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Saturday, 19 October 2013

बकरी चराना इतना आसान और गया-गुजरा काम तो नहीं ?

एक से एक प्रगतिशील, हक और हाशिए के समाज की बात करनेवाले लोग और बेहद बारीकी से अपनी बात रखनेवाले को देखता हूं कि बकरी चराने जैसे पदबंध का इस्तेमाल इस तरह से करते हैं जैसे कि ये दुनिया का सबसे आसान,बेगार और बिना दिमाग का काम है. ता नहीं पढ़ने-लिखनेवाली दुनिया में व्यंग्य में भैंस चराना,बकरी चराना,गाय हांकना, दूध दूहना,चारा काटना जैसी क्रियाओं का प्रयोग करता है तो लगता है कि शारीरिक श्रम को किसी न किसी रुप में कमतर करके देखा और उसका उपहास उड़ाया जा रहा है. दूसरा कि इसका दिमाग से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है..बाकी वर्ग,समाज, पहचान की राजनीति के तहत इसकी अलग व्याख्या हो सकती है.

मेरी पिछली सात पीढ़ी में से न तो किसी ने खेती का काम किया और न ही पशुपालन..मैंने अपने परिवार की वंशावली देखने के साथ-साथ इकलौते चाचा से उन सबों का वर्णन और काम विस्तार से सुना है..सबके सब शुरु से ही जमींदारी और बाद में बिजनेस में ही रहे. लेकिन छुटपन में जब स्कूल की ज्यादा दिनों की छुट्टियां होती और मैं अपने बिहारशरीफ के घर के बड़े से बगीचे में चीटिंयों से, चिड़ियों से, गिलहरियों से बातें करता, अमरुद,पपीते तोड़ता, अपनी बहन और उसकी सहेलियों के साथ खिचड़ी बनाता तो मां इसी व्यंग्य में कहा करती- यही हाल रहा तो बकरी चराओगे बड़े होकर, हल जोतेगे, यही चील-कौआ, खोटा-पिपरी( मां चींटी को खोटा-पिपरी,अखरी-पिपरी कहती) से गप्प-शप्प करके पेट भरेगा. यही सब काम देगा तुमको. बौडाहा कहीं का. जिस तरह से लड़कियों के किसी तरह की गलती करने, चाहे वो बर्तन मांजने में राख या विम पाउडर के लगे रह जाने की हो या फिर चार आदमी के सामने दोनों पैर फैलाकर बैठने की, कहा जाता- यही सब लक्षण लेकर ससुराल जाना, खानदान का नाम रौशन होगा..मेरी मां बचपन से ही ड़राती- कुछ करेगा-धरेगा नहीं, ढंग से पढ़ेगा नहीं तो जो आवेगी, उसको क्या खिलावेगा, भाग नहीं जाएगी, तुमको छोड़कर...ऐसे ही गाछ-बिरिछ के बीच पड़े-पड़े कुक्कुर-बिलाय से बतिआता रहेगा तो पगला समझके भाग जाएगी तुमको छोड़कर..और भी बहुत कुछ. हमारे भीतर वो बचपन से ये भाव भरती रही कि तुम्हें बड़ा होकर सिर्फ अपना नहीं, एक और की जिम्मेवारी उठानी है और फिर बच्चे-कच्चे तो होंगे ही.

लेकिन मां ने बार-बार पढ़ने की हिदायत देने के बीच कभी नहीं कहा कि अगर तुम नहीं पढ़ोगे तो अपने पापा की तरह कि ब्लाउज-पेटीकोट-साड़ी बेचोगे, अपने मामू-नाना की तरह तेल बेचोगे. जिस गाय,भैंस,बकरी चराने का काम मेरी पिछली सात पीढ़ी ने कभी नहीं किया, मां वही करने का उदाहरण देती. मेरे झुमरी तिलैया के मनोज भैया जो कि उम्र में मुझसे कम से कम बारह साल बड़े होंगे, उनकी मां यानी मेरी बुआ भी ऐसे ही कहा करती थी लेकिन बाद में उन्होंने बहुत मेहनत से पढ़ाई की..यूपीएससी ने उनको बड़ा झटका दिया और एनटीपीसी के अधिकारी के इस बेटे ने हारकर और प्रतिरोध में जूते-चप्पल की दूकान खोल ली..जाहिर है, एक सभ्य-प्रतिष्ठित समाज में इससे फूफा की नाक कट गयी और मार ताने.. बीए में जब निराला की रचना बिल्लेसुर बकरिहा पढ़ा तो मनोज भैया की जब-तब याद आने लगी..वही मनोज भैया जिन्हें मेरी दीदी सहित और भी कई लड़कियां कह चुकी थी- आपको मॉडलिंग करनी चाहिए. दीदी ने तो पहली बार जब उन्हें ग्राहकों के आगे जूते निकालते देखा तो फक्क से रो गई- क्या धंधा शुरु कर दिए मनोज भैय्या मां, कोई और काम नहीं मिला था इनको.. फूफा के खानदान का सबसे बड़ा चिराग जूते-चप्पल के धंधे से अब इतने खुश और व्यस्त हैं कि जितनी कमाई बाकी होनहार लौंड़ों ने नहीं की है, उससे कई गुना वो अबतक कर चुके हैं. खैर,

मां जब इस तरह से बकरी चराने के ताने दिया करती तो मन में कौतूहल तो बन ही गया था कि आखिर बकरी चराने में ऐसा है क्या जो मां अक्सर कहा करती है..इतना तो समझ आता था कि मां ऐसा कहकर ये संकेत दिया करती है कि तुम भी मुसलमानों और ग्वालों के बच्चों की तरह हो जाओगे. बिहारशरीफ में मेरा आखिर घर हिन्दू का था. उसके बाद सिर्फ मुसलमानों का और आसपास बकरियों की कोई कमी न थी..और अर्जुनमा के साथ बकरियों की पूरी फौज आती जब वो खोए पहुंचाने मेरे घर आता. लिहाजा, एक दिन मैंने और मेरे दोस्त सुजीत ने राह चलती एक बकरी को पकड़ लिया और अपने बगीचे में ले गए..पहले तो बकरी घबरा गई लेकिन हमदोनों ने उसके आगे दनादन पत्तियां तोड़कर डालने शुरु कर दिए. जानवर में विवेक नहीं होता, ये भी मुहावरे से ही निकलकर आता है लेकिन पता नहीं क्यों मुझे इंसानों से ज्यादा संवेदनशील लगते हैं. जिस बकरी को दिनभर पेटभर चारा नहीं मिलता हो, उसके आगे नाना प्रकार के फूलों,पौधों की पत्तियां किसी खजाने से कम न थे लेकिन उसने उन्हें सूंघा तक नहीं. सुजीत ने उसके गले में रस्सी डाल दी थी और पीतल के एक लोटे के साथ हम उसकी थन पकड़कर बैठ गए. अभी थन को एक बार ही नीचे खींचा था, ये सोचकर कि दूध की धार ठीक वैसी ही निकलेगी जैसा कि पोस्टरों में शिवलिंग के उपर गायों के थन सटा देने भर से निकलने के दिखाए जाते हैं. दूध तो बाद में निकलता, एक ही बार खींचने से मेरे हाथ चढ़ गए और तत्काल बकरी ने खुर से दे मारा. मेरी आंखों में आंसू आ गए और जब तक सुजीत आता कि बकरी ने उसके साथ ये काम दोहराया.. वो तो गुस्से में आकर दनादन बकरी को दिया लेकिन मैं शरीर से ज्यादा मन से आहत हो गया था. मुझे रौदिया, रमभजुआ के उन बाल-बच्चों का ख्याल आ रहा था जो वीडियो गेम न खेलकर रस ले-लेकर दूध निकाल लेते..हमने उनके आगे अपने को बहुत हारा हुआ महसूस किया..हम फेसबुक,ब्लॉग और लेखों में ज्ञान छांटनेवाले लोग ऐसे कई मोर्चे पर हारकर यहां पहुंचे हैं जिसे हमने स्वीकार करने के बजाय उन मोर्चों का सिर्फ उपहास उड़ाया है.

बकरी को हमने छोड़ दिया और सुजीत ने कहा- अपने बस का ये काम नहीं है यार..हम तो पढ़ भी नहीं सकते, सच कहो तो पढ़ना ही नहीं चाहते लेकिन तू ये सब छोड़, लग ज पढ़ने में. सुजीत अब बिहारशरीफ में तीन-चार शोरुम और दूकान का मालिक है जिसमे उनके भैय्या और पापा साथ हैं. मेरा तो वो बचपन का शहर ही हमेशा के लिए छूट गया..

लेकिन मां के ताने और बकरी दूहने की उस घटना जस की तस मेरे जेहन में है..ऐसे में इन दिनों जब लगातार पढ़ने के मुकाबले बकरी चराने का मुहावरा बड़े ही तंज अंदाज में देखा तो वो सब ध्यान आ गया..मैं रौदिया, अर्जुनमा, रमभजुा के उन तमाम बच्चों को याद करता हूं जिसके आगे आधा किलो,एक किलो ज्यादा दूध देने के लिए गिड़गिड़ाते थे और चूंकि उसने मेरी ही और मेरे से कम उम्र में दूध दूहना शुरु कर दिया था तो ग्राहकों से डील करने की शैली अपने पिता से अपना ली थी..जबरदस्त कॉन्फीडेंस में मना कर देता और मैं मां के आगे पिटे  हुए बच्चे की शक्ल लेकर चला जाता. वो अमूल,सुधा,मदर डेयरी का जमाना नहीं था कि जितनी मर्जी पैकेट ले लो..ये वो दौर था जब आप अपनी जेब में नोटों की गड्डी भरकर भी मनमर्जी दूध नहीं खरीद सकते थे.

अपने मोहल्ले के उन तमाम रेहाना,अफजल,मुशर्रत,फातिमा और उनके भाईयों-बहनों के चेहरे याद करता हूं जो बकरीद के एक महीने पहले आयी बकरियों को शौकिया चराते थे, हमारे साथ पब्लिक स्कूल में पढ़ा करते.उनके आगे बैठकर राइम्स याद करते..कभी लगा नहीं कि बकरी चराना आसान काम है और बिना दिमाग का काम है..हमने बकरियों के नब्ज को बहुत करीब से देखा है.

अब जब भी इस मुहावरे के साथ बकरियों और उनसे जुड़े लोगों को याद करता हूं तो छुटपन के दिनों से सटकर बिल्लेसुर बकरिहा की याद आती है जिसे मैंने कम से कम बीस बार पढ़े होंगे..हमारा जो प्रोगेसिव तबका बकरी चराने को लेकर इस तरह से सिनिकल है, एक बार इसे पढ़ता और उसे शेयर करता है तो समझ सकेगा कि निराला का बिल्लेसुर बैसवाडे का ब्राह्मण दुनियाभर के काम छोड़कर बकरी चराने का काम करता है तो उससे सामाजिक मान्यताओं के ढांचे कैसे दरकते हैं और पालनेवाले की जिंदगी कैसे बदलती जाती है
Sabhar- Hunkaar.com

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