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Monday, 21 October 2013

मछली, कुत्ता और पुरुषत्‍व के बहाने मनुष्‍यता का सिनेमा

♦ उमेश पंत
मामी के दूसरे दिन तीन फिल्में देखी। तीनों ही ऐसी जिन्हें देखने के बाद लगा कि उनके साथ बिताया गया वक्त दूर तक साथ रह जाने वाले कुछ अच्छे अनुभवों में जुड़ गया हो।
एक मछली सा अकेलापन
आज की पहली फिल्म द अमेजिंग कैटफिश एक लड़की क्लौडिया की कहानी है, जो अस्पताल में एक दूसरी मरीज मार्था से मिलती है। मार्था जिसे उसके पति ने छोड़ दिया है, क्लौडिया को कुछ दिन अपनी तीन बेटियों और एक बेटे के अपने परिवार के साथ रहने का न्यौता देती है। धीरे धीरे क्लौडिया तीनों लड़कियों मैरियाना, वैंडी और एली के करीब आती है, साथ ही उसकी उनके छोटे भाई अरमांडो के साथ भी अच्छी बनने लगती है।
एक अजनबी जो एक परिवार के साथ जुड़ता है और उससे अपना अकेलापन बांटता है। एक परिवार जो साथ रहता तो है लेकिन एक समुच्चय के भीतर उस परिवार में कई तरह के अकेलेपन हैं, जो दरअसल साथ रहने की तरह का एहसास देते हैं। एक बीमार मां जो अस्पताल में रहती है, जिसके अकेलेपन को अस्पताल के बाहर रहकर नहीं समझा जा सकता। बेटियां जो अपनी बीमार मां से दूर हो जाने के संभावित डर से जूझ रही हैं पर ये डर कभी बयां नहीं किया गया। और इस सब के बीच क्लौडिया जो इस कई तरह के अकेलेपन को अपने अकेलेपन के चश्मे से देख रही है। क्लौडिया एक मदद है जो मां की बीमारी के वक्त तक काम आती है, मां की मौत के बाद उसका उस परिवार के साथ होना कहीं अहमियत नहीं रखता। मां की मौत हो जाती है और क्लौडिया अपने अकेलेपन को ओढ़े किसी और रास्ते पर निकल पड़ती है।
एक स्त्री के पुरुषत्व की कहानी कहता ‘किस्सा’
दूसरी फिल्म थी किस्सा। भारत-पाकिस्तान के विभाजन के उस दौर में जब सिख अपनी रिहाइश के लिए जूझते हुए पाकिस्तान के पंजाब से भारत के पंजाब आ रहे थे, उनसे उनके पैतृक घर छूट रहे थे। उस दौर के भूगोल से अनूप सिंह एक किस्सा ढूंढ़ कर लाते हैं। विस्थापित हो रहे सिखों में से एक अंबर सिंह अपने परिवार को लेकर एक नया घर बसाने निकल पड़ता है। कहानी वक्त में छलांगें लेती है। अब एक नया घर है, पत्नी है, दो बेटियां हैं, पर बेटा नहीं है। मर्द नहीं है जो एक पुरुषवादी समाज में परिवार को अगली पीढ़ी दे सके। जिसके होने से परिवार का तथाकथित भविष्य संवर जाये। ऐसे वक्त में जब अंबर सिंह बेतरह एक बेटे की चाहत में छटपटा रहा है, उसकी पत्नी एक संतान को जन्म देती है। अंबर सिंह के लिए कंवर सिंह के रुप में एक बेटे का जन्म होता है। वो कंवर को एक बेटे की तरह पालता है। बेटियों के सामने उसे हर तरह से वरीयता दी जाती है। वो ट्रक चलाता है। अपने पिता का व्यापार संभालता है। उसे आंच भी आना अंबर सिंह को गंवारा नहीं है। एक तरह का पागलपन है जो बेटे की चाह में उन सारी प्राकृतिक घटनाओं को, शारीरिक बदलावों को नजरअंदाज कर रहा है। सब कुछ आंखों के सामने साफ है, पर सब कुछ बेमायने है। मायने हैं तो उस चाह के जो बिना बेटे के पूरी नहीं होती। कंवर का नीली नाम की एक छोटी जात की लड़की से ब्याह दिया जाता है। कंवर नीली को और नीली कंवर को पसंद करते रहे हैं। शादी की रात एक राज खुलता है, एक राज जिसे जानकर नीली भौंचक्की रह जाती है। अंबर सिंह का रचा, कंवर और उसकी मां का जीया एक झूठ नीली के सामने बेपर्दा हो जाता है… कि एक लड़के के रूप में पली पढ़ी संतान दरअसल एक लड़की है।
कंवर अपने अस्तित्व से लड़ने के लिए अभिशप्त है। अपनी ही उन दो पहचानों के बीच जूझती हुई, जिनमें एक सच है, एक झूठ। वो जो झूठ है समाज उसे एक सच के रूप में जानता है। और वो जो सच है समाज अब उसे स्वीकार नहीं कर सकता। पर कंवर के लिए उस सच को अपनाना जरूरी है। एक झूठ आखिर कब तक जिया जा सकता है, वो भी तब जब वो आपकी लैंगिक पहचान से जुड़ा हो। नीली के भीतर की स्त्री, कंवर के भीतर की स्त्री को समझती है। वो उस सच से जूझने में अब तक पुरुष बनकर जिये अपने उस पति की मदद करती है, जो दरअसल एक स्त्री है।
कुर्ता पजामा पहन कर जिये कंवर के लिए आगे की जिंदगी सलवार कमीज पहनकर जीना क्या संभव हो पाएगा? उस नीली को जिसने अनजाने ही एक स्त्री से प्यार कर लिया है क्या समाज अपना पाएगा? उस अंबर सिंह को जिसने संतान की चाह में अपनी ही बहू से संबंध बनाने की कोशिश की और इस कोशिश के विरोध में उसे अपनी ही बेटी ने गोली मार दी, क्या वो अंबर सिंह अपनी आत्मा को कभी संतुष्ट कर पाएगा? पूरी फिल्म इच्छाओं के उन्माद से उपजे असंतोष की उदासी को खुद में ओढ़े हुए है। कई अधूरी इच्छाएं हैं, जो यथार्थ के परे किसी दूसरी दुनिया में यथार्थ बन जाने के लिए भटक रही है। अपने न होने में ही अपने होने को तलाशते उन भटकावों में एक दर्शक के तौर पर आप लगातार उलझते चले जाते हैं। उन उलझनों में जहां सुलझने की कोई इच्छा नहीं होती। एक दर्शक के तौर पर आप भी न होने में किसी होने को तलाशने लगते हैं।
किस्सा दरअसल उन किस्सों में शुमार हो जाता है, जिन्हें आमतौर पर बस इसलिए कभी कहा ही नहीं जाता क्योंकि उसे कहना आपको उलझाने लगता है। और आम जिंदगी में आमतौर हम इस उलझने से बचते हैं। फिल्म आपके इस बचाव के सारे रास्ते बंद करके जो नये रास्ते खोलती है, उनमें भटकना फिर कभी भुलाया नहीं जा सकता। इरफान खान, टिस्का चोपड़ा, तिलोत्तमा और रसिका दुग्गल के शानदार अभिनय भी मामी में देखे गये यादगार किरदारों का हिस्सा बन जाते हैं।
एक सेप्‍टेंबर, दस्ते तनहाई में
सेप्‍टेंबर मामी में देखी अच्छी फिल्मों की फेहरिस्त की कड़ी में बड़ी खामोशी से शामिल हो जाती है। 30 साल पार कर चुकी एना अपने पालतू कुत्ते मनु के साथ अकेली रहती है। एक मनु ही है, जो उससे उसका अकेला बांटता है। एक डिपार्टमेंटल स्टोर में काम करने वाली एना अपने भीतर एक खालीपन को जी रही है और मनु उस खालीपन को अपनी बेजुबान भाषा में उससे बांट लेता है। मनु के जरिये एना की पहचान उनके पड़ौसी सोफिया और उसके दो बच्चों से होती है। एक दिन मनु बीमार पड़ जाता है और एना को पूरी तरह अकेला करके चला जाता है।
मनु की मौत एना के लिए एक कुत्ते का मर जाना भर नहीं है, सुनसान रातों के उस साथी का मर जाना है जिसका होना भर किसी सहारे की तरह था। मनु की मौत के बाद एना सोफिया के परिवार के नजदीक आने की कोशिश करती है। सोफिया उसके इस अकेलेपन को समझती है लेकिन सोफिया के पति को एना की उसके परिवार से करीबी अखर रही है। एक अजनबी का इस तरह उसकी पत्नी और बच्चों से मिलना जुलना उसे पसंद नहीं है।
एक हद से कुछ आगे बढ़कर एना उन पड़ोसियों में अपने एकाकीपन के खत्म होने की उम्मीद खोजती है और आंखिरकार वो एक सफर पे निकल पड़ती है, जहां समंदर की शांत लहरों के दूर छोर पर रात की खामोशी तोड़ती उस सुबह उसे अपने लिए एक साथी मिलता है। एक कुत्ता जो उसकी जिंदगी में एक संभावित उम्मीद बनकर लौटता है। बहुत ही धीमी गति से चलती ये फिल्म एक एहसास छोड़ जाती है कि आपके भीतर के अकेलेपन का हल आपके भीतर ही कहीं मौजूद है, उसे बाहर खोजने लगेंगे तो बेचैनी ही हाथ लगेगी। आपके खालीपन को आपके सिवा कोई और भर ही नहीं सकता।
मामी का तीसरा दिन भले ही बिना कोई फिल्म देखे निकल गया हो, पर चौथे दिन की पांचों टिकटें पहले ही बुक की जा चुकी हैं। उम्मीद है अगली सुबह से शुरू होकर रात तक कुछ और यादगार सिनेमाई अनुभव मामी के खजाने से बटोरे लिये जाएंगे और उनकी कुछ झलकियां अगली मुंबई डायरी के जरिये आप तक भी पहुंचेंगी।
(उमेश पंत। सजग चेतना के पत्रकार, सिनेकर्मी। सिनेमा और समाज के खास कोनों पर नजर रहती है। मोहल्‍ला लाइव, नयी सोच और पिक्‍चर हॉल नाम के ब्‍लॉग पर लगातार लिखते हैं। फिलहाल यूपी से ग्रामीण पाठकों के लिए निकलने वाले अखबार गांव कनेक्‍शन से जुड़े हैं। उनसे mshpant@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)
Sabhar- Mohallalive.com

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