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Saturday, 19 October 2013

इतिहास को जमीन से देखिए



इतिहास अपनी ही जमीन से जाना जा सकता है विलायत से नहीं। डौंडिया खेड़ा को अंग्रेजों की नजर से देखने का हश्र यही हुआ कि इतिहासकार कानपुर को एक मालदार शहर का दरजा देने को तैयार नहीं है। अगर भारत में सोना नहीं था तो हर मंदिर, गुरुद्वारे का शिखर सोने से कैसे मढ़ गया? एक से एक शानदार किले कहां से बने? जिन बाजीराव पेशवा द्वितीय को पूना से निष्कासित कर कानपुर के समीप बिठूर की सिख रियासत रमेल में बसाया गया उन्होंने महज तीस साल में इतना शानदार किला, बिठूर में असंख्य मंदिर और घाट कहां से बनवा लिए? बाजीराव पेशवा के काल में गंगा की एक धारा बिठूर से कानपुर तक दूध की कैसे बहती थी? और वह दूध रोज सुबह शिवाभिषेक करते बाजीराव बहाते थे। कानपुर के राजा बलभद्र प्रसाद तिवारी के पास इतना खजाना कहां से था कि जनरल नील और हैवलाक की फौजें पूरे २४ घंटे तक लूटने के बाद भी एक चौथाई खजाना नहीं लूट पाईं? बैंकर प्रयागनारायण तिवारी अचानक कलकत्ता छोड़कर १८५४ में कानपुर क्यों आ गए? राव राजा रामबख्स सिंह ने अपनी सोने चांदी के लेनदेन और महाजनी गद्दी कानपुर में क्यों शुरू की? अंग्रेज हर राजा से सोना ही क्यों मांगते थे और किसी राजा को हटाकर उसके खजाने पर ही क्यों कुंडली मार कर बैठ जाते थे? झांसी को ही देख लीजिए। मुगल बादशाहों के फिदवी खास अंग्रेज उसके खजाने पर कब्जा खुद जमाए थे।
कोई भी न तो पढ़ता है न जनता को जानने की कोशिश करता है और फिर झख मारता है कि हिंदुस्तान में हजार टन सोना कहां से आया? आज की तारीख से इतिहास देखने का यही हाल होता है। बुंदेलखंड की गरीब से गरीब औरतें भी ठोस चांदी के कड़े, करधनी और छल्ले तो पहनती ही हैं सोने की सुतिया भी वहां आम बात है। पर दिल्ली के हुक्मरानों को भी गरीबी देखने में मजा आता है। गरीबी नहीं देखेंगे तो अपनी अमीरी का अहसास कैसे होगा?
Sabhar--- शंभूनाथ शुक्ल------ Facebook wall 

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