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Monday, 2 December 2013

इनबाक्स संदेशों से आपका मन भर गया हो तो तहलका हिंदी का नया अंक बाजार से ले आइए

Pooja Singh : कतई जरूरी नहीं है कि अपने साहस का प्रदर्शन करने के लिए हर बेहूदा सवाल का जवाब दिया जाए. हर बात बोल कर बताई जाए. उस उन्मांदी भीड़ को भरोसे में लिया जाए जो पहले ही यह तय कर चुकी हो कि एक अपराध की आड़ लेकर उस आईने को ही तोड़ दिया जाए जिसमें अपनी शक्ल देखते उसे हर 15वें दिन शर्मिंदा होना पड़ता है.
कुछ काम कहने के बजाय करके दिखाने चाहिए. अंधा क्या चाहे दो आंख की तर्ज पर नैतिकता के पहरुए अचानक अपने अपने ककून से बाहर निकल आए. उत्तरी ध्रुव पर मानो अचानक सवेरा हुआ. साध पूरी हुई, बरसों की कोई मनौती जैसे. पुराने स्कोर सेटल किए गए. प्रतियां जलीं, नारे लगे, तहलका को हलका करार देते हुए बंद करा देने पर उतारू सुधीजनों ने जिस शातिर तरीके से एक व्यक्ति व एक जुझारू व लड़ाकू पत्रिका को एकमेक कर दिया वह देखने लायक था.
संपादकीय टीम की फेसबुक वाल पर जाकर सरोकार की आड़ में वमन किया. अपनी जान जोखिम में डालकर अपने पाठकों के लिए खबरें लाने वाले युवा पत्रकारों समेत पूरी हिंदी टीम को ताने दिए. अगर तहलका हिंदी का नियमित पाठक होने के बाद भी आपको लगता है कि वे महज उन चंद हजार रुपयों के लिए यह काम करते हैं जो उन्हें हर माह की शुरुआत में बतौर वेतन मिलते हैं तो मुझे आपसे कुछ नहीं कहना है. बीते दिन दुख, स्तब्धता, निराशा व अंदेशों से भरे हुए थे. निराशा के बादल पूरी तरह छंटे नहीं लेकिन सबके हाथ अपने बाजू वाले का सहारा बने रहे, इस बीच पाश की कविता जेहन में लगातार गूंजती रही-

हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की ज़रुरत बाकी है
जब तक बंदूक न हुई, तब तक तलवार होगी
जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की ज़रुरत होगी
और हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे
कि लड़े बगैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेंगे
अपनी सजा कबूलने के लिए
लड़ते हुए जो मर गए
उनकी याद ज़िन्दा रखने के लिए
हम लड़ेंगे

बहरहाल, इनबाक्स संदेशों से आपका मन भर गया हो तो तहलका हिंदी का नया अंक बाजार से ले आइए. आपको पता चल जाएगा कि ‘हमने तहलका क्यों नहीं छोड़ा?’
तहलका हिंदी में कार्यरत पूजा सिंह के फेसबुक वॉल से

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