नेशनल दुनिया को लॉन्च करना एक चुनौती थी


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पद्यश्री आलोक मेहता ने हिंदी पत्रकारिता को एक नई पहचान दी है। सात सितंबर 1952 को मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में जन्मे आलोक मेहता पिछले करीब चालीस वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।

आलोक मेहता ने प्रिंट पत्रकारिता के साथ-साथ टेलीविजन और रेडियो के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य कर अपनी अलग पहचान बनाई है। दूरदर्शन, आकाशवाणी और अन्य टीवी चैनलों पर समसामयिक विषयों पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों में उन्हें अक्सर देखा और सुना जाता है। आलोक मेहता राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के साथ व कई अन्य प्रतिनिधिमंडलों में शामिल होकर विदेश जाने का अवसर भी कई बार मिला है। वे 35 से ज्यादा देशों की यात्राएँ कर चुके हैं।
पत्रकारिता, पर्यटन, कविता, कहानियों और समसामयिक विषयों पर उनकी करीब एक दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें नामी चेहरे-यादगार मुलाकातें, पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा, भारतीय पत्रकारिता, इंडियन जर्नलिज्म-कीपिंग इट क्लीन, सफर सुहाना दुनिया का, तब और अब, चिडिय़ा फिर नहीं चहकी (कहानी संग्रह), भारत में पत्रकारिता, राइन के किनारे, स्मृतियाँ ही स्मृतियाँ, राव के बाद कौन, आस्था का आँगन, सिंहासन का न्याय, अफगानिस्तान-बदलते चेहरे आदि प्रमुख हैं।
पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में आलोक मेहता के योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार, हिंदी अकादमी दिल्ली द्वारा साहित्यकार सम्मान, राष्ट्रीय सद्भावना पुरस्कार-1983, इंदिरा प्रियदर्शिनी सम्मान-1995, पत्रकारिता में उत्कृष्ट सम्मान-1995, राष्ट्रीय तुलसी सम्मान-1996, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा पत्रकारिता भूषण सम्मान-2006 और हल्दी घाटी सम्मान-2007 से सम्मानित किया जा चुका है। आलोक मेहता एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।
इसके अलावा वे नेशनल बुक ट्रस्ट, राजा राममोहन राय फाउंडेशन पुस्तकालय कोलकता के न्यासी और भारतीय प्रेस परिषद, प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, वर्ल्ड मीडिया एसोसिएशन वाशिंगटन, भारत सरकार की शिक्षा नीति समिति, इंडिया नेशनल कमीशन फॉर को-ऑपरेशन विध युनेस्को आदि संस्थाओं से भी जुड़े रहे हैं।
‘नेशनल दुनिया’ के प्रधान संपादक आलोक मेहता ने समाचार4मीडिया के असिस्टेंट एडिटर नीरज सिंह से की गई बातचीत अपने पत्रकारीय जीवन खासकर नई दुनिया से जुड़े अनुभवों पर बेबाकी से अपनी राय रखी। प्रस्तुत हैं बातचीत के कुछ अंश :
पत्रकारिता की शुरुआत कैसे हुई, साथ ही अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में भी कुछ बताइए
मेरे पिताजी शिक्षक थे। गांव में ही प्राथमिक शिक्षा हुई, उज्जैन के पास एक गांव में। गांव भी काफी पिछड़ा हुआ था। एक बार गांव में सेठ गोविंद दास के बेटे, जगमोहन दास आए, वे तत्कालीन शिक्षा मंत्री थे। मैंने उन्हें बताया कि यहां तो चौथी के बाद पढ़ाई ही नहीं है। उसके बाद मेरे पिताजी का तबादला ऐसी जगह पर किया गया जहां पर हायर सेकेंडरी की पढ़ाई थी। कुछ समय बाद हम उज्जैन आ गए। मेरे पिताजी शिक्षक थे और मामा आयुर्वेद के चिकित्सक थे। इसलिए घर में प्रारंभ से ही ऐसे संस्कार थे कि मेरा रुझान वाद-विवाद प्रतियोगिता, कविता पाठ, नाटक जैसी सांस्कृतिक गतिविधियों में शुरु हो गया। हालांकि मैं चाहता था कि मैं डाक्टर बनूं और लोगों की सेवा करूं, लेकिन जब इन प्रतियोगिताओं में भाग लेने लगा और मेरी ख़बरें छपने लगीं तो पत्रकारिता के प्रति आकर्षण बढ़ा। इसी आकर्षण के चलते ‘हिन्दुस्तान समाचार एजेंसी’ के लिए उज्जैन से अंशकालिक संवाददाता के रूप में लिखना शुरू किया। साथ-साथ ‘नईदुनिया’ के लिए भी लिखना शुरू किया। इस तरह यह सिलसिला शुरू हो गया। “नईदुनिया’ के जब छह से आठ पेज होने वाले थे तब इंदौर में संस्थान से जुड़े जो स्ट्रिंगर व स्टाफर थे उनकी एक वर्कशॉप हुई। राजेंद्र माथुर जी और राहुल बारपुते जी भी उस वर्कशॉप में आए थे। जिन लोगों की कॉपी अच्छी थी उन्हीं में से एक मुझे राजेंद्र माथुर जी ने बुलाया और कहा कि ‘नईदुनिया’ का विस्तार हो रहा है हम चाहते हैं कि आप नियमित तौर पर ‘नईदुनिया’ से जुड़िए। इस तरह में इंदौर आ गया और ‘नई दुनिया’ में नियमित तौर पर काम शुरू किया। यह 1069-70 की बात है। राजेंद्र माथुर जी से काफी कुछ सीखने को मिला। फिर मुझे लगा कि अगर और काम सीखना है तो इंदौर से निकलकर किसे बड़े शहर की ओऱ रुख करना होगा। इस तरह 1971 में मैं दिल्ली आया था और 1975तक ‘हिंदुस्तान समाचार एजेंसी’ में रहा। 1976 में मैं “साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ में आ गया। मूलत: तो मैं राजनीतिक रिपोर्टर था, लेकिन उस दौर में लिखने की इतनी स्वतंत्रता रहती थी कि राजनीतिक संवाददाता की खबरें सांस्कृतिक-सामाजिक विषयों पर भी प्रकाशित होती थीं। एक उदाहरण याद आ रहा है इस समय। इमरजेंसी के दौरान मैं उत्तरप्रदेश में मिर्जापुर जिले के समीप एक गांव में था। वहां नसबंदी के ऑपरेशन हो रहे थे। मेरे पास एक कैमरा था तो मैंने कुछ फोटो खींचे और साप्ताहिक हिन्दुस्तान में छह पेज का ब्यौरा लिखा। मैंने पहले ही इंदिरा गांधी को इसकी एक प्रति लिख कर दे दी थी, क्योंकि मुझे लगता था कि अगर मेरी गिरफ्तारी होगी तो प्रधानमंत्री कार्यालय से होगी। तुरंत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने नारायणदत्त तिवारी को फोन किया और उनसे अधिकारियों पर कार्यवायी करने को कहा। मेरे कहने का मतलब यह है कि तब माहौल ऐसा था और संपादकीय स्तर पर इतनी छूट थी कि पत्रकार सीमाओं में नहीं बंधा था। फिर मैं 1979 से 82 यानी तीन वर्षों के लिए वायस ऑफ जर्मनी की हिंदी सेवा में बतौर संपादक जर्मनी चला गया। वहां से लौटा तो पहले ‘दिनमान’ के साथ जुड़ा और फिर ‘नवभारत टाइम्स’ ज्वाइन कर लिया। शुरुआत में कुछ समय तक पटना में स्थानीय संपादक की भूमिका निभाई और फिर राजेंद्र माथुर जी के निधन के बाद, मैं वापस दिल्ली आ गया। 1994 के आस-पास मैं ‘हिन्दुस्तान’ में एडिटर हो गया। ‘हिंदुस्तान’ से जुड़े कई कड़वे-मीठे अनुभव हैं। वहां भी जमकर काम किया। 2002 तक हिंदुस्तान के साथ रहा और फिर ‘दैनिक भास्कर’ के साथ कुछ समय तक बतौर समूह संपादक जुड़ा रहा । फिर मैं ‘आउटलुक’ चला गया और “आउटलुक’ के बाद 2008 में ‘नईदुनिया’। (हंसते हुए) बाकी की पूरी कहानी तो आपको पता ही होगी
राजेंद्र माथुर के साथ कोई रोचक अनुभव? उनसे जुड़ा कोई वाक्या?
बचपन से ही मुझे उनसे पिता समान प्यार मिला। सरलता उनमें इतनी थी जो कि मिसाल है। पंजाब पर उन्होंने जितना तीखा लिखा, बहुत कम लोगों ने लिखा, फिर भी उन्होंने कभी सिक्योरिटी की मांग नहीं की, जबकि उसी समय अरुण शौरी जैसे कई पत्रकारों ने सिक्युरिटी ली थी। लेकिन माथुर साहब ने इसके लिए मना कर दिया था। उनमें प्रकृति सुलभ सहजता था। ऐसी बहुत सारी घटनायें हैं। किसी दबाव में ना आना, उनमें सबसे बड़ा गुण था।
नईदुनिया दिल्ली से जब बंद हुआ तो लोगों ने कहा कि पत्रकारिता के एक युग का अवसान हो गया। आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
मैंने खुद को नई दुनिया के साथ ही बढ़ते हुए पाया। पत्रकारिता के कैरियर की शुरुआत भी नई दुनिया से की। आपको यकीन नहीं होगा, जब मैं जर्मनी में था तब भी, तब मैं वहां भी डाक से ‘नईदुनिया’ मंगाता था। ‘नईदुनिया’ को दिल्ली में शुरू करने की योजना भी मेरी ही थी। और दिल्ली में ‘नईदुनिया’ को अच्छा रेस्पॉन्स भी मिला। मुझे पैसे का कभी से लोभ नहीं रहा। मैंने हमेशा कहा है कि मैं सिर्फ पत्रकारिता कर सकता हूं। मैं पत्रकारिता में पूरी तरह से ईमानदार रहा हूं। प्रबंधन की योजना थी कि पहले साप्ताहिक ‘नईदुनिया’ की शुरुआत की जाएगी और जब अखबार जम जाएगा तो दैनिक किया जाएगा। इंदौर में ‘नईदुनिया’ और दूसरे अखबारों के बीच में प्रतिस्पर्धा थी। इस प्रतिस्पर्धा के चलते कई बार ऐसा होता कि जो पैसा नेशनल ‘नईदुनिया’ पर खर्च करने के लिए आवंटित होता उसे इंदौर में लगा दिया जाता। एक संपादक अखबार के संपादकीय स्तर पर प्रबंधन कर सकता है, लेकिन पैसे का प्रबंधन करना संपादकीय दायित्वों से बाहर है। और ऐसा मैंने किया भी था दिल्ली में जब ‘नवभारत टाइम्स’ 12 पेज का निकलता था और मैं पटना में संपादक था तो पटना में अखबार 20 पेज का निकलता था। दुर्भाग्य से कुछ ऐसी घटनायें घटने लगीं कि मुझे लगने लगा कि शायद प्रबंधन की ओर से सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। शुरुआत में खर्च कम करने की बात हो रही थी। मैंने सुझाव दिया की एक सेंट्रल डेस्क बनाई जाए जिससे खर्च अपने आप कम हो जाएगा। मेरे तरफ से कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन प्रबंधन अखबार को चलाना ही नहीं चाहता था। मेरे ऊपर अपने पूरे स्टाफ की जिम्मेदारी थी जो पिछले कई वर्षों से मेरे साथ जुड़े थे। मैंने पहले ही कहा कि मुझे लगने लगा था कि प्रबंधन अब ‘नईदुनिया’ दिल्ली को बंद करने वाला है और पत्रकारिता के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ होगा कि आज एक अखबार बंद हुआ और कल उसी टीम ने नया अखबार खड़ा कर दिया।
क्या ये सुनियोजित था या एकदम से नया प्लान था?
एकदम से नया प्लान तो नहीं कहूंगा। जब ‘नईदुनिया’ को नए प्रबंधन के हाथ में देने की बात शुरू हुई तभी इस बात की भनक लगने लगी थी कि प्रबंधन अखबार को बेचना या बंद करना चाहता है। प्रबंधन ने हमें कभी यह नहीं बताया उनकी ओर से बस यही था कि दिल्ली संस्कऱण घाटे में चल रहा है, इसलिए इसे बंद कर दिया जाए। दिल्ली में तब ‘नईदुनिया’ की एक लाख प्रतियां प्रकाशित हो रही थीं। इसी बीच हम लोगों ने नए अखबार की तैयारी शुरू कर दी। हमारे पास एक चुनौती थी कि अगर हम समय पर नया अखबार नहीं निकालेंगे, तो ‘नई दुनिया’ के पाठक दूसरे अखबार की ओर चले जाएंगे। इसलिए हमारी टीम ने दिन-रात मेहनत की। लोगों ने साइबर कैफे, प्रेस क्लब और यूनियन के दफ्तरों से स्टोरी फाइल की। जिस दिन ‘नईदुनिया’ को बंद होना था उसी स्टाफ, वही कंटेट उसी तेवर और कलेवर के साथ हमने ‘नेशनल दुनिया’ लॉन्च कर दिया। अगले दिन जब हमारे पाठकों को अखबार मिला तो नई कि जगह नेशनल था बाकि सब कुछ वैसा ही।
तो क्या घाटे का डर नेशनल दुनिया प्रबंधन को नहीं है?
देखिए शुरुआत में तो मुनाफे की बात किसी भी प्रबंधन को नहीं सोचनी चाहिए। यह बात प्रंबधन को भी पता है। और फिर अभी अखबार को शुरू हुए दो तीन-महीने ही हुए हैं। साथी तो सब पुराने ही हैं, लेकिन सेटअप नया है। फिर अब काफी कुछ चीजें ढर्रें पर आ गई हैं. जल्दी ही अखबार को खासी लोकप्रियता भी मिल गई है। हमने अखबार शुरू किया घाटे या फायदे को देखते हुए नहीं। अखबार शुरू किया गया एक चुनौती के साथ कि ‘नईदुनिया’ जिस दिन बंद हो उसके अगले दिन पाठक ठगे न रहें। हमने इसमें सफलता पाई, यही हमारे लिए सबसे बड़ा फायदा है।

‘नेशनल दुनिया’ के विस्तार के लिए आप क्या कर रहे हैं?
अभी तो ‘नेशनल दुनिया’ को मार्केट में आए कुछ ही महीने हैं। हर पहलुओं पर हम काम कर रहे हैं। और भी एडिशन निकालने की तैयारी हो रही है। प्रबंधन भी इस बात को लेकर उत्सुक है कि जितनी जल्दी हो सके अन्य राज्यों में ‘नेशनल दुनिया’ के संस्करण निकाले जाएं।

एक बड़ा वर्ग आपको कांग्रेस परस्त कहता है। आप इस पर कोई सफाई देना चाहेंगे?
सफाई जैसी तो कोई बात नहीं है। एक पत्रकार जो लंबे समय तक राजनीतिक रिपोर्टिंग करता रहता है उसके बारे में ऐसी धारणा का बन जाना आम बात है। मैं जब ‘नवभारत टाइम्स’ में संवाददाता था, इंटेलीजेंस ब्यूरो के लोग अक्सर पूछा करते थे कि क्या राजेंद्र माथुर कांग्रेसी हैं? चूंकि माथुर साहब ने ऑपरेशन ब्लूस्टार के समर्थन में काफी लिखा था, तो लोग कहते थे वे कांग्रेसी हैं। एक बार माथुर साहब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आयोजन को संबोधित करने चले गए तो लोगों को लगा कि माथुर साहब संघ की विचारधारा से प्रभावित हो रहे हैं। मनोहर श्याम जोशी अटल बिहारी वाजपेयी की कवितायें छापते थे। जब “नवभारत टाइम्स’ में मेरी नियुक्ति होनी थी तो दो महीने तक मेरी नियुक्ति टाली गई क्योंकि मेरे बारे में लोगों को भ्रम था कि यह आरएसएस का आदमी है इसे नहीं होना चाहिए था, क्योंकि तब कांग्रेस का प्रभाव था। मेरे कहने का मतलब है एक राजनीतिक रिपोर्टर खबरों के लिए हर दल और हर नेता से ताल्लुक रखता है। मैं भी मोहन भागवत के कार्यक्रम में जाता हूं और शरद यादव के कार्यक्रम में भी जाता हूं। भैंरो सिंह शेखावत जी से मेरे अच्छे संबंध रहे हैं, लेकिन जब मैं ‘आउटलुक’ में था तो हिन्दी ‘आउटलुक’ में उनके खिलाफ काफी कुछ काफी कुछ लिखा गया। मैं बीजेपी की आलोचना तभी लिख सकता हूं जब मैं उस दल को समझता हूं। मैं कांग्रेस के बारे में लिखता हूं क्योंकि मुझे उसके बारे में पता है। मैंने एक किताब लिखी ‘राव के बाद कौन’। उस समय नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे। लाल किले से भाषण में 15 अगस्त को उन्होंने कहा कि ‘राव के बाद कौन’ जैसी और भी किताबें लिखी जाएं तो क्या फर्क पड़ता है। हां, कम्युनिज्म और हिंदू-मुस्लिम जैसे मुद्दों पर मैं तीखा लिखता हूं तो लोगों को लगता है कि मैं कांग्रेस के पक्ष में बोल रहा हूं। “नईदुनिया’ के प्रबंधक विनय छजलानी अन्ना हजारे के समर्थन में लिखा करते थे और मैं अन्ना हजारे के खिलाफ लिखता था। लब्बोलुआब यह है कि राजनीतिक पत्रकार तभी बेहतर और पारदर्शी पत्रकारिता कर सकता है जब वह राजनीतिक अंदरखाने की हलचलों को अच्छी तरह से समझता हो, इसके लिए आपको सबसे संबंध बनाने पड़ते हैं।
आपने पत्रकारिता पर एक किताब लिखी है ‘पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा’। आधुनिक संदर्भों में पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा क्या है?
जब मैं पटना में था तो राजेंद्र माथुर ने जोर देकर कहा कि पत्रकारिता में इस तरह के विषय पर कोई पुस्तक नहीं है, इसलिए मैं चाहूंगा कि तुम ऐसा कुछ लिखो। फिर मैंने यह पुस्तक लिखी। आपने पूछा कि आधुनिक संदर्भों में पत्रकारिता का लक्ष्मण रेखा क्या है? देखिए, पत्रकारिता का स्वरूप अब काफी कुछ बदल गया है और मैं इस बदलाव को गलत भी नहीं मानता हूं। आज संपादक कई तरह के दबावों के बीच काम करता है। लेकिन उसका संपादकीय कौशल यही है कि वह सच को सामने लाए। सभी की बात सुनिए और उसे छापिए। लेकिन जो मुझे सही लग रहा है उसे भी छापने की छूट होनी चाहिए। आउटलुक और नईदुनिया को प्रो कांग्रेस माना जाता था लेकिन कांग्रेस से कभी हमें अधिक विज्ञापन नहीं मिले। वास्तव में मैं जिस लक्ष्मण रेखा की बात कर रहा हूं उसके मायने यही हैं कि एक पत्रकार के रूप में आपके ऊपर पड़ने वाले दबाव लक्ष्मण रेखा के बाहर छूट जाएं उसके भीतर केवल सच और सही बोलने का साहस रहे।
पढ़ने-लिखने के अलावा आपकी रुचियों में और क्या-क्या शुमार है?
मीडिया में आने से पहले मुझे नाटकों का काफी शौक था। एक समय था जब मैं एनएसडी में एडमिशन लेना चाहता था। पत्रकारिता में आने के बाद समय की इतनी कमी हो गई कि नाटक केवल शौक भर रह गया। अधिकांशत: नाटक भी शाम के समय होते हैं, और वही समय अखबार के लिए भी पीक ऑवर होता है तो नाटक देख पाना संभव नहीं हो पाता। एक जमाना था जब मैं इब्राहीम अल्काजी के नाटकों का दीवाना था। सिनेमा कभी-कभी देख लेता हूं, केवल मनोरंजन के लिए। हालांकि नए कलाकारों को कम ही पहचानता हूं। आमिर खान की ‘थ्री इडियट्स’ मुझे काफी अच्छी लगी। ट्रेजडी फिल्में मुझे नहीं पसंद है। अगर कोई फिल्म देखने जाता हूं तो जानकारों से पहले ही पूछ लेता हूं भाई अंत किस तरह का है?
आपके दौर के अधिकांश पत्रकार साहित्यकार भी हैं, लेकिन अब माना जाता है कि साहित्यकार कैटिगरी के पत्रकार आधुनिक पत्रकारिता के लिए फिट नहीं है।
मैं ऐसा नहीं मानता। इस दौर में भी मेरे कई ऐसे मेरे साथी हैं, जो अच्छे साहित्यकार हैं। अच्छा लिखते हैं। मैंने भी कई कहानियां लिखी हैं। जितने भी बड़े संपादकों का आप नाम गिनाएंगे वे सब बड़े साहित्यकार भी रहे हैं और सफल पत्रकार भी। राजेंद्र माथुर जी अज्ञेय जी, मनोहर श्याम जोशी जैसे नाम इनमें शीर्ष पर मिलेंगे। मैं पिछले तकरीबन 50 वर्षों के दौर के तजुर्बे के आधार पर कह रहा हूं कि एक पत्रकार के रूप में आपकी सफलता-असफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आप अपनी भूमिका को किस तरह से निभा रहे हैं।
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नेशनल दुनिया को लॉन्च करना एक चुनौती थी नेशनल दुनिया को लॉन्च करना एक चुनौती थी Reviewed by Sushil Gangwar on September 09, 2012 Rating: 5

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