जनसत्ता में रखने के पूर्व प्रभाष जी ने कितनी दफे हमें छलनी में छाना था (पढ़ें एक पुराना पत्र)

अचानक एक सरकारी विभाग ने मांगा कि आप उन सारे प्रतिष्ठानों की नियुक्ति और रिलीविंग का प्रमाणपत्र दीजिए जहां-जहां आपने काम किया है। अब यह कितना मुश्किल था। सिर्फ अमर उजाला का नियुक्ति व रिलीविंग का प्रमाणपत्र अपने पास था। पर वह तो मात्र 19 अगस्त 2002 से 13 फरवरी 2013 तक का है। मांगा गया है अतीत का भी ब्योरा दीजिए। कितना कठिन है। खैर तलाश शुरू हुई। कहीं कोई रिकार्ड नहीं। हो भी कहां से कानपुर, दिल्ली, चंडीगढ़, कोलकाता से फिर कानपुर, दिल्ली, लखनऊ, दिल्ली, मेरठ से पुन: दिल्ली इतना रिकार्ड कौन रखता है।
मैंने कहा कि वहां के अखबारों में संपादक के तौर पर मेरा नाम छपा है उसे देख लीजिए पर विभाग नहीं माना। श्रीमती जी ने खूब मेहनत की और दिल्ली, गाजियाबाद व कानपुर के सारे घर तलाशे गए। खूब खंगालने के बाद 21 जून 1983 का जनसत्ता के संस्थापक संपादक स्वर्गीय प्रभाष जोशी का एक पत्र मिला। अदभुत है प्रभाष जी का यह पत्र। जनसत्ता में रखने के पूर्व प्रभाष जी ने कितनी दफे हमें छलनी में छाना था। पर प्रभाष जी अपने सारे साथियों को सम्मान भी उतना ही देते थे। जरा प्रभाष जी के पत्र की बानगी देखिए-

प्रिय शुक्ल,

बधाई।

लिखित जांच-परख और आमने-सामने की मुलाकात में आप जनसत्ता की जरूरतों के मुताबिक पाये गए हैं। आपका नाम मेरिट लिस्ट में है।

चुनने का हमारा तरीका शायद थकाऊ और उबाऊ रहा हो पर मैं मानता हूं कि जो अपनी योग्यता के पैरों चल कर आते हैं वे उसी पर खड़े रहते और पहाड़ चढ़ते हैं। सिफारिशों और प्रतिष्ठाओं को छानने के लिए इसके अलावा शायद कोई छलनी नहीं थी।

मैने पिछले पत्र में लिखा था कि आप अपने वर्तमान वेतन का प्रमण-पत्र लेते आइए। आप इनमें से कुछ लाये थे लेकिन ज्यादातर नहीं लाये। जनसत्ता में काम करने वालों को वेतनमान वही मिलेगा जो इंडियन एक्सप्रेस के लोगों को मिलता है यानी पालेकर एक ए। कृपया यह भी बताइए कि आपकी उम्मीद क्या है और आप कितनी जल्दी यहां काम शुरू कर सकते हैं।

शुभकामनाओं सहित,

आपका,

प्रभाष जोशी

(इसमें दो बातें हैं पहली कि तब एक ही संस्थान में हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारों के वेतनमान में कोई भेदभाव नहीं था और दूसरा यह कि तब अखबार पत्रकारों के वेतन व सुविधाओं के संदर्भ में सारी सरकारी सिफारिशों का सम्मान करते थे। मैं कानपुर जागरण से आया था। वहीं प्रशिक्षण पूरा कर 1982 में ग्रेड पाया था। वहां मैं घुमंतू संवाददाता था। पर वेतन महज 800 रुपये मिलता है और जनसत्ता में वेतन मिला 1600 रुपये। इतने ही पैसे से लोधी रोड में रह लेता था। दयाल सिंह कालेज से बस मिलती थी और मात्र 30 पैसे में आईटीओ उतार देती थी पर मैं आमतौर पर भगवान दास रोड पर उतरता था और सुप्रीम कोर्ट की भव्यता निहारते हुए एक्सप्रेस बिल्डिंग तक पैदल आया करता था।)
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.
जनसत्ता में रखने के पूर्व प्रभाष जी ने कितनी दफे हमें छलनी में छाना था (पढ़ें एक पुराना पत्र) जनसत्ता में रखने के पूर्व प्रभाष जी ने कितनी दफे हमें छलनी में छाना था (पढ़ें एक पुराना पत्र) Reviewed by Sushil Gangwar on October 21, 2013 Rating: 5

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