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Saturday, 31 August 2013

इनसे मैने बहुत कुछ सीखा

इनसे मैने बहुत कुछ सीखा----
मेरी अपनी जिंदगी लापरवाही की दास्तान है। मुफलिसी में भी मै मस्त रहा। कभी कोई चिंता या फिक्र नहीं की और आज भी नहीं करता। मजे की बात कि मेरे तमाम शुभङ्क्षचतक गुरुजन और मित्र मेरे कल की फिक्र करते रहते हैं इसलिए काफी हद तक मैं निश्चिंत रहता हूं। मेेरे ऐसे तमाम शुभचिंतक और मित्रों की वजह से मैं यहां तक पहुंच सका। आज उन्हें याद करता हूं तो वाकई लगता है कि मेरी जिंदगी कैसी होती अगर ये लोग न मिले होते और मैं एक अच्छे शिष्य की तरह कुछ नहीं सीखता। 
इनमें सबसे पहला नाम Santosh Tewari का है, जो आजकल चंडीगढ़ में टिब्यून ग्रुप के हिंदी अखबार दैनिक ट्रिब्यून के संपादक, मुद्रक व प्रकाशक हैं। बात 1976 की है। एक दिन संतोष तिवारी ने मुझसे कहा कि क्या कर रहे हो, कुछ लिखते पढ़ते क्यों नहीं? मैने कहा कि मुझे तो लिखना आता ही नहीं। उसने कहा कि अच्छा अपने कमरे के बारे में एक निबंध लिखो। मैने लिखा मेरा कमरा, दस बाई बारह का जिसमें एक टाल है और लकड़ी के फट्टे को लगाकर एक रैक बनाई गई है जिस पर लाल रंग का एक कपड़ा बिछा है और उस पर चाय के बर्तन, कुछ पुरानी किताबें और जितना भी हमारे घर में दिखावटी सामान है, सब रखा है। लाल रंग के कपड़े के नीचे कुछ रेजगारी और श्रीमद्भागवत किताब में कुछ सौ-सौ के नोट रखे हैं। खिड़की की साइड में एक पलंग है जिसके एक तरफ सारे बिस्तर रोल बनाकर रखे गए हैं और उस पर चार खाने की एक चादर बिछी है। कमरे में एक बड़ा सा ट्रंक और उसके ऊपर कुछ और बक्से रखे हैं। खूंटी में पिताजी का कुरता और अधफटी धोती टंगी है। मेरी भी बुश्शर्ट और पाजामा उसी पर टंगा है। दरवाजे के दो जोड़ी जूते रखे रहते हैं जिसमें एक पिताजी का गोरक्षक मार्का कपड़े का दूसरा मेरा प्लास्टिक का जूता जिसे गर्मी, सर्दी और बरसात में पहनते हैं। 
संतोष को दिखाया तो उसने कहा लो हो गए तुम पास। अब कुछ कहानियां वगैरह लिखो। मैने लिखी एक कहानी वंश हत्या। अब उसने कहा कि इसे पहले कामतानाथ जी को दिखाते हैं। कामता जी ने कहानी सही कर दी और संतोष ने ही उसे दैनिक जागरण के मैगजीन एडिटर Vijay Kishore Manav को भेज दी। कहानी छप गई और फिर उसके बाद मुझे पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा। इस तरह पत्रकारिता मेें मेरे पहले गुरु हुए संतोष तिवारी हुए। इसके बाद विजय किशोर मानव ने मुझे हरिनारायण निगम से दैनिक जागरण में रखने को कहा और मैने दिसंबर 1979 में जागरण में बतौर ट्रेनी भरती कर लिया गया। दैनिक जागरण ज्वाइन करने के कोई हफ्ते भर बाद ही मुझे आईआईटी में एक घटना कवर करने को कहा गया। उन दिनों कानपुर आईआईटी में अंग्रेजी का इतना खौफ था कि एक दलित छात्र को तनाव में आकर खुदकुशी करनी पड़ी। छात्रों ने वहां आंदोलन शुरू किया तो मैं अपना रिपोर्टिंग का काम भूलकर तीन दिन तक आईआईटी में ही छात्रों के साथ लाल झंडा उठाकर खड़ा हो गया। (आईआईटी में दलित छात्रों की अंग्रेजी की इस पीड़ा को सुप्रसिद्ध उपन्यासकार गिरिराज किशोर ने अपने उपन्यास प्रायश्चित में बहुत मार्मिक ढंग से व्यक्त किया है।) बहरहाल मुझे पकड़कर बुलाया गया और विजयकिशोर मानव तथा हरिनाराययण निगम ने हिदायत दी कि मैं भविष्य में सिर्फ रिपोर्टिंग करूं आंदोलन नहीं।
दिल्ली में जनसत्ता में आने के बाद प्रभाष जी से लिखने की प्रेरणा मिली। प्रभाष जी संपादकीय के साथ-साथ एक ही दिन में चार या पांच लेख लिख देते और खबरों का संपादन भी कर लेते। उनके बाद किसी ने प्रभावित किया तो बनवारी जी ने अपनी सरलता और सहजता से। Rahul Dev ने अपनी भलमनसाहत से तथा अंगे्रजी व हिंदी में साधिकार पकड़ बनाए रखने की क्षमता ने। Om Thanvi ने प्रभावित किया अपनी निष्पक्षता से और योग्यता को बिना किसी राग द्वेष के प्रमोट करने की उनकी प्रेरणा से। ओम थानवी अगर जनसत्ता के प्रधान संपादक बनकर दिल्ली न आए होते तो शायद मैं जनसत्ता में डीएनई रहता हुआ कुंठित बना रहता और जीवन कुढ़-कुढ़ कर बिता देता। ओम थानवी ने मुझे सबसे पहले चंडीगढ़ और फिर कोलकाता का स्थानीय संपादक बनाया। 
बाद में मैने अमर उजाला ज्वाइन किया तो वहां स्वर्गीय अतुल माहेश्वरी से सीखा कि एक संपादक को हर खबर पर पैनी नजर रखनी चाहिए। वे जब कानपुर आते तो एक-एक आदमी को पहचानते तथा दूर दराज के गांवों में काम कर रहे स्ट्रिंगरों को उनके नाम से बुलाते। वे खबरों में अपनी इतनी पकड़ रखते कि कई बार मेरठ से कानपुर फोन कर देते कि शुक्ला जी आपके संस्करण के लिए अमुक लीड ठीक रहेगी।

Sabhar- Shambhunath Shukla ji ki facebook se .. 

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