मुज़फ़्फ़रनगर: क्या गले की हड्डी बन गया है हलफ़नामा?


हलफ़नामा
उत्तर प्रदेश सरकार से राहत राशि लेने वाले मुज़फ़्फ़रनगर दंगा पीड़ित परिवारों ने प्रशासन को हलफ़नामे पर लिखकर दिया है कि वे अब अपने गाँव वापस लौटना नहीं चाहते. दंगा पीड़ितों से लिया गया यह हलफ़नामा प्रशासन और सरकार के गले की हड्डी बन सकता है.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दंगाग्रस्त मुज़फ़्फ़रनगर और शामली जिलों में प्रशासन अब तक 1,800 परिवारों को पाँच लाख रुपये प्रति परिवार की मुआवज़ा राशि दे चुका है.
लेकिन अब भी सैंकड़ों ऐसे परिवार है जो मुआवज़े की आस में हैं और राहत शिविरों में रह रहे हैं. ये परिवार भी अपने गाँव वापस लौटना नहीं चाहते.
मुआवज़े के लिए दिए गए हलफ़नामे में दंगा पीड़ितों ने कहा है कि वे अब अपने गाँव नहीं लौटना चाहते हैं, लिहाज़ा उन्हें पुनर्वास के लिए सरकारी मदद दी जाए.
सरकारी नोटीफ़िकेशन
सरकार ने शर्त रखी है कि यदि कोई परिवार वापस अपने गाँव लौटा तो उसे मुआवज़ा भी लौटाना होगा.
शुरू में सरकार ने हलफ़नामे में शर्त लगाई थी कि जो परिवार मुआवज़ा ले रहे हैं वे अपने गाँव नहीं लौट पाएंगे. हालांकि बाद में सरकार ने यह शर्त हटा ली. लेकिन यह हलफ़नामा अब भी विवादित बना हुआ है.
सरकार ने दरअसल कुल नौ गाँवों को दंगाग्रस्त घोषित कर वहाँ से पलायन कर गए सभी दंगा पीड़ित परिवारों को मुआवज़ा देने की घोषणा की है.
सरकार ने शर्त रखी है कि यदि कोई परिवार भविष्य में अपने गाँव लौटता है तो उसे मुआवज़ा राशि वापस करनी होगी. यदि राशि वापस नहीं की गई तो यह ऐसे ही वसूल की जाएगी जैसे भू-राजस्व वसूल किया जाता है.
लेकिन सामाजिक कर्यकर्ता साजिद हुसैन मुआवज़े पर ही सवाल उठाते हैं. वे कहते हैं, "जो लोग गाँव नहीं लौट सकेंगे उनकी संपत्तियों का क्या होगा. क्या उनकी संपत्तिया वाजिब दाम पर बिक पाएंगी. यह हलफ़नामा दंगा पीड़ितों को भारी पड़ेगा."
वहीं राहत कैंपों में रह रहे अधिकतर लोग मुआवज़े मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं जबकि प्रशासन का कहना है कि सभी हक़दार लोगों को मुआवज़ा बांटा जा चुका है.

अनुचित माँग

दंगा पीड़ित
हज़ारों दंगा पीड़ित अब भी शामली और मुज़फ़्फ़रनगर के राहत कैंपों में रह रहे हैं.
मुज़फ़्फ़रनगर के जिलाधिकारी कौशल राज शर्मा के मुताबिक दंगा ग्रस्त गाँवों से 925 ऐसी याचिकाएं प्रशासन के पास आई हैं जिनमें परिवार के सदस्यों ने खुद के अलग परिवार होने का दावा करते हुए मुआवज़े की माँग की है. कौशल राज कहते हैं, "चूँकि क़ानूनी तौर पर उन्हें अलग परिवार नहीं माना जा सकता इसलिए उनके मुआवज़े की माँग अनुचित है."
कौशल राज शर्मा बताते हैं, "बहुत से लोग अपने घर वापस लौट चुके हैं. आगजनी और हिंसा प्रभावित 9 गाँवों को आर्थिक सहायता देने के लिए चिन्हित किया गया. हमने अब तक 90 प्रतिशत प्रभावित परिवारों को मुआवज़ा दे दिया है."
कुटबा गाँव के कल्लू को पाँच लाख रुपये मुआवज़े में मिले हैं. गाँव में दोबारा न बसने की शर्त पर कल्लू कहते हैं, "सरकार ने हमसे लिखित रूप में लिया है कि हम दोबारा अपने गाँव कुटबा में जाकर नहीं बस सकते. हमसे सरकार ने हलफ़नामे पर दस्तख़त करवाए हैं."
हालाँकि कल्लू यह भी कहते हैं कि बाद में सरकार ने गाँव न लौटने की शर्त हटा दी है.

क्या होगा

कल्लू और इक़बाल
कल्लू और इक़बाल को मुआवज़ा मिल गया है और वे गाँव लौटना नहीं चाहते
पाँच लाख के मुआवज़े पर कल्लू कहते हैं, "गाँव में हमारा घर था, ज़मीन थी. पाँच लाख में क्या आएगा लेकिन ये भी राहत ही है. जो मिला है सही है. अल्लाह हिम्मत देगा तो हम दोबारा मेहनत करके फिर से घर-ज़मीन बना लेंगे."
हलफ़नामे की भाषा पर कौशल राज कहते हैं, "हलफ़नामे में यह लिखवाया गया था कि पीड़ित अपनी अचल संपत्ति को हुई क्षति के लिए मुआवज़े की माँग नहीं कर सकेंगे. इसका मतलब यह बिलकुल भी नहीं था कि संपत्ति पर उनका हक़ नहीं रहेगा. वे चाहे तो अपने घर किराये पर दे सकते हैं."
मुआवज़ा लेने वाले सभी लोग कहीं भी जाकर संपत्ति ख़रीदने या घर बनाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं.
हलफ़नामे के ज़रिए गाँव न लौटने का अधिकार छीनने के सवाल पर डीएम कहते हैं, "ये बिलकुल ग़लत तरीके से प्रचारित किया गया है. संपत्ति पर मालिकाना हक़ उन्हीं का रहेगा जो उसके मालिक थे. सरकार कभी भी संपत्ति को ज़ब्त नहीं कर सकती है. यदि कोई निजी कब्ज़ा करने की कोशिश करता है तो ये लोग उसके ख़िलाफ़ अदालत या पुलिस के पास जा सकते हैं."
मुआवज़ा नीति को सही ठहराते हुए जिलाधिकारी कहते हैं, "जितने भी जाँच दल और आयोग मुज़फ़्फ़रनगर आए थे उनसे इन पीड़ितों ने यही माँग रखी थी कि उन्हें दोबारा ज़िंदगी शुरू करने के लिए आर्थिक मदद दी जाए."
कौशल राज शर्मा
जिलाधिकारी कौशल राज शर्मा के मुताबिक दंगा पीड़ितों का अपनी संपत्ति पर अधिकार बरक़रार रहेगा
वो कहते हैं, "इन लोगों का कहना था कि वे अपने गाँव वापस नहीं जाना चाहते हैं. इन लोगों की गाँव न लौटने की माँग को ही स्वीकार करते हुए सरकार ने पाँच लाख रुपये प्रति परिवार की सहायता राशि की घोषणा की थी ताकि ये लोग कहीं और जाकर रह सकें."

ख़तरनाक भविष्य

हलफ़नामे में दंगा पीड़ितों ने लिखकर दिया है कि वे अब अपने गाँव लौटना नहीं चाहते. अपने गाँवों से निकले मुसलमान अब शाहपुर, बसी कलाँ और कांधला जैसे स्थानों पर एक साथ ज़मीन खरीद कर घर बना रहे हैं.
हिंसाग्रस्त कुटबा गाँव को जो रास्ता मुख्य मार्ग से जोड़ता है उसी रास्ते के बसी कलाँ मोड़ पर कुटबा से आए मुसलमान परिवार एक साथ ज़मीन ख़रीदकर अपने घर बना रहे हैं.
सामाजिक कार्यकर्ता और सुप्रीम कोर्ट में दंगों की जाँच के लिए याचिका दायर करने वाले शाहिद हुसैन कहते हैं, "धार्मिक आधार पर यह विभाजन मुज़फ़्फ़रनगर और आसपास के इलाक़ों के लिए भविष्य में ख़तरनाक साबित होगा."
राहुल गाँधी
राहत शिविरों में पहुंचे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने पीड़ितों से गाँव लौट जाने की अपील की
उन्होंने कहा, "यदि किसी मुसलमान बहुल इलाक़े में किसी जाट पर हमला हुआ तो इसके बहुत हिंसक परिणाम होने की संभावना है. बेहतर यह होता कि गाँव छोड़कर गए लोगों को फिर से गाँव में ही बसाया जाता."
मुसलमानों के गाँव न लौटने के सवाल पर हिंसा प्रभावित गांवों के जाट समुदाय के लोग कहते हैं, "जिन्होंने मुआवज़ा ले लिया है वे अब गाँव लौटकर क्या करेंगे."
कौशल राज शर्मा कहते हैं, "दंगे को अभी तीन महीने हुए हैं और हालात बेहतर हो रहे हैं. उम्मीद है भविष्य में सामाजिक ताना बाना और बेहतर हो जाएगा. कुछ गाँव जहाँ से मुसलमान पूरी तरह चले गए हैं वक़्त के साथ उनके हालात भी बदल जाएंगे."
जिलाधिकारी हालात बदलने की उम्मीद तो ज़ाहिर करते हैं लेकिन हालात कैसे बदलेंगे, बाक़ी लोगों की तरह ही उनके पास भी इस सवाल का कोई जवाब नहीं है.
Sabhar- bbc
मुज़फ़्फ़रनगर: क्या गले की हड्डी बन गया है हलफ़नामा? मुज़फ़्फ़रनगर: क्या गले की हड्डी बन गया है हलफ़नामा? Reviewed by Sushil Gangwar on December 26, 2013 Rating: 5

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