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Friday, 11 October 2013

हम खुद भी तो मीडिया को आजाद देखना नहीं चाहते !

आप कहते हैं हमारा मीडिया मैनेज्ड है, बिका हुआ है. राज्य टीवी से आए ज्ञानेन्द्र पांडेय ने तो यहां तक कहा कि संपादक दलाल हो गए हैं और वो अपने मालिकों के लिए टिकटों के लिए काम करते हैं..इस बात पर जो आगे चर्चा हुई और हमलोगों ने भी इसे ब्राक मीडिया के सुर्खियों में शामिल क्या तो अगले दिन के सत्र में दस फीसदी ठीक है, कहकर दुरुस्त किया. ये सारी बातें अपनी जगह ठीक है. लेकिन इस दिन के लिए अखबार निकालने के दौरान जो सवाल मेरे मन में बार-बार आता रहा, वो ये कि आप मीडिया को कितना आजाद और तटस्थ रहने देते हैं ? आप क्यों चाहते हैं को वो आपके इशारे, आपकी इच्छा और सुविधा के हिसाब से लिखे-बोले ? मैं तो बार-बार यही सोच रहा था कि ये अखबार तो सिर्फ कार्यशाला में हो रही बातचीत को छाप रहा है और पढ़े-लिखे, डिग्रीधारियों के बीच जा रहा है. इसमे अगर राजनीतिक खबरें आने लगे, स्थानीय मुद्दे उठाए जाने लगे और व्यवस्था की आलोचना होने लगे तब लोग क्या-क्या करेंगे ? ऐसे में आपका ये भ्रम बार-बार टूटेगा, छिजेगा कि पढ़े-लिखे समाज का बड़ा हिस्सा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति को गंभीरता से लेता है या उसे बचाए रखने की कोशिश में शामिल हैं.

अखबार की हार्ड कॉपी हमने किसी को भी फ्री में नहीं दी. सिर्फ दो प्रति विभाग को. बाकी टीम के लोगों के लिए. हम पैनड्राइव में इसकी प्रति लेकर घूमते थे. जिसे चाहिए, तुरंत ट्रांसफर कर लो..लेकिन फ्री की कॉपी न देने का अलग दवाब बना रहा जबकि हम जानते थे कि हमारे प्रशिक्षु पत्रकारों ने अपनी आइसक्रीम और कुलचे के पैसे बचाकर इस अखबार के लिए किया है, अगर फ्री में बांटने लगें तो अखबार लोगों के पैरों के नीचे होंगे..
इधर हमने पूरी तरह अपने मुताबिक छापने की कोशिश की. ये विभाग का अखबार नहीं था और न ही किसी तरह का हमने कॉलेज से सहयोग लिया था इसलिए हम औपचारिक खबरों को न छापने के लिए आजाद थे. हम सारे वक्ताओं को शामिल भी नहीं करते..जिनकी बात लगती कि लोगों के बीच जानी चाहिए, बस उन्हें ही जगह देते. बाद में स्पेस का दवाब बढ़ता गया तो प्रमोद जोशी, हिन्दुस्तान की पूरी बातचीत को एक छोटे  से बॉक्स में डालना पड़ गया, कईयों की बात रह गयी.

लेकिन हमने एक ही अंक निकालने के बाद देखा कि दोस्ती-यारी, औपचारिकता और बड़े-छोटे का संबंध जोड़कर ही सही, दवाब बनने शुरु हो गए. एक कॉलेज के शिक्षक ने अगले दिन भी जब अपनी कोई तस्वीर अखबार में नहीं देखी तो बिफरते हुए कहा- ये तो "यलो जर्नलिज्म है". हमलोग सुबह से इतना काम कर रहे हैं और आपने एक भी तस्वीर नहीं छापी. उन्होंने अपनी तस्वीर न छापे जाने के लिए जब यलो जर्नलिज्म यानी पीत पत्रकारिता का इस्तेमाल किया तो मुझे हंसी से कहीं ज्यादा अफसोस हुआ. लगा हम शब्दों को लेकर कितने लापरवाह और बर्बर समझ रखते हैं. कितने बड़े शब्द को इन्होंने कैसे रिड्यूस कर दिया ? इसी तरह हमारी ब्राक मीडिया टीम के प्रशिक्षु पत्रकारों से कुछ-कुछ बोलने और बच्चा-बच्चा बताकर दवाब बनाने की कोशिश करने लगे. लोगों की पूरी ट्रीटमेंट में कहीं से भी उन्हें एक उभरते मीडियाकर्मी होने का एहसास पैदा होने नहीं देना था.

तीन दिन का अखबार निकालना हमारे लिए लोगों को जानने का लिटमस पेपर जैसा रहा. हम बेहतर समझ पाए कि लोग किस तरीके से चीजों को लेते हैं. जो वो बड़े सदर्भों, सरोकार और समाज की दुहाई देते हुए चीजों का समर्थन और विरोध करते हैं, उसके पीछे उनकी कितनी तंग और पर्सनल कन्सर्न काम करते हैं. हम इस अखबार के लिए उनसे कुछ भी मांग नहीं रहे थे, किसी से एक रुपया लिया नहीं, विज्ञापन छापने का सवाल ही नहीं था. बस मीडिया के छात्रों को प्रिंट मीडिया के बीच व्यावहारिक समझ विकसित करनी थी..लेकिन इसी में हमने देखा कि लोग कैसे अपने तरीके से चीजों को मैनेज करने की कोशिश में जुट जाते हैं.

एक दूसरा वाक्या..जब हमने सख्ती से कहा कि हम किसी को भी अखबार फ्री में नहीं देते- आप हमसे इसकी सॉफ्ट कॉपी ले लीजिए तो उनका जवाब था- आप हमसे सौ,दो सौ बल्कि इस पूरे अखबार को निकालने में जितने पैसे खर्च हो रहे हैं, ले लीजिए लेकिन एक कॉपी तो चाहिए ही चाहिए. इससे खुश हुआ जा सकता है और फैलकर चौड़ा भी कि ये है इस अखबार की क्रेज लेकिन गौर करें तो क्या उनकी इस हरकत के पीछे खड़-खड़े खरीदन लेने या पैसे की ठसक दिखाकर कुछ भी, किसी भी तरह चीजों के हासिल करने की मानसकिता सामने नहीं आ जाती ?

टीवी चैनलों में जब भी किसी घटना या मोदी टाइप की रैली की धुंआधार एकतरफा कवरेज होती है, मैं फेसबुक पर लगातार स्टेटस अपडेट करने लग जाता हूं- अगर आप मीडिया को बहुत करीब से जानना-समझना चाहते हैं तो हम जैसे सिलेबस कंटेंट सप्लायर की क्लासरुम के भरोसे मत रहिए, आज लगातार पांच घंटे टीवी देखिए.आपको ज्यादा चीजें समझ आएगी. अखबार निकालने के अनुभव को मैं इसी बात की कड़ी के रुप में जोड़ना चाहूंगा- अगर आप लोगों की नब्ज को समझना चाहते हैं, वो कैसे मीडिया को लेते और अपने एजेंड़े शामिल होते देखना चाहते हैं तो कुछ मत कीजिए, दो-तीन दिन अखबार निकालिए.

मीडिया मंडी है, धंधा है, पैसे का खेल है..अब लगता है फिक्की-केपीएमजी,प्राइस वाटरकूपर्स, ट्राय और सेबी की रिपोर्ट, चैनलों की बैलेंस शीट और कंटेंट को देख-समझकर बता पाना फिर भी आसान है लेकिन मीडिया की आलोचना के लिए जुटाए गए तमाम तरह के औजारों के बीच लोगों को समझने के लिए ये काम बेहद जरुरी है. मुझे लगता है कि मीडिया की जब हम आलोचना कर रहे होते हैं तो एक किस्म से लोगों को क्लीनचिट भी दे दे रहे होते हैं लेकिन नहीं..अगर आप में से कुछ लोग अखबार निकालने का काम करते हैं और आपके जो अनुभव इस दौरान बने उसके दस्तावेज तैयार करते हैं तो एक नई चीज निकलकर आएगी.

ये बहत संभव है कि मेरे ये तर्क आपको फिर से वहीं ले जाए जैसा कि हमारे मीडिया के महंत आए दिन हमे समझाने में लगे होते हैं कि जब लोग देख रहे हैं, पढ़ रहे हैं तो तुम्हें क्या दिक्कत है ? लेकिन नहीं, ये वही तर्क नहीं है. ये तर्क के बजाय वो संकट है जहां आपने लगातार ऐसे मीडिया को फॉलो किया, उसके हिसाब से सोचना शुरु किया और उसके इतने अभ्यस्त हो गए कि अब जब कोई आपको अपने पैसे, समय और मेहनत लगाकर भी कुछ पढ़ने को उपलब्ध करा रहा है तो आप उसे मैनेज करने की कोशिश करते हैं..दरअसल हम जिस परिवेश में जी रहे हैं वहां निरपेक्षता और असहमति दो बेहद ही जरुरी लेकिन खोते जा रहे शब्द और प्रैक्टिस है..हम दर्जनों मीडिया कार्यशाला में शामिल और दीक्षित होने के बीच इसे बचा नहीं पाते हैं तो हम मैनेज्ड मीडिया के किसी न किसी तरह वाहक ही होंगे. लेकिन इन सबके बीच लगातार आ रहे मेल और अखबार की पीडीएफ कॉपी की मांग ये भी साबित करती है कि आप थोड़ा सी भी पैटर्न तोड़ने की कोशिश करें, कुछ अलग लिखने-प्रोड्यूस करने की कोशिश करें, लोगों की उम्मीद, उत्साह और जिज्ञासा खुलकर सामने आने लगती है..संभावना शायद इसी रुप में सक्रिय होती है.

( नोटः- पिछले 7-10 अक्टूबर तक दिल्ली विश्वविद्यालय की आर्ट्स फैकल्टी में अदिति महाविद्यालय और हिन्दी विभाग, डीयू के तत्वाधान में चार दिवसीय मीडिया कार्यशाला का आयोजन किया गया. इस दौरान हमारे कॉलेज भीमराव अंबेडकर कॉलेज, डीयू के मीडिया छात्रों ने ब्राक मीडिया नाम से रोजना एक अखबार निकाला. इसमे सिर्फ और सिर्फ कार्यशाला से जुड़ी बातचीत शामिल होती. अखबार के निकाले जाने के बीच सूत्रधार के रुप में मेरी जो भूमिका रही और जो अनुभव हुए, ये पोस्ट उसी पर आधारित है) 
sabhar- Hunkaar.com

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