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Monday, 11 November 2013

मोबाइल चोली में रखबू त सिम लॉक हो जाई

♦ मनोज भावुक
भी अभी प्रवासी महासंघ नोएडा का छठ उत्सव 2013 देखकर घर लौटा हूं। भोजपुरी सुपर स्टार रवि किशन, गायिका कल्पना और देवी मुख्य आकर्षण थे और सच पूछिए तो नोएडा स्टेडियम में भारी भीड़ इन्‍हीं को देखने सुनने इकट्ठी हुई थी। ये तीनों मेरे मित्र हैं और प्रिय भी हैं। देवी के कई इंटरव्यू कर चुका हूं और मंचों पर इनके साथ स्टेज शोज भी होस्ट कर चुका हूं। इसलिए इनकी रुचि जानता हूं। पद्मश्री शारदा सिन्हा, मालिनी अवस्थी और देवी भोजपुरी की लोकप्रिय और एक हीं धारा की लोक गायिकाएं हैं … लेकिन इनमें देवी खांटी भोजपुरी माटी की खांटी गायिका हैं। आवाज भी यूनिक और अनोखा है। शारदा सिन्हा और मालिनी अवस्थी के लिए भोजपुरी यशोदा मइया हैं … पर इन तीनों में समानता यह है कि तीनों गायिकाओं ने भोजपुरी लोक गायिकी को न सिर्फ ऊंचाई दी है, वरन उसका मान भी बढ़ाया है। आज के कार्यक्रम में भी देवी ने छठी मइया से शुरू कर अपने तमाम चर्चित गीतों के साथ बहे के पुरुआ रामा से सचमुच पुरुआ बयार बहा दिया।
अब बात कल्पना की। मैं इनकी आवाज का कायल हूं। भोजपुरी सिनेमा के 50 वर्षों के इतिहास पर गौर करें तो कल्पना ने जितने गाने भोजपुरी फिल्मों में गाये हैं, उतना किसी और गायिका ने नहीं गाये। हां, यह भी सही है कि उनमें अश्लील गीतों की तादाद ज्यादा है पर साथ ही यह भी सच है कि “लीगेसी ऑफ़ भिखारी ठाकुर” भी कल्पना की ही देन है। उन्होंने मुझे 2010 में कोलकाता में आयोजित भिखारी ठाकुर फेस्टिवल में इस अलबम के प्रोमोशन और मंच संचालन के लिए दिल्ली से कोलकाता बुलाया था। मैं कल्पना को जानता हूं। अच्छे गीतों की तड़प है उनमें और वो अच्छे गीत ही गाना चाहती हैं। आज भी छठी मइया के गीत गाने के बाद जब आयोजकों ने उन्हें “गमछा बिछाई के” गीत गाने को कहा तो उन्हें संकोच हो रहा था। वह बार बार कह रही थीं कि छठ उत्सव है … छठी मइया के गीत होने चाहिए। फिर उन्होंने दर्शकों से पूछा … वो भी “गमछा बिछाई के” ही सुनना चाह रहे थे … सो सुना दिया कल्पना ने।
अब बात रवि बाबू की। सुपर स्टार रवि किशन। 2002 में इनका एक इंटरव्यू किया था। मोहन जी प्रसाद की फ़िल्म “सईया से कर द मिलनवा हे” राम के सेट पर। यह रवि बाबू की दूसरी भोजपुरी फ़िल्म है। तब और अब के रवि किशन में बहुत फर्क है। अब इनका कद बहुत ऊंचा हो गया है और ये जनता की नब्ज भी जानते हैं। आज स्टेडियम में उमड़ी भीड़ की मनसा को भांप गये रवि बाबू … हर हर महादेव के बाद सुनाया … लहंगा उठा देब रिमोट से … मोबाइल चोली में रखबू त सिम लॉक हो जाई। जनता को क्या चाहिए … मनोरंजन। मनोरंजन हो रहा था। आयोजक खुश … जनता खुश … कलाकार खुश। और क्या चाहिए? मन गया छठ उत्सव … अब पता नहीं छठी मइया को ये गीत कैसे लगे? … मैं भीड़ को चीरते हुए बाहर निकला। कुछ लोग कह रहे थे … खूब जकवलस नू रवि किसनवा … फिर किसी और ने कहा – नास त देहलन। … किसी और ने फुसफुसाया … कुछ नया कइलन ह का? … सरसती पूजा में हिंदी गाना नइखे बाजत – तू चीज बड़ी है मस्त मस्त, चाहे चोली के पीछे क्या है? बोका कहीं का … ई कुल्हि ना होखी त भीड़े ना जूटी … भीड़ ना जुटी त नेते ना अइहें … फेर आयोजन केकरा खातिर? चलें है परवचन देने। … और वह आदमी फिर गुनगुनाने लगा – … मोबाइल चोली में रखबू त सिम लॉक हो जाई।
जय हो ..जय हो छठी मइया
मैं उस गाते हुए नौजवान की मस्ती को देख रहा था। छठ उत्सव के इस संदर्भ से हटकर एक फ़िल्म समीक्षक के नजरिये से सोचने लगा … चलो रवि किशन ने कुछ लोगों को मस्त तो किया, खुश तो किया। अधिकांश भोजपुरी फिल्में ऐसे ही लोगों को मस्त और खुश करने के लिए बनायी जाती हैं। रवि किशन बिंदास हैं … अंदर बाहर एक जैसे हैं। ज्यादा दिमाग पर जोर नहीं दिया … लोगों के आनंद के लिए जो जी में आया गा दिया … अश्लील ही सही। पर थोड़ी मस्ती के लिए की गयी यह शाब्दिक अश्लीलता है … गलत या सही आज के समय में विवाद का विषय है। पर यहां नीयत साफ़ है … आनंद के लिए किया गया भोंडा प्रयास है … पर बड़ी बड़ी बातें करने वाले सफेदपोश और प्रवचन करने वाले उन बाबाओं से ज्यादा खतरनाक नहीं जो बातें तो बड़ी श्लील और अच्छी-अच्छी करते हैं, पर अंदर से एक खूंखार जानवर होते हैं।
[मनोज भावुक लेखक-पत्रकार हैं। भोजपुरी के लिए समर्पित व्‍यक्तित्‍व हैं।
sabhar- Mohallalive.com

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