपने वायदे उपलब्ध कराने के लिए सब्सिडी का सहारा लेना पड़ता है इसका मतलब केजरीवाल जनता के साथ छलावा कर रहे हैं. अत: वर्तमान में जहाँ भाजपा और कांग्रेस जैसे राजनितिक दल लोकसभा की तैयारियों में लगे हैं वहीँ केजरीवाल दिल्ली के दायरे में अपने वायदों की चुनौतियों से निपट रहे हैं. लोकसभा के लिए इतना पर्याप्त समय शेष नहीं है कि वो संगठनात्मक स्तर पर देश भर में खड़े हो सके और दिल्ली की तरह अप्रत्याशित परिणाम ला सके. यह आम आदमी पार्टी तब ज्यादा बेहतर कर सकती थी जब वो सरकार बनाने की बजाय विपक्ष में बैठती अथवा दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगा होता. लेकिन आम आदमी पार्टी के तेवरों से घबराई भाजपा और कांग्रेस ने आपसी गठजोड़ करके आम आदमी पार्टी को दिल्ली तक समेटने की चाल चल दी है. अब देखना है कि कौन सी चाल किसके लिए फायदा पहुचाती है और कौन सी चाल किसी माथे के बल खड़ा करती है. 
Sabhar- saharlekhs.blogspot.com

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