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Friday, 11 October 2013

जो अपराधी नहीं होंगे, मारे जाएंगे!

प्रिय हंसल भाई,
साल भर हो गये थे शाहिद का इंतजार करते करते। मुझे याद है, जब अजय जी ने बताया था कि इस फिल्‍म को देख कर उनकी आंखें भीग गयी, तभी इस फिल्‍म को देखने की ललक जगी थी। अजय जी निष्‍ठुर दर्शक हैं और वे रोते नहीं। उन्‍हें और ढेर सारे समीक्षकों-दर्शकों को शायद अच्‍छी तरह से पता चल गया है कि परदे पर जो वे देख रहे हैं – वह ड्रामा है, जिंदगी नहीं। मैं चूंकि अब भी दुनिया को देखने-समझने के मामले में नवजात जैसा हूं – तो रोना मेरे लिए एक आम क्रिया है। पर प्रौढ़ निगाहों को भी भावुक कर देने वाली आपकी फिल्‍म में क्‍या ऐसा था, उसे देखना चाहता था। मुझे याद है, पिछले साल जब आप इसकी कॉपी बहसतलब में लेकर आये थे और कई लोगों से इसका जिक्र कर देने की वजह से जब इस फिल्‍म को देखना मुल्‍तवी हो गया था, सबसे अधिक अफसोस मेरे पास था।
बेसब्र इंतजार के बाद कल शाहिद को देखना मेरे लिए बहुत ही मर्मांतक अनुभव था। सधे, सुलझे हुए तरीके से, गैर-लोकप्रिय सिनेमाई व्‍याकरण को गढ़ते हुए आपने शाहिद की कहानी कही। धुंध भरे जिंदगी के कैनवास पर एक उदास पेंटिंग की तरह पूरी फिल्‍म देह की शिराओं को सिहराती रही। मुस्लिम बस्‍ती में बाढ़ की तरह आये अचानक दंगे का विद्रूप जैसा आपने पहले ही दृश्‍य में दिखाया है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। हम जब एक मरे हुए जानवर को सड़क पर आवारा पड़ा देखते हैं, तो उबकाई से भर जाते हैं। जिंदा जलते हुए किसी को देखना कितना दहशतनाक होता होगा – यह हमारी कल्‍पनाओं के बाहर का जीवनानुभव है। इस देश में अल्‍पसंख्‍यक नहीं होने की सुखद अनुभूति के साथ हम अपने मामूली संघर्षों से आरामदेह रोजमर्रा बटोरने वाले लोग हैं।
शाहिद एक सच था, जो अभी अभी नरेंद्र दाभोलकर के रूप में दोहराया गया। ऐसा क्‍यों होता है कि इंसाफ की ज्‍यादातर निर्भीक लड़ाइयों को मौतें ही नसीब होती हैं? नियति के मारे निर्दोष लोगों की उम्‍मीदों से जो भी जुड़ता है, वह मार दिया जाता है। शाहिद को भी 2010 में गोली मार दी गयी थी। वह आतंकवाद के नाम पर बेवजह फंसाये जा रहे निर्दोष मुस्लिम लड़कों की रिहाई के लिए मुंबई हाईकोर्ट में मुकदमा लड़ता था। वह उम्र में मुझसे एक साल छोटा था और 2010 में उसकी उम्र महज 32 साल थी। कुर्ला के उसके ऑफिस में जब उसकी हत्‍या की गयी, उस वक्‍त जेल में बंद कई बेगुनाहों के परिवार वालों की उम्‍मीदों की भी हत्‍या हो गयी थी।
हिंदुस्‍तानी संदर्भ में “ट्रायल ऑफ एरर” ऐसा मुहावरा हो चला है, जिसकी जद में खास कौमी नाम वाले लगातार आ रहे हैं। बेहतर जिंदगी जीने की उनकी निर्दोष ख्‍वाहिशों से एक झटके में उन्‍हें बेदखल किया जा रहा है। आजमगढ़ (यूपी) और इन दिनों दरभंगा (बिहार) के भी कई मुस्लिम युवकों को बिना किसी ठोस आरोप के सिर्फ शक के आधार पर जेल में ठूंसा जा रहा है। इन सबके लिए मुकदमा लड़ने वाले शाहिद की इस मुल्‍क को कोई जरूरत नहीं है। एक स्‍वप्‍नविहीन व्‍यवस्‍था में जनता का विश्‍वास बना रहे, इ‍सके लिए जरूरी है कार्रवाइयों का नाटक करना। और इस नाटक में उनकी बलि आसानी से दी जाती रही है, जिनकी राष्‍ट्रीयता को वे आसानी से संपादित कर सकते हैं। इस लिहाज से मुसलमान इस देश में बहुत आसान टार्गेट हैं।
अच्‍छा ये लगा कि आपने पूरी फिल्‍म में शाहिद की कहानी कहने के लिए कोई अतिरिक्‍त भावुकता नहीं दिखायी है। एक लड़ाई अपने अदांज में जितनी सहज और तार्किक हो सकती है, पूरी फिल्‍म में शाहिद का संघर्ष उतना ही नॉर्मल है। परोपकार की जगह अंदर की जिद ही थी, जिसने शाहिद को उन धमकियों से नहीं कभी नहीं डरने दिया, जो उसे रोज रोज मिलती थी और जिसकी वजह से उसे कई जाती नुकसान भी सहने पड़े।
मैं इस फिल्‍म पर यह खुली चिट्ठी आपको इसलिए लिख रहा हूं, क्‍योंकि इससे इस फिल्‍म की रीलीज से पहले बने रहने वाले रहस्‍य को कोई नुकसान नहीं पहुंचना है। यह ऐसी फिल्‍म नहीं है, जिसकी कहानी खुल जाने से दर्शक निरुत्‍साहित हो जाएं। कोई भी नेट पर सर्च करके शाहिद की कहानी जान सकता है। बल्कि मुझे लगता है कि शाहिद जैसी शख्‍सीयतों पर फिल्‍म बनाना उसकी लड़ाई को आगे ले जाना है और ऐसी फिल्‍म को इस देश के इंसाफपसंद लोगों को खुद भी हॉल में जाकर देखना चाहिए और आस-पड़ोस को भी इसके लिए उत्‍साहित करना चाहिए।
मैं दो युवकों का नाम और नंबर आपको दे रहा हूं, जो शाहिद की लड़ाई को अपने तरीके से लड़ रहे हैं। राजीव यादव (09452800752) और शाहनवाज आलम (09415254919)। रिहाई मंच के नाम से इनका एक फोरम है, जो ऐसे मामलों में एटीएस और हमारी भारतीय न्‍याय व्‍यवस्‍था को लगातार एक्‍सपोज कर रहा है। ऐसे लोगों के लिए आपकी फिल्‍म की एक विशेष स्‍क्रीनिंग होनी चाहिए।
एक बात और, शाहिद देखते हुए मुझे राजेश जोशी की एक कविता बार-बार याद आ रही थी। आपने पढ़ी होगी जरूर, फिर भी मैं यहां उसे शेयर कर रहा हूं…
जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे, मारे जाएंगे
कठघरे में खड़े कर दिये जाएंगे, जो विरोध में बोलेंगे
जो सच-सच बोलेंगे, मारे जाएंगे
बर्दाश्‍त नहीं किया जाएगा कि किसी की कमीज हो
उनकी कमीज से ज्‍यादा सफेद
कमीज पर जिनके दाग नहीं होंगे, मारे जाएंगे
धकेल दिये जाएंगे कला की दुनिया से बाहर, जो चारण नहीं होंगे
जो गुण नहीं गाएंगे, मारे जाएंगे
धर्म की ध्‍वजा उठाने जो नहीं जाएंगे जुलूस में
गोलियां भून डालेंगी उन्हें, काफिर करार दिये जाएंगे
सबसे बड़ा अपराध है इस समय निहत्‍्थे और निरपराधी होना
जो अपराधी नहीं होंगे, मारे जाएंगे
शुक्रिया कि आपने शाहिद की जिंदगी पर फिल्‍म बनायी। वरना हिंदुस्‍तानी सिनेमा की जगर-मगर रोशनी के बीच सच के स्‍याह गलियारे में कौन झांक पा रहा है?
आपका,
अविनाश
(अविनाश। मोहल्‍ला लाइव के मॉडरेटर और सिने बहसतलब के संयोजक। प्रभात खबर, एनडीटीवी और दैनिक भास्‍कर से जुड़े रहे हैं। राजेंद्र सिंह की संस्‍था तरुण भारत संघ में भी रहे। उनसे avinash@mohallalive.com पर संपर्क किया जा सकता है।)
sabhar- Mohallalive.com

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