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Thursday, 19 December 2013

रजत शर्मा की बेहूदगी पर उंगली उठा रहा हूं, मौत के लिये उसे जिम्मेदार मान रहा हूं : उज्जवल भट्टाचार्या

Ujjwal Bhattacharya : मैंने न खुर्शीद की ओर, न उस पर आरोप लगाने वाली युवती की ओर उंगली उठाई थी. रजत शर्मा की बेहुदगी पर ज़रूर उंगली उठा रहा हूं और खुर्शीद की मौत के लिये उसे ज़िम्मेदार मान रहा हूं.
सबसे दुखद बात यह होगी, अगर खुर्शीद की दुखद मौत और उसके साथ मीडिया के पेश आने के तरीके को इस सवाल के साथ जोड़ा जाय कि बलात्कार के आरोप में किसका पक्ष सही था. उस सवाल का फ़ैसला कानून के तहत होना था.

खुर्शीद, अपनी जान लेने के आपके फ़ैसले से गहरी असहमति है. कोई भी तर्क इस क़दम को वाजिब नहीं ठहरा सकता.
जर्मनी में लंबे समय तक रेडियो से जुड़े रहे वरिष्ठ पत्रकार उज्जवल भट्टाचार्या के फेसबुक वॉल से.

Samar Anarya : अपनी 'खबर' के असर का दावा नहीं किया तुमने indiatvnews.com aur Abhishek Upadhyay। … जीत का क्लेम बनता है तुम्हारा। प्रोफेसर Ashutosh Kumar और तरुण तेजपाल मामले में एफआईआर विरोधी 'नारीवादी' Kavita Krishnan के साथ...
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय समर के फेसबुक वॉल से.

Zafar Irshad : आज अखबार देख कर सुबह सुबह ही मन खिन्न हो गया...देश के सबसे ज़यादा पढ़े जाने वाले अखबार ने खुर्शीद अनवर की आत्महत्या की खबर को इस तरह से लिखा है, जैसे निर्भया बलात्कार काण्ड में आरोपी राम सिंह ने तिहाड़ जेल में आत्महत्या की थी..खबर का कंटेंट वही था, बस नाम बदले थे.. अफसोस हुआ कि जो शख्स कथित बलत्कार करने के कारण नहीं मरा, बल्कि मीडिया ट्रायल के कारण मौत को मुंह लगाने को मजबूर हुआ, उसके साथ ऐसा बर्ताव...बाकी के किसी अखबार में खबर दिखी जो बहुत ही अच्छी थी, वो अखबार था "जनसत्ता"...जिसने क्या बेबाकी से लिखा खुर्शीद साहिब की मौत के मायने क्या हैं.?. साधुवाद जनसत्ता और उसकी टीम को...
पीटीआई, कानपुर से जुड़े पत्रकार जफर इरशाद के फेसबुक वॉल से.

Jai Prakash Tripathi : खुर्शीद जैसा कोई एक घर टूटने के बहाने...... बशीर बद्र को सुन रहा था कि 'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में'। बस, ये ही पांच-सात शब्द मन में अटक गए। आगे की 'घर जलाने' वाली पंक्ति भूल कर मन इसी पेंच में कस गया कि कोई कैसे घर बनाता है, घर क्या सिर्फ दो-चार चुनिंदा दीवारों का नाम होता है, जब हम शहर बदलते हैं, नये ठिकाने पर होते हैं, पुराना ठिकाना छोड़ चुके होते हैं, शहर के किस्सी भी हिस्से में घूम-फिर कर मन वहीं क्यों लौट-लौट जाता है, अपने घरौंदे के बाहर का सब कुछ अजनबी या पराया क्यों बना रह जाता है?
जैसे कि हम पहले से इतने टूटे हुए, बिखरे हुए, अपने में सिमटे-दुबके हुए रहने के आदती हो चुके होते हैं कि चौखट के बाहर का कुछ भी चौखट के भीतर जैसा नहीं लग पाता है। हमारे एहसास में तब खलल पड़ता है, जब चौखट के भीतर कुछ टूटता है, जरा-सा भी। बाहर जितना भी ज्यादा टूट-फूट रहा हो, अंदर के तर्क ओढ़ कर हमारा मन उस कोलाहल से आगे भाग लेता है.......

इसलिए मुझे बशीर बद्र की पंक्ति 'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में'...सिर्फ 'मकान' के सेंस में नहीं लगती, उसके ढेर सारे अर्थ खुलने लगते हैं मेरे अंदर। अतीत में कितना-कुछ टूटता-बिखरता गया, वे कौन-कौन थे जिन्होंने मुझे तोड़ा-बिखेरा, बार-बार मैं खुद भी क्यों टूट जाया किया, क्या जाने-अनजाने मुझसे भी कहीं कुछ किसी के हिस्से का टूट-फूट गया, आत्महत्या के क्षणों से पहले, जैसे खुर्शीद!.....

और आज भी अक्सर टूट लेता हूं अपने मन की दीवारों के अंदर, क्यों? कैसे-कैसे बिखर लेता हूं अनायास....कि उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया, वह मेरे बारे में वैसा क्यों सोचता है, मेरे मन की दीवारों के अंदर अब कहकहे क्यों नहीं गूंजते, टूट गईं क्या ये दीवारें, उन विचारों के बवंडर क्यों नहीं उमड़ते, जिनमें समाया हुआ कभी हवा के संग संग दूर-दूर तक उड़ता चला जाता था, किताबें होती थीं, अलग-अलग जिंदगियों की मेले होते थे, यात्राओं और शब्दों की जादूगरी में किसी के भी पीछे ये घर अपनी जड़ें पीछे छोड़ कर भागने लगता था !

ये घर अब इतने सन्नाटे में क्यों है, चौखट के बाहर का सब कुछ फिर से इतना अजनबी क्यों हो लिया, किसने तोड़ दिया है इन दीवारों को, इन जैसे ढेर सारे सवालों के सिरे से जब भी मैं 'घर' को अपनी तरह से परिभाषित करने की कोशिश करता हूं, बाहर का सब टूटा-फूटा नजर आता है, जो छतें सही-सलामत दिख-जान पड़ती है, घूर-खंगाल कर उससे में प्रायः उदास हो लेता हूं.... जब उधर से भी उन्मुक्त हंसी कीबरसातें नहीं हुआ करतीं, न गीतों में कोई निराला या आवारा मसीहा आश्वस्त कर रहा होता है.... खुर्शीद के इस तरह जाने के बाद शायद टूटने का अर्थ छूटना भी होता होगा.....
अमर उजाला, कानपुर से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार जय प्रकाश त्रिपाठी के फेसबुक वॉल से.

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