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Sunday, 8 December 2013

पत्रकारिता का यह फार्मेट रहे ना रहे पर पत्रकारिता रहेगी : शैलेश

कल्पतरु एक्सप्रेस द्वारा हर महीने आयोजित होने वाले मीडिया विमर्श की दसवीं शृंखला में शनिवार को श्रोताओं को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और न्यूज नेशन टीवी चैनल के सीईओ शैलेश ने कहा कि भले ही कल को पत्रकारिता का यह फार्मेट न रहे पर पत्रकारिता रहेगी, खबरों की जरूरत हमेशा रहेगी। उन्होंने कहा कि आज कंटेंट डिलिवरी के लेबल पर बड़े बदलाव हो रहे हैं, आगे न्यूज रहेगी, पेपर नहीं रहेगा। टीवी चैनल रहेंगे पर टीवी सेट नहीं होगा। उसके लिए हमें अपने ड्राइंग रूम में बैठकर खबरों पर निगाह दौड़ाने की जरुरत नहीं रहेगी। इस सब की जगह मोबाइल, टेबलेट लेते जाएंगे।
 
एक सर्वे का जिक्र करते उन्होंने कहा कि यह बिजनेस बस बीस साल रहेगा, बीस साल बाद अखबार नहीं होंगे। ये बदलाव दुनिया भर में हो चुके हैं। यूरोप में अखबार बंद हो रहे हैं। वहां अखबार की कीमत अगर पांच पौंड है तो उसे घर पर मंगाने का कुरियर खर्च पंद्रह पौंड है। नतीजा, लोग नेट पर अखबार पढ़ना पसंद करते हैं। यूरोप के स्टेशनों पर सुबह का पचास पेज का अखबार मुफ्त में मिलता है और उसे भी 99 फीसदी लोग छूना नहीं चाहते। वहां जो अखबार घर पर मंगाते हैं उनके लिए अखबार को भी सुंदर वस्तु की तरह अच्छी पैकेजिंग में प्रस्तुत किया जाता है। उन्होंने कहा कि जिस दिन भारत के अखबार और पाठक के बीच से हॉकर हट जाएंगे यहां भी अखबारों की यही स्थिति होगी। पर ऐसा नहीं होगा कि खबरें नहीं होंगी, इसके उलट पत्रकारों का काम कल के मुकाबले बढ़ जाएगा।
 
श्री शैलेश ने कहा कि 4जी आते ही हम सेकेंड्स के भीतर खबरें देख पाएंगे। बदलाव तेजी से आ रहे हैं। आज बड़ी सी ओबी वैन की जगह छोटे बैग पैक ने ले लिया है। उसी में सारी व्यवस्था सिमटी रहती है। अब जोर इस पर होगा कि हम खबरों को कितनी जल्दी और अथेंटिक ढंग से दिखा पाते हैं। उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में संपादक, उपसंपादक, संवाददाता आदि बीच के तमाम लेयर खत्म हो जाएंगे और इन सब की जगह एक संपूर्ण पत्रकार ले लेगा जो एक साथ खबरें लाने, उसे टाइप करने से लेकर प्रूफ दुरुस्त करने और भेजने तक का सारा काम अकेले करेगा। इस संदर्भ में भविष्य के पत्रकार का कम ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता जाएगा।  इसके लिए हमें काम करने के पारंपरिक तरीकों से बाहर आना होगा और आगामी समय के अनुरूप खुद को ढालना होगा। पहले हमें टेलेक्स कार्ड मिलता था फिर फैक्स आया अब ई-मेल है कल को कुछ और होगा।
 
उन्होंने कहा कि इन बदलावों के वरक्स अगर कंटेंट के स्तर पर देखा जाए तो उसमें 1990 के बाद से ही बराबर गिरावट आती जा रही है, उसका कोई तय स्वरूप नहीं रह गया है। आज सवाल यह नहीं रह गया है कि खबर क्या है या नहीं है, अब तो जो लोग देखते हैं वही खबर है। 2005 में एस्ट्रोलॉजी ने पहली बार चैनलों में प्रवेश किया फिर तो हर चैनल के अपने-अपने बाबा हो गये और यह होने लगा कि एक पत्रकार को 25 हजार देना होता है और इन बाबाओं को दो-ढाई लाख दे दिये जाते हैं। इसके लिए कोई तैयारी भी नहीं करनी होती, बस बाबा बुलाओ, बैठे-बिठाये टीआरपी हो जाएगी। आज के बाबा भी पंचांग लेकर नहीं आते, कम्प्यूटर लेकर आते हैं और दावा करते कहते हैं कि यह पतरा नहीं कह रहा यह कम्प्यूटर बता रहा। यह सब दरअसल थोपा जा रहा। फिर सास-बहू के चैनल आए, अब ऐसी खबरें आ रही हैं कि जैसे सलमान खान वर्जिन हैं आदि। कोई मंगल पर आदमी के पांवों के निशान ढूंढ़ रहा और उसके प्रमाण में नासा की तस्वीर दिखा रहा, कोई स्वर्ग की सीढ़ी बता रहा, कोई अपने मरने की झूठी तारीख बता रहा और चैनल उसे अंत तक दिखा रहे और अंत में बात इस पर खत्म हो जा रही कि मृत्यु का ग्रह टल गया, अब मैं नहीं मरूंगा, कोई सर्पेंटाइन रॉक को शेषनाग बता रहा कोई गॉड पार्टिकल को भगवान से जोड़ रहा। 
 
अब इस सब में खबर कहां है, ऐसे फिजूल की बातों पर एक्सपर्ट्स की राय लेने को ही खबर मानने लगी है नई पीढ़ी क्योंकि वह बिक जाएगा, टीआरपी बढ़ जाएगी, यही तरीका होता जा रहा है। सवाल यह है कि हम क्यों मान लेते हैं कि खबर यही है, क्योंकि आज खबर लिखने का तरीका लोग भूलते जा रहे हैं। यह गिरावट का दौर था, जो अब खत्म होने को है। अब लोग इससे बाहर आ रहे हैं। आज पत्रकार को ‘बिटविन द लाइन’ देखना होगा, यह नहीं कि हर बम-ब्लास्ट में दाऊद का हाथ ढूंढ़ लिया। कल और आज के पत्रकारों की तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि कल के ‘सेल्फ मेड जर्नलिस्ट’ आज के ‘शो काल’ डिग्रीधारी पत्रकारों से बेहतर थे। न्यूज को आज ‘कवर’ करने की जगह ‘क्रिएट’ किया जा रहा, उससे बचना होगा।
 
इस ‘कवर’ और ‘क्रिएट’ करने के फर्क और खतरों का उदाहरण देते हुए उन्होंने मथुरा संग्रहालय की एक घटना बताई कि वहां एक पंडा सीधे-सादे लोगों को विक्टोरिया की विशाल मूर्ति का परिचय यह कह दे रहा था कि ये कंस की मामी हैं, जब इस पर सवाल किया गया तो पंडे का जवाब था कि तब क्या यह आपकी मामी हैं। श्री शैलेश ने कहा कि कंटेंट के स्तर पर टेलीविजन ने खबरों को बहुत बिगाड़ा है, फलस्वरूप आज पत्रकारों की लिखने की आदत ही खत्म हो गई है, यह एक भयानक दौर रहा, जिससे हम बाहर आने की कोशिश कर रहे हैं। 2011-12 से कुछ चैनलों द्वारा सकारात्मक  शुरुआत हो चुकी है। प्रतियोगिता में ही सही हम अब खबरों की ओर लौट रहे हैं। मोबाइल, टैबलेट आदि के विस्तार के साथ ही नये तरह के ‘लाइव’ सामने आ रहे हैं। सोशल नेटवर्क की बात करते हुए उन्होंने कहा कि इस नेटवर्क से अखबार क्या टीवी भी फाइट नहीं कर पाएगा। पर टीवी की खबरों की अथेंसिटी अखबार जैसी नहीं होती, यह चुनौती रहेगी।
 
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता के संपादक ओम थानवी ने सोशल साइट्स की बाबत कहा कि फेसबुक बिल्कुल छिछोरा माध्यम है, पत्रकारिता नहीं है। अब तो वहां भी लोग पैसे देकर अफवाहें फैला रहे हैं। उससे ज्यादातर निकम्मे लोगों का काम चलता है। कभी-कभार वहां भी कुछ अच्छी शायरी और विचार मिल जाते हैं पर अधिकतर बैठे-ठाले की बातें रहती हैं। शैलेश के वक्तव्य के संदर्भ में उन्होंने कहा कि शैलेश ने निर्ममता से चैनलों के फूहड़पन को सामने रखा। अब तमाम चैनल फूहड़ मनोरंजन दिखा रहे, लतीफा सुना रहे। वह अच्छा लगता है तत्काल। रसगुल्ला अच्छा लगता है पर वह भोजन का विकल्प नहीं हो सकता। एक जमाने में गुलशन नंदा के किताबों की पांच लाख प्रतियां एक साल में बिक जाती थीं पर इससे वे बड़े लेखक नहीं हो पाये। ये लतीफेनुमा खबरें मूल्य नहीं बन सकते। आज हालत यह है कि सारे चैनल ‘पीपली लाईव’ का नत्था ढूंढ़ते रहते हैं। वे कहेंगे कि आप अपनी जगह बने रहिए हम खबरें लेकर वापस आ रहे, यह बहुत बुरा लगता है, यह दर्शकों को बनाना हुआ, ऐसे कब तक बेवकूफ बनाओगे। एक दूसरे पर कीचड़ उछालने को चैनलों पर परफार्मेंस कहा जा रहा, वे आज परफार्मेंस हायर कर रहे, इस पर सवाल उठना चाहिए।  
पत्रकारिता पढ़ाने वाले संस्थानों की हालत बयां करते श्री थानवी ने कहा कि वहां पत्रकारिता के साथ विज्ञापन, पीआर भी पढ़ाया जा रहा, यह तो चोरी और पुलिसिंग एक साथ सिखाना हुआ। आज अधिकांश पत्रकारिता संस्थान इवेंट मैनेजमेंट पढ़ा रहे हैं कि किसी फंक्शन में तंबू कैसे लगाना है, यह तक सिखा रहे हैं। उन्होंने कहा कि टीआरपी, सर्कुलेशन जरूरी है पर एक सीमा के बाद इस पर जोर देना पत्रकारिता की नैतिकता को बर्बाद करना है। यह तो शब्दों  का व्यापार हुआ, आप जूता क्यों नहीं बेचते? श्री थानवी ने कहा कि प्रिंट कभी खत्म नहीं होगा, यह कम-ज्यादा हो सकता है, अच्छी चीजें कम ही रहती हैं। 
 
शब्द की ताकत को टीवी नहीं पहचानता, अखबार इसे जानते हैं। अब मंडेला के निधन को ही लीजिए, किसी चैनल पर उन पर कुछ भी गंभीर नहीं आ सका जबकि न्यूयार्क टाइम्स ने मंडेला पर अपने ढंग की स्टोरी की, चैनल ऐसा कुछ सामने नहीं ला सके। उन्होंने कहा कि रेडियो को आज तक ढंग से एक्सप्लोर नहीं किया जा सका है, उसके माध्यम से भी बहुत कुछ किया जा सकता है। कार्यक्रम के अंत में कल्पतरु एक्सप्रेस के समूह संपादक पंकज सिंह ने कहा कि आज जिस तरह मीडिया की सांगोपांग व्याख्या हुई और दिग्गजों ने अपने विचार साझा किये वह नई पीढ़ी के लिए प्रेरक है।

Sabhar- Bhadas4media.com

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