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Monday, 16 December 2013

महिलाओं अगर जिंदा रहना है तो घर छोड़ो

शंभूनाथ शुक्ल : 16 दिसंबर को निर्भया कांड की बरसी के तौर पर याद करते हुए हम बड़े भावुक होकर सब लोग बता रहे हैं कि महिलाएं घर के बाहर कितनी असुरक्षित हैं मानों घर के भीतर तो वे सौ फीसद सुरक्षित हैं। दो दिन पहले से न्यूज चैनल वालों ने इसके लिए विशेष आयोजन करने की योजना बना रखी थी। कुछ महिला पत्रकार गईं और किसी खास बस अड्डे में खड़ी होकर वहां से गुजर रहे बाइक वालों से लिफ्ट मांगी और इसके बाद इस बातचीत को हिडेन कैमरे से लाक कर न्यूज चैनल पर चलवा दी और टीआरपी लूट ली। नतीजा क्या निकला? हर आदमी डर गया कि भई अकेली दुकेली कोई लड़की दिखे और लिफ्ट मांगे तो गाड़ी मत रोकियो पता नहीं वह अपने हिडन कैमरे से आपकी बातचीत को रिकार्ड कर ले और फिर बाइट चलवा दे कि देखो यह पुरुष कितना घटिया है हर लड़की को लिफ्ट देता है। 
 
अरे यह सब करने के पहले अपने आफिस को देखो अपने घर को देखो। आफिस में एक बॉस क्या-क्या कर सकता है, इसे तरुण तेजपाल ने बता दिया। और घर के भीतर निर्भया के साथ कितना दोगला व्यवहार होता है यह बताओ। मैने तमाम महिलाओं को अपने उन पतियों की सेवा करते देखा है जो रोज प्रेस क्लब से दारू पीकर आते समय गाड़ी में ही मूत लेते हैं, वहीं पान की पीकते हैं और उनकी पत्नियां उनके उन अंतर्वस्त्रों को धोती हैं। पियक्कड़ पति अपनी पत्नी पर हाथ उठाते हैं। प्याज, टमाटर, आलू आदि सब्जियों की मंहगाई का रोना रोते हैं। दूध, फल, अंडा और मांस में कटौती करते हैं। उनके बच्चे कुपोषित रहते हैं लेकिन पति महोदय शराब में कटौती नहीं करते न चखने में करते हैं। बच्चों की फीस स्कूल में यथासमय जाए या न जाए पर वे शराब जरूर पिएंगे। बच्चे अपने ऐसे पिता से नफरत करते हैं, पत्नी ऐसे दुराचारी पति की सेवा नहीं करना चाहती लेकिन समाज के दिखावे के लिए उसे करना पड़ता है। क्या सड़क पर अकेले जा रही किसी महिला की सुरक्षा के बारे में चिंता कर रही संस्थाएं, महिलाएं और महिला आयोग कभी ऐसे मामलों में चिंता करता है?
 
आज सुबह-सुबह एक न्यूज चैनल में दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष बरखा सिंह कह रही थीं- "उस बेचारी बलत्कृत निर्भया........" पर मुझे लगा कि बेचारी वह निर्भया नहीं वरन् ऐसे विचार रखने वाली महिलाएं हैं। अगर महिला आयोग की अध्यक्ष किसी को बनाना ही है तो उसे बनाइए जो ऐसे किसी हादसे का शिकार हुई हो। महिलाओं को नौकरी देनी है तो ऐसी महिलाओं को दीजिए जिसने अपने ऐसे शराबी और धूर्त पति को त्यागा हो और उन लड़कियों को दीजिए जो सामंती दिमाग वाले अपने पिता के घर को छोड़कर आई हो। तब ही आप सही मायनों में महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलवा पाएंगे। फालतू की बातें कर नहीं। और रोने-धोने वाली कवितााएं लिखकर नहीं।
 
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वाल से

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