साहित्यकार राजेंद्र यादव नहीं रहे


साहित्यकार राजेंद्र यादव नहीं रहे। उनके व्‍यक्तित्‍व ने मुझे काफी आकर्षित किया था। कथा-कहानी में दिलचस्पी‍ न होने के बाद भी गत 15 सालों से 'हंस' पत्रिका जरूर खरीदता रहा। अधिकांश बार यही हुआ कि केवल संपादकीय पढ़कर ही रह गया। उनका संपादकीय पढ़कर बेचैन हो जाता था। मन में सवाल उठते थे। चिंतन-हिलोरें।

राजेंद्रजी मार्क्सवादी थे। समाज को देखने का उनका नजरिया उसी विचारधारा से प्रेरित था। इसलिए जाहिर है वे वाद की चौखटों में बंद होकर विचार व्‍यक्‍त करते थे, लेकिन वे वैचारिक उत्तेजना फैलाने में पूर्णत: सफल होते थे। तार्किकता उनके लेखन की विशेषता थी। मुख्य‍त: दलित, आदिवासी, स्त्री, धर्म, संस्कृति, सांप्रदायिकता, राजनीति आदि विषयों पर लिखी उनकी संपादकीय पर जमकर चर्चा होती थी। प्रतिक्रिया इतनी तीव्र होती थी कि कुछ अतिवादी लोग उनके पुतले और पत्रिका तक जलाते थे।

मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक हूं। वे संघ के कट्टर आलोचक थे। वे बार-बार कहते थे कि संघ में लिखने-पढ़ने पर जोर नहीं है। (हालांकि वामपंथी ऐसा लगातार कहते रहते हैं। पहले कहते थे संघ ट्रेड यूनियन का काम नहीं कर सकता, संघ विद्यार्थी संगठन का काम नहीं कर सकता, फिर कहा कि संघ राजनीतिक क्षेत्र में कामयाब नहीं हो सकता, हालांकि आगे चलकर हर क्षेत्र में संघ ने वामपंथियों को पछाड़ा।) संघ विचार-परिवार में मैं लिखने-पढ़ने के काम में लगा तो इसके पीछे कुछ श्रेय राजेंद्र जी को भी जाता है।

दो साल पहले, मित्रवर पंकज झा का केंद्र दिल्ली हुआ। हमने तय किया कि राजेंद्र यादव से मिलेंगे। बिना समय लिए हम उनके दफ्तर पहुंच गए। देखा, वे विश्राम कर रहे थे। हमने जगाना मुनासिब नहीं समझा। बगल के कमरे में कथाकार संजीव संपादकीय कार्य में जुटे थे। उनसे हमारी आधा घंटा तक चर्चा हुई।

गत 15 सालों में राजेंद्रजी को अनेक बार सुन चुका हूं। हर बार सुनको सुनना एक नये बहस से टकराने जैसा रहा। अभी तीन दिन पहले ही बड़े भाई उमेश चतुर्वेदी जी के साथ 'दृश्यांतर' पत्रिका के विमोचन कार्यक्रम में जाना हुआ। संयोग से राजेंद्र जी वहां अतिथि के नाते उपस्थि‍त थे। कम शब्दों में अच्छा बोले। मेरे लिए उनका अंतिम दर्शन यही था।

राजेंद्र जी के बारे में मैं यही कहूंगा कि लगातार यांत्रिक होती जा रही दुनिया में उन्होंने साहित्य को जिंदा रखा, यह छोटी बात नहीं है। साहित्य से संवेदनशीलता प्रखर होती है। राजेंद्र जी ने दलित और स्त्री विमर्श को मुखर किया और इसे केंद्र में लाए। हां, उनका जीवन ठीक नहीं लगा। अनैतिकता से ओत-प्रोत। स्‍त्रीविरोधी। धर्म के कर्मकांड और पोंगापंथ स्वरूप पर उनका प्रहार करना ठीक लगा लेकिन वे धर्म के प्रगतिशील तत्वों पर भी प्रहार करते रहे, यानी धर्म को लेकर पूर्वग्रहग्रस्त थे। इसी तरह कविता विधा की नाहक आलोचना करते थे कि यह अतीतजीवी होती है।

खैर, मेरे जीवन में जिन थोड़ी सी शख्सियतों का प्रभाव पड़ा, उनमें से एक राजेंद्र जी का निधन मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति है। उन्हें श्रद्धांजलि।
संजीव सिन्हा Facebook wall se sabhar lekar .. 
साहित्यकार राजेंद्र यादव नहीं रहे साहित्यकार राजेंद्र यादव नहीं रहे Reviewed by Sushil Gangwar on October 28, 2013 Rating: 5

No comments