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Thursday, 17 October 2013

दीपक चौरसिया ने चोटी के तीन चैनलों को डरा दिया है : रवीश कुमार

आज शाम एक साथ कई चैनलों को पलटा तो ज़्यादातर जगहों पर आसाराम को लेकर कार्यक्रम चल रहे थे और कुछ जगहों पर आने की सूचना फ़्लैश हो रही थी। लगता है दीपक चौरसिया ने रेटिंग के मामले में स्थापित चैनलों को डरा दिया है। रेटिंग का खेल कितना आसान है। इसका सिम्पल फ़ार्मूला यह है कि जो भी दूसरा चैनल दिखा रहा है उसकी नक़ल करो। कोशिश करो कि उसी वक्त दिखाओ। जैसे रिन साबुन की नक़ल पर बाज़ार में नीले रंग के साबुन कई तरह के समानार्थी नाम से लौंच हो गया था। लोग रिम को रिन समझ कर ख़रीद लेते हैं। मेरे साथ भी हादसा हो चुका है। तब तक साबुन तो बिक ही चुका था। एनडीटीवी इंडिया, इंडिया टीवी, लाइव इंडिया, इंडिया न्यूज़। क्या बात है भाई। राजस्थान में कोई फ़र्स्ट इंडिया नाम का न्यूज़ चैनल लाँच हुआ है। इंडिया ही इंडिया। कौन रिन है, कौन रिम, ये कौन तय करेगा। वैसे हिन्दी नाम वाला एक ही चैनल है आज तक। सहारा समय भी गिन सकते हैं।
रेटिंग का गणित यह है कि अगर आपके घर में मीटर है और आप किसी चैनल पर एक मिनट से ज़्यादा रूकते हैं तो रेटिंग मिल जाती है। फिर आप फ़ेसबुक पर चाहें जितना गरिया लें, चैनलों को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। जब से आसाराम को लेकर इंडिया न्यूज़ की रेटिंग आई है तब से सब दीपक सुनामी से बचने के नाम पर बाकी चैनल फिर से आसाराम आसाराम जप रहे हैं। मैं यहाँ पत्रकारिता और गुणवत्ता की बात नहीं कर रहा। हिन्दी न्यूज़ चैनल आईपीएल के पैटर्न पर चलते हैं। जहाँ टेस्ट मैच के नियमों को लेकर भावुक होने का मतलब नहीं। सभी चैनलों की टीम आईपीएल की तर्ज़ पर ही गठित है। दीपक इस खेल के पोलार्ड (क्रिकेट कम देखता हूँ, मक़सद धुआँधार बल्लेबाज़ी करने वाले से है) साबित हुए हैं। दे दनादन। नीम हकीम ख़तरा ए आसाराम, आसाराम की आशिक़ी, आसाराम का अश्लील दवाखाना, आसाराम का मैटरनिटी हास्पिटल। ये तीन विज्ञापन हैं जो इस वक्त इंडिया न्यूज़ पर दिखाये गए। जो साढ़े नौ बजे से शुरू होकर एक के बाद एक आयेंगे। देखना है दीपक कितना टिकते हैं और सर्वदा नंबर वन आज तक की देहरी पार कर पाते हैं कि नहीं।

फिर क्या था मैंने आज रात नौ बजे रिमोट लेकर चैनलों को पलटना शुरू कर दिया। हर जगह आसाराम ही आसाराम। इंडिया टीवी भी अधर्म गुरु जन्म से जेल तक कार्यक्रम दिखा रहा है। एबीपी न्यूज़ पर भी आसाराम पर एक न्यूज़ आ रहा है। नारायण साईं पर रेप का आरोप लगा है। आज तक पर भी एक शो आ रहा है जिसका नाम है आसाराम की डर्टी पिक्चर। न्यूज़ 24 चैनल पर कार्यक्रम आ रहा है जिसका स्लग है पापा के महापाप में बेटा भी पार्टनर। शो का नाम है नारायण नारायण। आईबीएन सेवन पर भी आसाराम के बेटे की ख़बर है। लेकिन वहाँ बाकी ख़बरें भी हैं। ज़ी न्यूज़ और लाइव इंडिया पर बाकी ख़बरें भी हैं। न्यूज़ नेशन पर राजनीतिक चर्चा चल रही है और न्यूज़ एक्सप्रेस पर यूपी की लैपटॉप वाली ख़बर है। ये मैं नौ बजे के प्राइम टाइम का आँखों देखा हाल बता रहा हूँ। नीचे के चैनल रेटिंग को लेकर कम परेशान हैं शायद !

मतलब साफ़ है दीपक ने चोटी के तीन चैनलों को डरा दिया है। टीआरपी की दुनिया दिलचस्प होती है। यहाँ नियम नहीं चलते। इनके अपने नियम होते हैं। कभी रेटिंग के नियमों के तहत इन चैनलों का मूल्याँकन किया जाना चाहिए। शीर्षासन करके भी देखिये नज़रिया अलग हो जाता है। (यह पंक्ति फ़ेसबुक पर एक स्टेटस से प्रेरित है) इस भयानक कंपटीशन में आज तक कैसे नंबर वन बना रह जाता है। यह कमाल है। इन सब चैनलों को चलाने वाले सम्पादक अधिकारी कभी न कभी एक दूसरे के साथ, एक दूसरे के आमने-सामने, एक दूसरे के मातहत काम कर चुके हैं। यह भी एक दिलचस्प अध्याय है जिस पर इन्हीं में से कोई लिखे तो पढ़ने को रोचक चीज़ें मिलेंगी। रेटिंग के तनाव को झेलना आसान नहीं होता होगा। हर दिन एक फ़ार्मूला खोजना चुनौती भरा काम है। रोज़ ही इन्हें अपने साथी, पूर्व सहयोगी, पूर्व सम्पादक से लड़ना होता है। मैं इस तरह के अनुभव और दबाव से दूर रहा हूँ इसलिए बाहर से नैतिक टिप्पणी नहीं करूँगा।

फिर न्यूज़ 24 को आसाराम का लाभ क्यों नहीं मिला। वहाँ भी कम बहस नहीं हुई है। ऐसा ही नज़ारा दर्शक निर्मल बाबा के वक्त देख चुके हैं। लगता है कि हमें कोई न कोई ग़ुबार निकालने के लिए चाहिए। जिसका प्रतीक कभी निर्मल बाबा तो कभी आसाराम बन जाते हैं। ग़ुबार निकलने के बाद न चैनल को निर्मल बाबा से दिक्क्त होती है न दर्शक को। कुछ लोग फ़ेसबुक पर इसे उजागर भी करते रहते हैं मगर इन पर कोई असर नहीं होता। अन्ना हज़ारों के वक्त भी यही हुआ था। लाइव इंडिया ने अन्ना को बिठाकर एक घंटे का कार्यक्रम किया। उसे कई बार दिखाया गया। जब रेटिंग आई तो लाइव इंडिया उछला हुआ था। बस सारे चैनल अन्ना को स्टुडियो बुलाने लगे। रेटिंग ही रेटिंग। एबीवीपी ने 'प्रधानमंत्री' शुरू किया तो आजतक ने 'वंदे मातरम' बना दिया। एक ने स्पीड न्यूज़ शुरू किया तो सबने चालू कर दिया। ज़ी ने कौटिल्य को पहले दिखाया (शायद) तो दीपक ने उसे लपक लिया और केबीसी में बदल दिया। उसी तरह डिबेट ही डिबेट शुरू हुआ। पहली बार अंग्रेज़ी का आइडिया हिन्दी में आया। ये अर्णब गोस्वामी का हिन्दी चैनलों की दुनिया में योगदान है।

एक तरह से हर हिन्दी चैनल दूसरे की नक़ल कर चुका है। यानी सब एक दूसरे के अहसानमंद हैं। कोई कोलंबस कोलंबस नहीं चिल्लाता। सब कोलंबस का नक़्शा मार कर अपनी कोलोनी काटने निकल पड़ते हैं। प्लाट ही प्लाट। रेटिंग की दुनिया का एक औसत नियम नज़र आता है। कुछ भी अलग मत करो। जो एक कर रहा है उसी को अलग अलग तरीके से करो। स्लग की भाषा सबकी एक जैसी, नरेटी दाब कर नाक से बोलने वाला वायस ओवर, जैसे वीओ करने वाले को वायस ओवर ख़त्म कर तुरंत फ़ारिग़ होने भागना हो। सब चैनल पर नकबज्जा वीओ सुनाई देगा। जैसे पटना में कभी क़ब्ज़ दूर करने की दवा बेचने वाला पपीन पपीन बोलता था। सारी रचनात्मकता शो के नाम को लेकर निकाली जाती है। नीम हकीम ख़तरा ए आसाराम। वाह।

हिन्दी चैनलों को पत्रकारिता के टेस्ट मैच के नियमों से हम कब तक देखते रहेंगे। कोई तो होगा जो इन्हें देख रहा होगा या फिर मीटर वालों की दुनिया के बाहर कोई नहीं देखता होगा। इसे मानने का आधार क्या है। दर्शक तो होंगे ही इनके पास। यहाँ निरर्थकता में ही सार्थकता है। इनके खाते में अच्छे काम भी है जिनका इस्तमाल आलोचना के वक्त किया जाता है। कुछ शानदार काम भी हैं। सब नैतिक रूप से यह तो कह ही सकते हैं कि उन्होंने एक ठग साधु के कारनामे दुनिया के सामने उजागर कर दिये। स्ट्रींगर रिपोर्टर मिलकर आसाराम का खेत खलिहान तक खोद लाये हैं। सत्यता और तरीके पर टिप्पणी नहीं कर रहा हूँ। मैं कौन होता हूँ करने वाला। आसाराम पर बने तमाम कार्यक्रमों की भाषा और कंटेंट का गहन विश्लेषण होना चाहिए। पता नहीं क्यों गुप्त रोग दूर करने वाली तड़प भी दिखाई दी।

कभी यह भी तो सोचिये आसाराम अंग्रेज़ी चैनलों में क्यों नहीं हैं। क्या पत्रकारिता वर्ग के हिसाब से नहीं होती। दूसरा मेरठ से छपने वाली पत्रिकाओं ने हिन्दी साहित्य और पाठकों की दुनिया में जो भूचाल पैदा किया उसने लोकप्रियता के लिए तड़प रहे हिन्दी के चैनलों को भी लपेट लिया। मेरठ ज़िंदाबाद। कभी मेरठ से कोई चैनल लाँच हो जाए तब देखेंगे सत्यकथाओं की जननी मेरठ के क़लमकार उनकी नक़ल मार रहे चैनलों को कैसी चुनौती देते हैं। मैं मेरठ को ब्रांड नहीं कर रहा। मुझे वो शहर बेहद पसंद है। तब तक रेटिंग की दुनिया का मज़ा लीजिये।

आज जमाने बाद न्यूज़ चैनलों को देर तक देखा। अच्छा लगा यह देखकर कि कुछ भी नहीं बदला है।
लेखक रवीश कुमार एनडीटीवी के प्राइम टाइम एंकर हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग 'कस्बा' से लिया गया है. यह पोस्ट रवीश ने अपने ब्लाग पर 6 अक्टूबर 2013 को लिखा-प्रकाशित किया है.

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