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Monday, 11 November 2013

एक सिलेबस कंटेंट सप्लायर का सेंटी हो जाना

Vineet kumar .. 


मेरे जीवन का ये "चेका-चेकी काल" है. मीडिया के बच्चों की कालजयी परियोजना कार्य और प्रश्नोत्तर चेक कर रहा हूं. कंटेंट की बात बाद में, पहले तो ये कि इनमे से कुछ तो इतने मंहगे कागज पर काम करते हैं कि उन कागजों पर हम और आप किसी के लिए प्रेम पत्र भी न लिखें. उपर से रंग-बिरंगे स्केच पेन से नाम से लेकर विषय ऐसे लिखते और फूल-पत्ती,झंडी-मुंडी लगाकर सजाते हैं कि लगता राजस्थान एम्पोरियम से मटीरियल लाकर चुनरी प्रिंट की ब्लाउज सिलने का अभ्यास कर रहे हों. कंटेंट के उपर पैकेजिंग इतना हावी है कि हम जैसे सिकंस( सिलेबस कंटेंट सप्लायर) भी भकुआ जा रहे हैं. लग रहा है अखबार के लिए काम करेंगे तो क्या पता चाबड़ी बाजार से शादी कार्ड पर संपादकीय लिखेंगे. खैर
इन परियोजना कार्य और लिखे से गुजरते हुए भावों और विचारों की लगातार आवाजाही चलती रहती है. देर रात कभी अपने आप ही मुस्करता हूं. कुछ तो फिल्मी डायलॉग से लगते हैं- उसकी मौत सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी, समाज में भरोसे की भी हत्या है..:). कुछ को पढ़कर मन करता हूं- लो बेटाजी, पहले स्निकर की एक बाइट मार लो, तब आगे कालजयी परियोजना कार्य में तल्लीन होना. कुछ के माता-पिता को मन करता है चिठ्ठी लिखूं- आप अपने होनकार को प्लीज,प्लीज किसी और काम में मत लगाइएगा और शादी तो अभी पांच साल बिल्कुल भी मत करने दीजिएगा, ये आपके लिए नहीं देश के लिए बना है. हमे इन बच्चों के लिखे से गुजरते हुए मोह सा होता है- ये मीडिया मंडी में जाएंगे तो मीडिया को लेकर इनकी कोमल भावनाओं का क्या होगा ?

कुछ को पढ़कर बुरी तरह हताश हो जाता हूं..लगता है कि कनपटी को हल्के गुलाबी सेंक दूं लेकिन नहीं, हम पढ़ते-पढाते, कंटेंट सप्लाय करते हुए एक बेहद ही मुलायम रिश्ते से बन जाते हैं..ये बच्चे हमारे लिए देखते ही देखते बहुत कुछ हो जाते हैं लेकिन धक्का तो लगता ही है..एक-एक बिन्दु को बताने-समझाने में हम राकेश( पीपली लाइव का पत्रकार) की तरह सेंटी हो जाते हैं- बस मौका मिले मैम, जान लगा देंगे..लेकिन इस जान लगा देनेवाले अंदाज के बीच जब कॉपियों से गुजरता हूं तो सब जैसे कपूर की तरह उड़ जाता है. लगता है लाइब्रेरी में दुग्गी की शक्ल में पड़ी चंद किताबों( जिन्हें किताब कहने में मुझे अक्सर दिक्कत रही है) और छात्रों के बीच हम जैसे सिकंस कहीं नहीं है. हम इन बच्चों और अपने बीच के जिन रिश्तों को लेकर ताव में रहते हैं, अचानक इस तरह बेदखल कर दिए जाने से उसी बने-बनाए मुहावरे की तरफ लौटने का खतरा महसूस करते हैं- आप कुछ भी कर लो, ये वही लिखेंगे जो दुग्गी में लिखा है, इनकी प्रतिबद्धता इनके प्रति है, आपके प्रति नहीं. एकबारगी ही इन कॉपियों, परियोजना कार्य को देखकर लगता है कि ये जो कर रहे हैं, इससे इन्हे लगाव नहीं है, यकीन नहीं है कि मेरी दुनिया यही है.

हम इन बच्चों के साथ बिताए वक्त को, कैंटीन की चाय का साथ, सेमिनार-वर्कशॉप के साथ के लंबे-लंबे वक्त किसी सिनेमाई फेयरवेल कार्यक्रमों की यादों में उछाल दिए जाने भर की कामना से मौजूद नहीं देखते.हम इन साथ को इनके काम में, इनके लिखे में देखने की हसरत रखते हैं. हम चाहते हैं कि इनकी कॉपियों में जीवन शामिल हो, मीनारों से उखाड़कर चस्पा दिए गए बेजान पत्थर जैसे शब्द भर नहीं..हम काई पोचे को याद करते हैं. देर रात इनकी कॉपियों के शब्द थ्री इडियट्स की ब्लैकबोर्ड पर लिखे शब्दों-संकेतों,अल्फा-बीटा-गामा उड़-उड़कर मेरे सिरहाने घेर लेती है..क्या सच में कुछ भी नहीं बदल सकता..चीजों को नए सिरे से सोचने की कोशिश, टूटकर,मेहनत कर लिखने की जद्दोजहद..हम पता नहीं कहां-कहां भटक जाते हैं सोचते हुए कब सुबह के पांच बज जाते हैं, पता ही नहीं चलता. बेतहाशा मैं कोई एक पंक्ति-कोई एक उम्मीद खोजता हूं, बस नींद आ जाने के लिए..आखिर में मेरे बेहद प्यारे दोस्त की लाइन याद आती है- साल-दो साल-चार साल में कोई तो एक-दो मिलेंगे ऐसे बच्चे जिन्हें देखकर तुम अपने आप सिलेबस कंटेंट सप्लाय यानी पढ़ाने की दुनिया में यकीन कर सकोंगे.. मुझे हल्की-हल्की नींद आने लगती है.

Sabhar- Hunkaar.com

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