कौन है ये असीम त्रिवेदी, क्या बेचता है?

जगमोहन फुटेला


अब से कोई दस बीस बरस पहले तक भी एक अघोषित नियम था पत्रकारिता का कि राष्ट्रपति का कार्टून नहीं बनाया जाएगा. कभी देखा भी नहीं. किसी भी अदालत के फैसले की आलोचना करने की इजाज़त नहीं थी. ऐसा कुछ भी मान्य नहीं था इस देश की व्यवस्था में कि जिस से लोकतांत्रिक या न्यायायिक संस्थाओं पर से लोगों का विश्वास कम होता हो. लेकिन ये भ्रष्टाचार एक ऐसा मुद्दा मिला है अब कुछ केजरीवालों और असीम त्रिवेदियों को कि अब हम अपने देश के लोगों नहीं, संस्थाओं को ही निबटाने में लगे हैं.



कानूनी नज़रिए से देशद्रोह का मामला न बनता हो बेशक, लेकिन भारतीय लोकतंत्र के प्रतीक चिन्हों का मज़ाक बनाने की इजाज़त नहीं दी जा सकती किसी को. क्या कमाल है कि मंदिरा बेदी की साड़ी उलटी बंध जाने पर भी झंडा उल्टा दिख जाए तो बवाल मचा देगा मीडिया, लेकिन असीम के लिए जेहाद छेड़ देगा. भ्रष्टाचार उजागर करने के लिए ही सही, कौन इजाज़त देता है किसी भी व्यक्ति को कि वो देश के लोकतांत्रिक चिन्हों का ही उपहास उड़ाने लगे. कार्टूनिस्ट भी हो तो अपनी औकात में रहो. उतना ही करो इस देश के लिए, जितना वो सह सकता है. देश तुम्हारा ही नहीं है. बाकी एक सौ तेईस करोड़ लोगों का भी है. और इन एक सौ तेईस लोगों के कुछ नियम हैं. कुछ मर्यादाएं. कुछ नियम और कुछ कानून. वे कानून जो जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने भी लागू किए हैं इस देश में. ये अलग बात है कि अपनी नई जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिए अब वे इस कार्टून सहित मीडिया की कुछ ज्यादा ही आज़ादी की वकालत कर रहे हैं. बड़ी विनम्रता और आदर के साथ सवाल उन से भी है कि अब असीम को पकड़ने वाले पुलिस वालों को ही अंदर करा देने की बात कह कर क्या उन असीम त्रिवेदियों को शह नहीं दे रहे वे जो अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब उछ्रंखलता का खुला लायसेंस मान बैठे हैं. अगर नहीं ही रखनी थी अपने लोकतांत्रिक चिन्हों की मर्यादा तो तिरंगे झंडे की ब्ल्यू बुक की भी क्या ज़रूरत थी?



मेरी औकात नहीं है कि न्यायमूर्ति काटजू से प्रश्न करूं. फिर भी जिज्ञासावश उन से इतना ज्ञान अर्जित करना चाहूंगा कि क्या कोई भी आज़ादी, खासकर लोकतांत्रिक व्यवस्था में, अनियंत्रित भी हो सकती है? क्या आप देश के झंडे को कारपेट की तरह इस्तेमाल कर सकने की इजाज़त दे सकते हैं. संसद की आकृति के किसी कामोड पे बैठ के शौच करने की या अशोक चिन्ह पे पेशाब करने की?



मेरा ये मानना है कि पता इस का उन को भी है जो इस तरह की अवमाननाएं करते हैं. लेकिन अब ये तरीका हो गया है प्रसिद्धि पाने का. टोपी सीधी तो टोपी भी न थी. टेढ़ी हुई तो फैशन बन गई. पहले माबाप के सामने घर के भीतर एक कमरे में भी न बैठते थे एक साथ बहू बेटा. अब उन के साथ बाज़ार में चलते भी कमर में हाथ डाल के चलते हैं. जिप आगे ही हो पुरातनपंथ है. पीछे लगी हो तो फैशन स्टेटमेंट हो सकती है. अरविंद केजरीवाल ने सारे सांसदों को एक लाठी से हांक दिया. संसद में बवाल हुआ. कुछ ने कारवाई की बात भी की. शुकर करो, हुई नहीं. हुई होती तो वो भी बहुतों को बुरा लगता. कुछ लोग तब सांसदों को भी अंदर करने की बात कहते.


वो सब होते होते हालात काबू से बाहर होने लगे हैं. आज असीम त्रिवेदी ने संवैधानिक चिन्हों का अपमान कर देश को धता बताई है. कल कोई और कुछ भी करेगा. इस की इजात नहीं दी जा सकती. कम से कम जब तक इस देश में इन चिन्हों के प्रति के आदर और उनकी मर्यादा सुरक्षित रखने बारे कानून भी हैं तो तब तक कतई नहीं. ये नहीं हो सकता कि कानून आप को कारवाई करने के लिए बाध्य करते हों और आप वो सिर्फ इस लिए न करें कि कोई जस्टिस काटजू आप के ज़रिये वैसा होना पसंद नहीं करेंगे. बात बड़ी साफ़ है. आप कोबीवी बदल लेने का हक़ है. लेकिन जब तक वो वही है तो आप उसके टुकड़े कर उसे तंदूर में जला नहीं सकते. कानून बदल लीजिये आप. उस के बाद उड़ाइए मज़ाक अपने झंडे, संसद या चिन्हों का. कोई दिक्कत नहीं. लेकिन जब तक ये लाजिम है आप पर कि आप इस देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं और मूल्यों की रक्षा करें, तब तक आप हाथ पे हाथ रख के चुप कैसे बैठे रह सकते हो?



अंत में बड़ी ही श्रद्धा और विनम्रता के साथ एक बार फिर ये अनुरोध जस्टिस काटजू से कि मीडिया को आज़ादी दिलाएं वे बेशक. मगर दिलाएं मीडिया को ही. हर ऐरे गैरे नत्थू खैरे को नहीं. मीडिया ने अब इतने बवाल के बीच दिखाने भर को भी वो कार्टून दिखाया नहीं है. तो ये फिर मीडिया में जिम्मेवारी की भावना के कारण है. अभिव्यक्ति की असीमित, अनियंत्रित और असुरक्षित आज़ादी असम त्रिवेदियों के हाथों में निहित नहीं होनी चाहिए. होगी तो बवाल होगा. इन से असहमत बहुत से लोग इस सोच के उस पार भी हैं. और वे बहुत ज्यादा हैं. मुझे पक्का यकीन है कि कोई असीम त्रिवेदी इस देश में रहे न रहे, लोकतंत्र और उस में आस्था रखने वालों को रहना है.और जब वे भी उछ्रंखल हुए इसी तरह तो किसी असीम को वे देश में रहने नहीं देंगे.

कौन है ये असीम त्रिवेदी, क्या बेचता है? कौन है ये असीम त्रिवेदी, क्या बेचता है? Reviewed by Sushil Gangwar on September 10, 2012 Rating: 5

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