दीपक चौरसिया से सबक, मठों को चुनौती देना और इनके वर्चस्व को तोड़ना संभव

Yashwant Singh  : दीपक चौरसिया का इंटरव्यू कर आए... साथ मेरे गए थे विवेक सिंह जो पत्रकारिता के शिशु हैं... इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दिल्ली आ गए हैं, हर हाल में पत्रकार बनने की ठान कर.. उनने अपने अनुभव, मन की बात को फेसबुक पर लिख मारा है... इस नवागत पत्रकार का स्वागत किया जाना चाहिए... लीजिए, पढ़िए कि विवेक ने क्या लिखा है...
Vivek Singh : इन दिनों मैं दिल्ली आ गया हूँ, इलाहाबाद में रहते हुय़े धीरे - धीरे किन्तु पक्के तौर पर ये मन किया कि अब पत्रकारिता करनी है. इसी धुन के साथ दिल्ली हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में हाथ आजमाने आ गया हूँ. लेकिन समस्या ये कि कैसे शुरुआत हो क्या करें. जब हिंदी पत्रकारिता करनी है तो हिंदी टाइपिंग तो आनी ही चाहिए.
मैं अब तक गूगल टूल्स से टाइपिंग किया करता था लेकिन यहाँ पहुँचकर पता चला कि इससे काम नही चलने वाला और हिंदी टाइपिंग सीखनी पड़ेगी. तो पहला काम जो किया वो ये कि अब तक टाइपिंग सीखा. अब इसके आगे का काम सीखने और काम करने के लिए मीडिया की खबरों के लिये अपनी विश्वसनीयता स्थापित कर चुके भड़ास के साथ काम सीख रहा हूँ.
कल इसी सिलसिले में भड़ास के एडिटर यशवंत भैया के साथ इंडिया न्यूज के दीपक चौरसिया का इन्टरव्यू लेने सहायक की भूमिका में पहुँचा. जल्द ही ये इन्टरव्यू भड़ास पर होगा. दीपक जी को टीवी पर बहुत बोलते सुना है और आज ना सिर्फ दीपक देश के सफल टीवी न्यूज एंकरों में है बल्कि इंडिया न्यूज चैनल में अपनी हिस्सेदारी भी रखते हैं. दीपक ने यशवंत के सवालों के बेबाकी से जवाब दिये. दीपक चौरसिया से हुई इस बातचीत को सुनने के बाद मेरे मन में कुछ बातें आयी.
दीपक जैसे लोगों का इस मीडिया क्षेत्र में उभरकर छाना ये बताता है कि इस क्षेत्र के मठों को ना सिर्फ चुनौती दी जा सकती है बल्कि उनके वर्चस्व को तोड़ा भी जा सकता है. यहाँ दीपक जैसे लोगों से आशय ये है कि मीडिया में कुछेक खास वर्ग के लोगों का वर्चस्व है और दीपक उस खास वर्ग के ना होते हुए भी ना सिर्फ टिक पाये बल्कि छा गये. दीपक ने ये भी बताया कि कैसे वो एक छोटी सी जगह से शुरुआत करके आज यहाँ तक पहुँचे हैं, इस बीच उन्होंने खुले मन से ये बात भी स्वीकारी कि किसने उन्हें यहाँ संरक्षण दिया और उनके जाने के बाद फिर कैसे उनको मुश्किलों का सामना करना पड़ा.
बेशक आप दीपक से सहमत हों या ना हो पर ये तो मानना पड़ेगा कि दीपक एक जुझारू व्यक्तित्व हैं. जब यशवंत ने दीपक से पूछा कि युवाओं के बारे में क्या सोचते हैं तो दीपक ने कहा कि आज की नयी पत्रकार पीढ़ी मेहनत नहीं करना चाहती, मैं आज जो कुछ हूँ वो रातों रात नहीं बल्कि 15 साल मेहनत करके बना हूँ.
जब यशवंत ने उनसे नयी प्रतिभाओं को मौका देने के लिये कहा तो दीपक ने अपनी सहमति दी कि अगर कोई भी अपनी कोई छोटी वीडियो क्लिप उन्हें मेल करे तो उस पर विचार किया जायेगा. एक बात तो माननी पड़ेगी कि दीपक चौरसिया हिंदी मीडिया के महेन्द्र सिंह धोनी हैं जिन्होंने मठों को दरकिनार करते हुए अपनी पहचान बनायी है. अब जब दीपक यहाँ तक पहुँच गये है तो देखना है कि क्या ये पुरानी व्यवस्था के बाहर जाकर नयी व्यवस्था को तलाश करने की कोशिश करेंगे या फिर उन्हीं मठों में मिल जायेंगे.
भड़ास के एडिटर यशवंत और भड़ास से नए जुड़े विवेक के फेसबुक वॉल से.
दीपक चौरसिया से सबक, मठों को चुनौती देना और इनके वर्चस्व को तोड़ना संभव दीपक चौरसिया से सबक, मठों को चुनौती देना और इनके वर्चस्व को तोड़ना संभव Reviewed by Sushil Gangwar on October 03, 2013 Rating: 5

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