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दबंग नही आप दिबांग सर हैं


दबंग नही आप दिबांग सर हैं

हिंदी पत्रकारिता के एक बड़े हस्ताक्षर हैं दिबांग. आजतक को बड़ा करने और एनडीटीवी को जमाने में उनका बड़ा हाथ है. टाईम्स आफ इन्डिया में अंग्रेजी की पत्रकरिता भी की. ILLUSTRATED WEEKLY के सुनहरे दौर में भी रहे.
एबीपी न्यूज़ के शाहजी ज़मान से कहीं ज्यादा रचनात्मक प्रयोग किये हैं दिबांग ने हिंदी चैनल जगत में. लेकिन मै उनकी सबसे ज्यादा इज्ज़त इसलिए करता हूँ की वो सुदूर अरुणाचल प्रदेश में पले बड़े. उन्होंने देश की धडकन से हज़ारों मील दूर रहकर हिंदी को चुना और उसका सम्मान किया. उनकी हिंदी और उनका उच्चारण ....खांटी हिंदी के कई मठाधीश पत्राकारों से बेहतर है. और उनके समाजवाद, उनके राष्ट्रवाद को भी सलाम है.

लेकिन दिबांग सर ने आज निराश किया. शाम को एबीपी में एक बहस के दौरान बीजेपी के सुधांशु मित्तल से वो ऐसा भिडे की लव्ज़ ...जुबां से आग बनकर उतरे . " सुधांशु मित्तल हिम्मत कैसे हुई...सुधांशु मित्तल शर्म करो ..." दिबांग चीखते रहे ,धमकाते रहे और अपने तर्कों को कमज़ोर करते गए. वो पुरी तरह मित्तल के जाल में थे और उनकी क्रोधाग्नि उनके तर्कों को झुलसाती चली गई.
दिबांग से मेरा मुकाबला नही. उनकी कद काठी और मेरे ओहदे में ज़मीन आसमान का फर्क है. लेकिन दिबांग सर आप अगर इमोशनल ना हुए होते तो मित्तल शायद दुबारा अपनी जुबां ना खोल पाते.
हम अक्सर फौरी तौर पर रीएक्ट करते है और झुंझलाहट में खुद की क्षमता घटा लेते हैं. कभी गुस्से को बीच में ही रोक कर पी लीजिए, फिर थोडा रुक कर बोलिए ....बाज़ी पलट जायेगी.
दिबांग सर, आपको तो मित्तल ने स्क्रीन पर थोडा बहुत ही कहा ...मुझे तो सलमान खुर्शीद साहब ने अपने घर में जो कहा ..ज़रा उसकी कल्पना करिये ....

मेरी एक ही सलाह है जब भी कोई नेता कमर के नीचे बाण मारे या सुपर व्हाईट झूठ बोले . ...तो तिलमिलाएये नही ...जरा रुक कर एक गहरी सांस लीजिए ...तर्क को कसौटी पर कसिये ... फिर जूता भिगो भिगो कर ...जी हाँ लव्जों को जूते में भिगो भिगो कर मारिये....बड़े ही अदब के साथ...सामने वाला संतुलन खो देगा.

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