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Wednesday, 18 December 2013

वो कॉन्‍स्‍टंट डिप्रेशन में हैं।

खुर्शीद को मैं तकरीबन एक साल से जानती थी। पिछले वर्ल्‍ड बुक फेयर में उनसे पहली बार मुलाकात हुई। मैं दोस्‍त बनाने और लोगों को अपनी जिंदगी में जगह देने में बहुत कॉन्‍शस हूं। मेरे आसपास हमेशा एक बाउंड्री लाइन खिंची होती है, जिसे लांघकर आसानी से कोई मेरी दुनिया में दाखिल नहीं हो सकता। लेकिन खुर्शीद से दोस्‍ती मैंने स्‍वीकार की। मुझे वो अच्‍छे इंसान लगे थे। हालांकि पिछली मुलाकातों में उनसे एक हजार असहमतियां भी थीं। पहले दिन से ही मुझे लगा था कि वो कॉन्‍स्‍टंट डिप्रेशन में हैं। हमेशा अपनी जिंदगी की त्रासदी और दुखों के बारे में बात करते थे और मुझे दुख के बारे में बात करना पसंद नहीं।
बात करेंगे। आओ, बैठो। लेकिन ये न बताओ कि बहुत दुख है, ये बताओ कि दुख दूर कैसे होगा। जिंदगी बेहतर कैसे होगी। ये न बताओ कि खुशी नहीं है, ये बताओ कि खुशी कैसे आएगी।
मेरा हर बार उनसे इसी बात पर झगड़ा हुआ क्‍योंकि मुझे लगने लगा था कि अवसाद में रहना उनके लिए बीमारी नहीं, बीमारी का इलाज बन गया था। वो अपने आपसे भागते दोस्‍तों में लोगों की भीड़ में शरण ढूंढा करते थे। वो पहचान नहीं पाते कि कौन सचमुच दोस्‍त है और कौन नहीं।
और दोस्‍त को न पहचान पाना ही उनकी मौत का कारण बन गया। वो गलत लोगों की संगत में पड़ गए थे।
वो अपनी जिंदगी के दुखों से लड़ने का रचनात्‍मक रास्‍ता न ढूंढ पाए और शिकार हो गए।

Sabhar= Manisha Pandey ke facebook wall se . .

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