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चिदर्पिता ने दैनिक जागरण, हरिद्वार के पत्रकारों को बिका हुआ बताया


Sadhvi Chidarpita : आश्रम जाना स्वामी चिन्मयानंद के पास जाना नहीं है। आश्रम ट्रस्ट द्वारा संचालित है और सार्वजनिक संपत्ति है। साल में हजारों ऐसे लोग भी आश्रम जाते हैं जो स्वामी चिन्मयनन्द का नाम तक नहीं जानते। दूसरी बात यह कि जैसे वो अध्यक्ष हैं वैसे ही मैं भी आश्रम की प्रबन्धक हूँ। उनके पूर्वजों ने वो संपत्ति उनके नाम नहीं कर दी थी और मेरे पूर्वजों ने आश्रम की भैंस नहीं खोल ली थी। वो मुफ्त में रहते हैं पर मैंने आश्रम में रहते हुए सदैव अपनी सेवाएँ दी हैं। आश्रम का प्रबंधन देखा है, शिक्षण संस्थाओं में बिना वेतन के पढ़ाया है और गंगा तट पर आरती की है जो पिछले कुछ वर्षों में परमार्थ का सबसे महत्वपूर्ण और लाभदायक प्रकल्प बन गया था।
इस बार रहते हुए मैं ऐसी किसी सेवा से नहीं जुड़ पायी तो आते हुए साधारण यात्रियों की तरह ही रसीद कटाकर आई हूँ। वैसे भी मैं परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश में रही हूँ जिसके अध्यक्ष मुनिजी हैं, स्वामी चिन्मयानंद नहीं। आज और आगे भी मैं जब चाहे आश्रम जाने का अधिकार रखती हूँ और किसी की हैसियत नहीं कि मेरे इस अधिकार को चुनौती दे सके। एक अभियुक्त और उसके चमचों की तो कदापि नहीं।

मैंने पति से मनमुटाव होने पर आश्रम का विकल्प ही क्यों चुना, का जवाब यह है कि, मेरे पास और कोई ठिकाना होता तो मैं इतने वर्ष आश्रम में रहती ही क्यों। यही मैंने अपनी एफआईआर और बयान में भी कहा है। वहाँ रहते हुए भी मैंने अपनी लड़ाई जारी रखी और तमाम कोशिशों के बावजूद उससे एक कदम भी पीछे नहीं हटी। न तो अपना बयान बदला और न ही कोर्ट में कोई कागज दिया।

मेरे आश्रम पहुँचने के बारह घंटे के अंदर दैनिक जागरण, नोएडा से फोन पर पूछा गया कि उस केस का क्या होगा, तो मेरा जवाब था कि वो केस कोर्ट में है और उसका निर्णय कोर्ट में ही होगा। शब्दवीर और दैनिक जागरण, हरिद्वार के बिके हुए पत्रकार बताएं कि क्या कोई आश्रित व्यक्ति ऐसे रह सकता है? भंडारे के समय संन्यासियों की तरह भोजन के बाद ग्यारह सौ का लिफाफा लेने वालों को अपनी न सही कम से कम पत्रकारिता की इज्ज़त रखनी चाहिए।
साध्वी चिदर्पिता के फेसबुक वॉल से साभार.

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Sushil Gangwar