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Saturday, 7 December 2013

तेजपाल के तहलके से क्या सीख सकता है मीडिया?

मुकेश कुमार
TARUN TEJPALA TEHLKAतहलका के मालिक तरुण तेजपाल अपनी महिला सहकर्मी के साथ बलात्कार के आरोप में जेल पहुँच चुके हैं। एक प्रतिष्ठित, शक्तिशाली एवं पहुँच रखने वाले पत्रकार, लेखक तथा कारोबारी का जेल पहुँचना एक बड़ी घटना है, क्योंकि इस तरह के आरोप में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। मीडिया संस्थानों में मालिकों, संपादकों और दूसरे ताक़तवर लोगों द्वारा महिला पत्रकारों के साथ यौन दुर्व्यवहार करना कोई नई बात नहीं है और ऐसा भी नहीं है कि किसी ने इसका खुलकर विरोध करने का साहस पहली बार दिखाया हो। ऐसा होता रहा है, मगर कोई भी मामला इस मुकाम तक नहीं पहुँचा। इसलिए ये बेहद महत्वपूर्ण है कि तरुण तेजपाल इस समय जेल में हैं और उनके बचने के आसार बहुत कम हैं।
ख़ास तौर पर पीड़ित पत्रकार ने जिस तरह से बार-बार सार्वजनिक स्तर पर अपन इरादों का इज़हार किया है उससे भी लगता यही है कि ये मामला अपने अंजाम तक पहुंचेगा। हालाँकि आशंकाएं ज़ाहिर की जा रही हैं और की जाती रहेंगी मगर इस बात के लिए भी आश्वस्त हुआ जा सकता है कि किसी तरह के प्रभाव का इस्तेमाल करके न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करने के रास्ते कम से कम फिलहाल तो बंद हो चुके हैं। ये एक बड़ी राहत की बात है क्योंकि बहुतों को लग रहा था और ये बात सुनियोजित ढंग से फैलाई भी गई थी कि तेजपाल अपनी पहुँच का इस्तेमाल करके बच सकते हैं। शायद उन्होंने इसके लिए कोशिश भी की हो, मगर एक तो बलात्कार संबंधी नए कानून की वजह से और दूसरे सामाजिक दबाव के चलते इसके लिए कोई गुंज़ाइश नहीं बची।
तेजपाल प्रकरण ने समाज के सामने कुछ सचाईयाँ पूरे तीखेपन के साथ रख दी हैं। पहला सच तो यही कि आम तौर पर जिहादी तेवर अपनाने वाले मीडिया के अंदर ही कितनी गंदगी मौजूद है और उस बारे में एक ख़तरनाक़ चुप्पी बनाए रखने का रिवाज़ भी। मीडिया उद्योग में काम करने वाले भले ही इस सच से वाकिफ़ रहे हों कि बहुतेरे संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर बैठे लोग कैसे महिलाओं के साथ यौन दुर्व्यवहार करते हैं या उनका शोषण करते हैं, मगर ये उन्हीं तक महदूद रह जाता था। इक्का-दुक्का घटनाएं समाचार बनती भी थीं तो उन्हें दबा दिया जाता था। लेकिन तेजपाल जैसे नामी पत्रकार द्वारा अपने ही संस्थान की एक महिला पत्रकार के साथ घटियातम हरकत करने की वजह से गटर का ढक्कन उठ गया है और अब ये सबकी नज़रों के सामने है।
दूसरी सचाई ये है कि इस बारे में पर्याप्त प्रमाण होने के बावज़ूद कि कामकाजी महिलाएं विभिन्न तरह से यौन उत्पीड़न का शिकार होती हैं, आम तौर पर उनको किसी तरफ से कोई भी संरक्षण प्राप्त नहीं होता। संस्थानों के अंदर उनकी शिकायतों के निष्पक्ष निपटारे की कोई व्यवस्था नहीं होती और कानूनी लड़ाई बहुत टेढ़ी, लंबी और महिलाओं के लिए बेहद अपमानजनक होती है। इसीलिए पीड़ितों को या तो स्थितियों से समझौता करना पड़ता है या फिर काम छोड़कर घर बैठ जाना पड़ता है। ग्वालियर की एक महिला द्वारा एक वैज्ञानिक पर लगाए गए इस आरोप से इसकी पुष्टि भी हो जाती है। इस महिला को आरोपी वैज्ञानिक शादी के बाद भी परेशान करता रहा और तब जाकर उसने पुलिस में शिकायत दर्ज़ करवाई।
तीसरी और सबसे बड़ी सचाई ये है कि जब तक महिलाएं जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं होंगी, हालात नहीं बदलेंगे। तहलका की पत्रकार ने जब बिना डरे अपने ज़ख़्म समाज के सामने खोलकर रख दिए तो तेजपाल के लिए बचना मुश्किल हो गया। हालाँकि ऐसे भी उदाहरण मौजूद हैं जिनमें महिला पत्रकार द्वारा इसी तरह का साहस दिखाने के बावज़ूद कुछ नहीं हुआ। दस साल पहले असम के एक अख़बार के संपादक पर एक महिला पत्रकार ने ठीक इसी तरह का आरोप लगाया था, मगर उस मीडिया संस्थान ने कोई कार्रवाई नहीं की। वह महिला आज तक अदालती लड़ाई लड़ रही है। न मीडिया ने उसकी ओर ध्यान दिया और न ही न्याय व्यवस्था से राहत मिली।
फिर छोटे शहरों और कस्बों में होने वाली घटनाओं पर मीडिया उतना ध्यान भी नहीं देता। अगर तहलका सरीखा कांड किसी छोटे कस्बे या शहर के किसी मीडिया संस्थान में हुआ होता तो उसे इस पैमाने पर मीडिया कवरेज नहीं मिलता। अगर घटना मीडिया से इतर संस्थानों की होती तो बहुत मुमकिन है कि सामर्थ्यवानों द्वारा उसे साध लिया जाता। ध्यान रहे कि मीडिया ने तेजपाल के मामले को इसलिए भी इतना उठाया क्योंकि इसके केंद्र में एक जानी-मानी हस्ती थी और इसका संबंध दिल्ली जैसे महानगर से था। ऐसे हाई प्रोफाइल मामलों में मीडिया की दिलचस्पी जगज़ाहिर है और ये मानना बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी होगी कि वह ऐसा हर मामले में करेगा। मीडिया का एक वर्गीय चरित्र है और वह उसे समाज के संपन्न तबके की ओर ले जाता है। वह उसी के दुख-दर्द को समझता है और उसी के व्याभिचारों को रस लेकर परोसता है। एक सेलेब्रिटी की सनसनी से भरी सेक्स-कथा उसके व्यावसायिक हितों को भी पोसती है, इसलिए वह उन पर टूट पड़ता है, उन्हें बेहिसाब कवरेज देता है। कल्पना कीजिए कि किसी साधारण से अख़बार या चैनल में काम करने वाली किसी गुमनाम महिला पत्रकार के बारे में क्या वह ऐसा हंगामा खड़ा करता, कतई नहीं।
अच्छी बात ये है कि समाज में महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यहार को लेकर नई चेतना पैदा हुई है और वह पीड़ितों के पक्ष में खड़ा होने लगा है। पिछले साल दिसंबर में दिल्ली में हुए बलात्कार कांड ने बलात्कारियों के ख़िलाफ़ उबलते गुस्से को अभिव्यक्त किया था। इस आंदोलन से समाज में बलात्कार या यौन दुर्वय्वहार को लेकर संवेदनशीलता बढ़ी। तेजपाल प्रकरण ने अब उस चेतना को और आगे बढ़ा दिया है। इस प्रकरण ने उन्हें महिलाओं पर यौन अत्याचार के इस पक्ष से अवगत करवा दिया है कि ज़्यादातर संस्थानों में महिलाओं के साथ यौन दुराचार हो रहा है और उन्हें रोका जाना ज़रूरी है। इससे ये भी साबित हो गया है कि अगर पीड़ितों को न्याय चाहिए तो वे सारे जोखिम उठाने होंगे जो एक महिला होने के नाते इस समाज में ऐसे मामलों में निहित होते हैं। अच्छी बात ये है कि निर्भया के मामले के बाद समाज में नई चेतना आई है और महिलाएं अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों को लेकर जागरूक हुई ही हैं, समाज में उनका समर्थन करने वाले लोगों की तादाद में भी बढ़ोतरी हुई है।
चूँकि तेजपाल कांड ने मीडिया को भी नंगा किया है इसलिए सबसे पहले तो उसे ही कार्रवाई करनी होगी। ज़्यादातर मीडिया संस्थानों में ऐसे मामलों की सुनवाई और निपटारे के लिए कोई व्यवस्था नहीं हो जबकि ये कानूनन ज़रूरी किया जा चुका है। तहलका जैसे बड़े और जिहादी तेवर रखने वाले मीडिया संस्थान ने ही जब इसकी अनदेखी या अवहेलना की तो बाक़ी की बात क्या की जाए। इसलिए सबसे पहले तो उन्हें अपने अंदर एक विश्वसनीय व्यवस्था कायम करनी चाहिए। यही नहीं, ऐसे मामलों में बहुत सख़्त रवैया अख़्तियार करना चाहिए ताकि किसी की हिम्मत ही न हो। दूसरे, संस्थान की प्रतिष्ठा बचाने के नाम पर परदा डालने की कोशिश कतई नहीं की जानी चाहिए। अकसर ऐसे मामलों में पीडितों पर दबाव डाला जाता है कि वे समझौता कर लें, जिससे अपराधी बच जाते हैं और उनके हौसले भी बढ़ जाते हैं। ज़ाहिर है ऐसा नहीं होना चाहिए और पीड़िता को हर संभव संरक्षण एवं सहायता देना चाहिए।
मुकेश कुमार
मुकेश कुमार
अपना घर ठीक करने के बाद मीडिया का दूसरा काम ऐसे संस्थानों की खोज ख़बर लेना है जहाँ या तो यौन दुराचारों की शिकायतों की सुनवाई और निपटारे के लिए कोई व्यवस्था नहीं है या है तो वह ठीक से काम नहीं कर रही। इससे संस्थानों को ज़िम्मेदार बनाने और वहाँ काम करने वाली महिलाओं में आत्मविश्वास पैदा करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा अगर मीडिया ढूँढ़-ढूँढ़कर यौन दुर्व्यवहार के मामलों को उजागर करने लगेगा तो उन लोगों में डर पैदा होगा जो मातहत काम करने वाली महिलाओं के शरीर को अपने ढंग से इस्तेमाल करना अपना हक़ समझते हैं। कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ होने वाले यौन दुर्व्यवहार को रोकने संबंधी विधेयक को पास करवाने के लिए सरकार पर दबाव बनाने का दायित्व भी मीडिया पर है।
(स्रोत – एफबी)
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. सुबह सवेरा से इन्हें ख्याति मिली. न्यूज़ एक्सप्रेस, मौर्या टीवी समेत कई चैनलों के प्रमुख के तौर पर काम कर चुके हैं)
Sabhar- Bhadas4media.com

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