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Wednesday, 13 November 2013

न उम्र की सीमा हो........!


न उम्र की सीमा हो........!
अपने पास टेबल कुर्सी कभी नहीं रही पर लिखता बहुत था। एक काठ की बकसिया के ऊपर कागज रखता और चालू हो जाता। रोजाना एक या दो लेख तो लिखता ही। फिर जब संपादक हो गया तो स्टेनो मिल गया और कलम बंद। बोला और लिखा दिया। कंप्यूटर का युग आया तो उसके की बोर्ड को चलाना तक नहीं सीखा आखिर अपने पास पीए जो था। लेकिन जब चंडीगढ़, कोलकाता और कानपुर में संपादकी करने के बाद दोबारा दिल्ली आया तब पीए नहीं दिया गया। मैने तब के अपने समूह संपादक श्री शशिशेखर से कहा कि मुझे पीए दिया जाए वर्ना मैं लिखूंगा कहां से? उन्होंने कहा कि शुक्ला जी यहां पीए सिर्फ समूह संपादक को ही मिलता है। देखिए किसी भी अन्य संपादक के पास नहीं है। तब वहां मेरे अलावा श्री Govind Singh संपादक थे। वे कंप्यूटर के की बोर्ड पर काम कर लेते थे। मैने उनसे कहा कि गोविंद जी मुझे भी सिखा दीजिए। उन्होंने मुझे एक कागज पर बना हुआ की बोर्ड दे दिया जिसे मैने अपने डेस्कटॉप पर चिपका दिया और तीसरे ही दिन उनको खुद टाइप किया हुआ लेख दे दिया। रेमिंग्टन पर टाइप करने में मैं निष्णात हो गया। और इसके बाद तो धुंआधार चालू हो गया।
लेकिन आज Chandra Gaurav सुबह-सुबह घर आए और बोले सर आप इतना लिखते हैं तो सीधे यूनीकोड में लिखा करिए इससे जो आप चाणक्य में लिखकर कनवर्ट करते हैं उसका झंझट खत्म और फिर सीधे फेसबुक पर टाइप करिए। मैने कहा ठीक तुम मुझे सिखा दो। गौरव मुझे फोनेटिक के फोंंट दे गए हैं तथा मेरे लैपटॉप को भी उसके अनुरूप कर दिया है। तो मित्रों मेरे कहने का आशय यह कि अब मैं फेसबुक पर इतना तेज लिख सकूंगा कि वैसे ही लोग मुझसे दुखी हैं अब और दुखी हो जाएंगे। हमारे मित्रSanjaya Kumar Singh कहते हैं कि शंभू जी लोग तो बैल को आमंत्रित करते हैं आप तो सीधे-सीधे सांड़ों को लाल कपड़ा दिखा देते हो। अब जो होगा सो देखा जाएगा।
पर आप इतना समझ लो कि समझने और सीखने की मेरी क्षमता इतनी जबर्दस्त है कि मैने 53 साल में बाइक चलानी सीखी और 57 में कार चलाना। इतनी तेज चला लेता हूं कि शायद ही यमुना एक्सप्रेस वे पर मेरे से आगे कोई निकल पाता हो। सीखने की कोई उम्र नहीं होती और उत्साह जीवन में कभी मरता नहीं है। जिसका उत्साह मर गया वो समझो वो मरा हुआ ही पैदा हुआ।

शंभूनाथ शुक्ल ji ki facebook wall se sabhar lekar .. 

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