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नहीं चाहिए हत्यारे और बलात्कारी!

अखिलेश सरकार के एक और विधायक ने राजनेताओं का सम्मान बढ़ा दिया है। विधायक जी छः कालगर्ल के साथ गोवा में गिरफ्तार कर लिये गये हैं। उन्हें जेल भेजने के साथ यूपी के विधानसभा अध्यक्ष को सूचना दे दी गयी है। माननीय विधायक जी इससे पहले हत्या और लूट जैसे मामलों में भी मुल्जिम रहे हैं। मगर हमारी विधानसभा और लोकसभा ऐसे लोगों को सम्मान बढ़ाती है। इसलिए जब सुप्रीम कोर्ट दो साल की सजा पाये लोगों को बाहर का रास्ता दिखाने की बात करती है तो सभी दल एक विधेयक लाकर कानून बनाते हैं और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को दरकिनार करते हैं। हमारे देश के सौ करोड़ लोग इन नाकारा और नपुंसक राजनेताओं की इस गुडा गर्दी को खामोशी के साथ देखते रहते हैं क्योंकि सभी चोर मिलकर इस कानून में एक दूसरे का साथ देते है और आम आदमी यह समझ नहीं पाता कि सांपनाथ और नागनाथ में आखिर वह किसका साथ दें। हमारे लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर लोकसभा और विधानसभा में हत्यारों, लुटेरों और बलात्कारियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और हम सब खामोशी से देख रहे हैं क्योंकि हम अभिशप्त है ऐसे ही लोगों को झेलने के लिए।hatyara
विधायक मंहेन्द्र सिंह वर्ष 1996 से लगातार विधायक चुने जाते रहे हैं। सीतापुर के लोग समझ भी नहीं सकते थे कि वह लगभग सोलह साल से जिस व्यक्ति को अपना नेतृत्व सौंप रहे हैं वह व्यभिचारी और अय्याश निकलेगा। एक ठेकेदार इस विधायक को लेकर गोवा गया और वहां छः लड़कियों की व्यवस्था कराई गयी जिससे विधायक जी खुश हो जायें और लौटकर इस ठेकेदार को ज्यादा से ज्यादा काम दे दें।
डीपी यादव को पार्टी में सिर्फ इसलिए न लेने कि वह अपराधी छवि के हैं वाले मुख्यमंत्री अखिर ऐसे लोगों को पार्टी से बाहर का रास्ता क्यों नहीं दिखा पा रहे। यह समाजवाद का कौन सा नया रूप है। यह कोई पहला मामला नहीं है। सत्ता के मद में चूर एक मंत्री अमरमणि त्रिपाठी खुलेआम लखनऊ की एक कवियत्री मधुमिता शुक्ला की इसलिए हत्या करवा देता है क्योंकि उसके गर्भ में मंत्री का बच्चा पल रहा है। होना यह चाहिए कि सभी राजनीतिक पार्टियों को ऐसे हत्यारों और व्यभिचारियों को कड़े से कड़ा दंड दिलवाने के लिए एकजुट होना चाहिए। मगर समाजवादी पार्टी न सिर्फ उसको टिकट देती है बल्कि जेल में उसको कोई असुविधा न हो इसके भी इंतजाम करती है।
सपा मुखिया अपनी राजनीति में यह काम करते रहे हों तो भी समझ आता है। मगर अखिलेश यादव की तो सही मायनों में अभी राजनीति की नई शुरूआत है। वह युवाओं के रोल मॉडल के रूप में उभरे हैं। उन्हें प्रदेश भर के लोगों का समर्थन सिर्फ जाति के आधार के रूप में नहीं मिला बल्कि उन्हें उन लोगों ने वोट दिया जो मुलायम सिंह और मायावती की जाति की राजनीति से उब चुके थे और उन्हें लगता था कि अखिलेश के रूप में एक ऐसा नौजवान सत्ता के करीब आ रहा है जो जाति और अपराध की राजनीति न करके विकास की राजनीति की बात करता है। अब अगर अखिलेश यादव भी इन गुंडे विधायकों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेंगे तो बड़ी संख्या में ऐसे लोगों को निराशा तो होगी ही। सवाल सिर्फ यूपी और अखिलेश यादव का ही नहीं है। कोई पार्टी अब इतनी दूध की धुली नहीं रह गयी कि वह अपराधियों को संरक्षण न देती हो। लोकसभा में सभी राष्ट्रीय दलों में ऐसे अपरधियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। संसद हमारे देश का लोकतंत्र का मंदिर कहलाता है। इस मंदिर में हत्यारे, लुटेरे, बलात्कारी जब बैठते हैं तो सही मायनों में इस देश के लोकतंत्र की हत्या होती है और हत्या करने वाले लोग शान के साथ फिर से सत्ता संभालने की बात करने लगते हैं।
जब देश के लोगों का गुस्सा चरम पर पहुंचने लगा और लोगों को लगने लगा कि अब इस व्यवस्था में परिवर्तन होना ही चाहिए तब उसी दौर में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में आदेश दिया कि दो साल से ज्यादा सजा पाये लोग संसद और विधानसभाओं में नहीं बैठ पायेंगे। जेल में बंद लोग चुनाव नहीं लड़ पायेंगे। पूरे देश ने इस फैसले का स्वागत किया।
मगर हमारे राजनेताओं को लगा कि अगर ऐसा हो गया तो उनका भविष्य ही खतरे में पड़ जायेगा। अगर यह अपराधी नहीं होंगे तो कौन चुनाव के लिए धन इकट्ठा करेगा और कौन अपनी गुंडागर्दी से जीतने के बाद धंधे करायेगा। लिहाजा सभी ने मिलकर कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट का काम नहीं है और सभी मिलकर एक कानून बनाने में जुट गये जिससे सुप्रीम कोर्ट का आदेश लागू न हो सके।
यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि सौ करोड़ के लोगों की तकदीर का फैसला वह लोग करते हैं जिन्हें इस देश के आम आदमी के दर्द से कोई वास्ता नहीं है। ऐसा नहीं है कि सभी सांसद ऐसे हों मगर दुर्भाग्य है कि संसद में ऐसे सदस्यों की संख्या लगातार बढ़ रही है और इस पर रोक का कोई उपाय भी नजर नहीं आ रहा।
हमारे राजनेता भी अपनी इसी तानाशाही को इसलिए अपना लेते हैं क्योंकि हमारे देश के आम आदमी ने अपना विरोध करना छोड़ दिया है। उनको पता है कि अगर वह सब एक हो जायेंगे तो जनता की मजबूरी किसी ने किसी के साथ जाना होगी और ऐसे में उसे सांपनाथ या नागनाथ में एक को चुनना होगा। लोग भी इसलिए खामोश होकर बैठ जाते हैं कि अगर इन्हें नहीं चुनेगे तो दूसरा भी इनसे कम बेईमान नही। बेचारे सिर्फ यही कहते हैं क्या किया जाये इस देश का कुछ नहीं हो सकता।
मगर अब वक्त आ गया है कि इस देश के आम आदमी को अपनी ताकत का एहसास करना ही पड़ेगा। एक अन्ना के आंदोलन ने कांग्रेस और भाजपा दोनों के पसीने छुड़ा दिये थे। पूरे तंत्र ने मिलकर अन्ना के आंदोलन को बदनाम करने की कोई कोशिशें नहीं छोड़ी। मगर अन्ना और केजरीवाल ने एक संदेश तो साफ तौर पर दे ही दिया कि अगर आम आदमी सड़कों पर आ जाये तो खुद को इस देश का भाग्य विधाता कहने वाले लोगों के भी पसीने छूट सकते हैं। तो फिर एक आंदोलन की शुरूआत और क्यों नहीं……
संजय शर्मा

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