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Friday, 18 October 2013

रे मन तू काहे न टिक कर रहे!



रे मन तू काहे न टिक कर रहे!
आज फिर गाजियाबाद वापसी। मुझे दिल्ली कभी अच्छा नहीं लगा पर रोजी-रोटी की खोज में दिल्ली ही रहना पड़ा। पिछले तीस साल से रह रहा हूं। कानपुर जाकर जब भी वापस लौटता तो सोचा करता काश इन डीटीसी की हरी-नीली बसों से कब छुटकारा मिलेगा, कब इस कंक्रीट के जंगल से भागने का मौका मिलेगा। एक बार हम और राजीव शुक्ला दोनों दिल्ली छोड़कर चले गए और यह बहाना बनाया कि यहां अरहर की दाल नहीं मिलती प्रभाष जी फिर ले आए। वायदा किया कि अरहर की दाल मिलेगी। उन्होंने नई सड़क स्थित न्यू सोनी भोजनालय दिखा भी दिया। अब पता नहीं वह भोजनालय है भी कि नहीं। हर गरीब आदमी की तरह हरदम परिधि में रहा क्योंकि मध्य में तो वही रह पाते हैं जो राजपुरुष हों। पहले यमुना विहार में फिर दिलशाद गार्डेन में और एनसीआर के सबसे पिछड़े इलाके गाजियाबाद के वसुंधरा में।

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