जो सच के साथ है वही निर्भीक है




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 चौथी दुनिया के प्रधान संपादक संतोष भारतीय ----
 
सबसे पहले अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में बताइये। पत्रकारिता की शुरुआत कैसे हुई और आज उन पहलुओं को कैसे याद करते हैं?
सब कुछ बड़े ही साधारण तौर पर हुआ। उन दिनों मैं बिहार में था। 1977 में जब जनता पार्टी चुनाव जीत गई तो तब जयप्रकाश नारायण ने मुझसे पूछा कि चुनाव लड़ोगे? एक बार तो मैं चौंका फिर संभलते हुए जवाब दिया कि जब आपने चुनाव नहीं लड़ा, तो हम क्यों लड़ें। उन्होंने इस बात का तो कोई जवाब नहीं दिया और अपनी ओर से जोड़ते हुए कहा कि मैं चंद्रशेखर से कहता हूं कि वे तुम्हें कहीं से चुनाव लड़वाएं। राजनीति में आने की मेरी अनिच्छा को देखते हुए जयप्रकाश जी ने साथ में यह भी कहा कि आप अच्छा लिखते हो इसलिए मुझे लगता है कि पत्रकारिता में भी बेहतर करोगे। उन दिनों‘रविवार’ की लोकप्रियता चरम पर थी और जो विचारधारा हम लोग जेपी के आंदोलन से सीख रहे थे उन्हीं सिद्धांतों की पत्रकारिता ‘रविवार’ भी कर रहा था। सुरेंद्र प्रताप सिंह ‘रविवार’के संपादक थे और इमरजेंसी  के दौरान उन्होंने हमारी काफी मदद की थी। मैंने उनसे अपनी इच्छा जाहिर की। तब मैं तकरीबन 22 साल का था और इस तरह पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़ना हुआ।
 
रविवार में पहला इंटरव्यू जो छपा वो जयप्रकाश जी का था और इसी इंटरव्यू में पहली बार जयप्रकाश जी ने जनता पार्टी के प्रति अपनी नाराजगी का इजहार किया। दिल्ली के बाद मैं लखनउ में ‘रविवार’ के लिए काम करने लगा। सुरेंद्र प्रताप जी का संपादकीय कौशल और हिम्मत ही थी कि हम लोगों ने ऐसी-ऐसी रिपोर्ट की जो मील का पत्थर साबित हुईं। इस तरह, पत्रकारिता की एक नई धारा की शुरुआत हो रही थी और मैं खुद को खुशकिस्मत मानता हूं कि मैंने न केवल उस दौर को देखा, बल्कि उसमें सहभागी बना।
 
जेपी से आपकी मुलाकात कैसे हुई?                                     
जयप्रकाश जी ने देश के युवाओं से एक अपील की थी एक साल देश के लिए दो। उन दिनों, जो सामाजिक रूप से चेतन लोग थे वे सब नक्सलवाद की ओर झुकाव रखने लगे थे। समाज को बदलने का एक ही तरीका नक्सलवाद को माना जा रहा था। चारू मजुमदार से युवा पीढ़ी बेहद प्रभावित थी। मेरे कई साथी भी नक्सल आंदोलन से जुड़ गए। जेपी गांव-गांव घूमकर लोगों से कहते कि नक्सलवाद से आप व्यवस्था को नहीं बदल सकते हैं। उन्हें लगता था इस तरह से समाज के जाग्रृत लोग गलत दिशा में जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब तक समाज के जाग्रृत लोग आगे नहीं आयेंगे तब तक समाज में परिवर्तन नहीं आयेगा। इसी दौर में, मेरी मुलाकात जयप्रकाश से हुई और फिर मैं उनके साथ जुड़ा।
 
फिर राजनीति में कैसे आना हुआ?
 
पत्रकारिता में काफी लोकप्रियता हासिल हो चुकी थी और लंबा वक्त भी बीत गया था। एक दिन ऐसे ही मित्र कमल मोरारका ने मुझसे कहा कि पत्रकारिता में अब कुछ नया करने की जरूरत है। इस तरह से काफी योजनाएं बनीं और फिर हमने दिल्ली से ‘चौथी दुनिया’ साप्ताहिक अखबार की शुरुआत की। शुरू में हमने एंटी एस्टेब्लिस्ट (सरकार/व्यवस्था विरोधी) विचारधारा को अपनाया। क्योंकि सुरेंद्र प्रताप सिंह ने हमें ऐसी ही पत्रकारिता सिखाई थी। एमजे अकबर ने हमारी रिपोर्ट को‘संडे’ में छापना शुरू किया और तब अंग्रेजी समाज के लोगों को हमारी रिपोर्ट के बारे में मालूम हुआ। हमारी रिपोर्ट को ‘संडे’ में अनुवाद करके छापा जाता था। सुरेंद्र प्रताप सिंह ने हमें सिखाया था कि अमीर और गरीब के बीच में जो कमजोर है उसके नजरिए से इंवेस्टीगेशन (खोज) करनी चाहिए। हो सकता है बाद में कमजोर ही गलत निकले, लेकिन अगर आप पहले ही मजबूत का पक्ष लेकर रिपोर्ट करेंगे तो कमजोर तो दम तोड़ देगा, उसके सामने। हमने फील्ड रिपोर्ट की परंपरा स्थापित की। बोफोर्स की स्टोरी सबसे पहले ‘चौथी दुनिया’ और चित्रा सुब्रमण्यम ने की थी। हाशिमपुरा केस, किसान आंदोलन से लेकर ऐसे कई उदाहरण हैं जिसे ‘चौथी दुनिया’ ने सबके सामने रखा। फिर, अचानक चुनाव की घोषणा हो गई। और वीपी सिंह ने मेरे नाम की घोषणा कर दी। उनके साथ मेरा संबंध जब वे मुख्यमंत्री थे, तभी से था।  वीपी सिंह का मानना था कि अगर अच्छे लोग राजनीति में नहीं आयेंगे तो राजनीति का स्तर कभी नहीं सुधरेगा। फिर, मैंने लोकसभा का चुनाव लड़ा और संयोग से जीत भी गया।
 
आपकी जिन एक्सक्लूसिव रिपोर्ट ने सरकार को हिलाया उनसे व्यक्तिगत तौर पर आपको कभी कोई परेशानी नहीं हुई?
मैं ईमानदारी से बताऊं तो मुझे ब्राइब करने की बहुत कोशिश की गई लेकिन मैं झुका नहीं। मुझे कोई लालच ही नहीं था। आप लालच में फंस जायेंगे तो आप कभी ऐसी रिपोर्ट नहीं कर सकते हैं। हमने एक रिपोर्ट की, वह रिपोर्ट उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री, बीर बहादुर सिंह सरकार को कठघरे में खड़ा कर रही थी। सरकार ने सारी कॉपियां बाजार से खरीद ली हमने अगले दिन और अधिक प्रतियां प्रकाशित कीं। यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक ख़बर आम लोगों तक न पहुंच गई। राजीव गांधी को जो बातें समाचारपत्र में पसंद नहीं आती थी तो वो उस पर अपने हाथ से लिखते थे। वह स्वस्थ पत्रकारिता का एक दौर था। हम लोग, उसी लाइन में अपने अनुसार काम करते थे।
 
लेकिन आज जब आप रंगनाथन मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट को आप छापते हैं तो सरकार आपको नोटिस जारी कर देती है। तो क्या सरकार की सुनने की क्षमता कम हो गई है या इन्वेस्टीगेटिव जर्नलिज्म को दबाने की कोशिश है यह?
देखिए अगर आपकी स्टोरी में दम है तो आपको कोई भी दबा नहीं सकता। 1985 में दूरदर्शन पर एक प्रोग्राम शुरू हुआ –न्यूज़लाइन। एमजे अकबर उस प्रोग्राम के एंकर थे। विनोद दुआ, वीडियो एडिटर थे। राघव बहल वायस ओवर दिया करते थे। आधे घंटे का यह करेंट अफेयर्स का प्रोग्राम था। मैं उसका स्पेशल कॉरेस्पॉन्डेंट था। ‘हिन्दुस्तान’ के टीवी इतिहास का यह पहला प्रोग्राम था। 13 एपिसोड में हमने 17 रिपोर्ट ब्रेक की और उसमें एक रिपोर्ट में हरिदेव जोशी का इस्तीफा हो गया। वे उस समय, राजस्थान के मुख्यमंत्री थे। कुछ ही दिनों में, वह प्रोग्राम बंद करा दिया गया। नेताओं ने राजीव गांधी से कहा कि अगर न्यूज़लाइन ही चलाना है तो विपक्ष की क्या जरूरत है। मैं, यह सब इसलिए कह रहा हूं कि हम जो भी रिपोर्ट करते थे उसमें कोई छेद नहीं छोड़ते थे। हमारे पास, करीब 72 रिपोर्ट ऐसी है जिसे हमने पहले अपने यहां छापी है। रंगनाथ मिश्रा की पूरी रिपोर्ट हमने छापी सरकार कहती रही कि ये रिपोर्ट झूठी है। पांचवे दिन लोकसभा में करीब 40-45 लोकसभा के सदस्य एक साथ ‘चौथी दुनिया’ की प्रति लेकर खड़े हो गए औऱ प्रधानमंत्री को कहना पड़ा कि हम इस पर कार्यवायी करेंगे। राज्यसभा ने हमें अवमानना का नोटिस दिया। हमने इसका जवाब दिया कि आपको अवमानना कि जानकारी ही नहीं है कि अवमानना कहते किसे हैं। और इसके बाद, हमने उस मैटर पर दो और अंक निकालें। कोयला घोटाले पर हमने रिपोर्ट छापी, 2जी पर हमने रिपोर्ट छापी। लोगों ने कहा कि अगर आपने नहीं छापा होता तो नेता लोग इसे हजम ही कर जाते।
 
आपने हेडलाइन वर्ल्ड नाम से एक न्यूज़ एक एजेंसी भी शुरू की थीउसका अनुभव कैसा रहा?
ये 1996 की बात है। हम हमेशा से ही प्रो-पीपल पत्रकारिता के पक्षधर रहे हैं। ऐसी ख़बरें छोटे अखबारों के पास पहुंच नहीं पाती हैं, थोड़े ही समय में, देश के 1700 अख़बार हमारी एजेंसी के सदस्य हो गए। लेकिन दो साल में हमें 12 लाख का घाटा हुआ। उस पैसे को हमने किसी तरह से 8 साल में थोड़ा-थोड़ा करके चुकाया। सारी एक्सक्लूसिव रिपोर्ट थी। लेकिन पैसे किसी ने नहीं दिए। 2 साल के घाटे के बाद, हम ये समझे जब‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ जैसा बड़ा अखबार ‘पीटीआई’ को पैसा नहीं देता है तो ये छोटे अख़बार हमें पैसा क्यों देंगे? इस सबको देखते हुए एजेंसी बंद करनी पड़ी।
 
आप बिना किसी बिजनेस मॉडल के ही चौथी दुनिया भी चला रहे हैं तो एजेंसी जैसा संकट क्या यहां नहीं दिख रहा है?
ऐसा नहीं है कि चौथी दुनिया का बिजनेस मॉडल नहीं है। पहली बात स्पष्ट कर दूं कि साप्ताहिक के पास विज्ञापनों की कमी होती है। चाहे आप अंग्रेजी ‘आउटलुक’ ले लो, ‘इंडिया टुडे’या ‘चौथी दुनिया’। लेकिन साप्ताहिक का एक रोल होता है। रोल यह होता है कि वो ख़बर के भीतर की ख़बर को लोगों के सामने रखते हैं। इसके लिए व्यावसायिक समझौते करने पड़ते हैं। ‘चौथी दुनिया’ जब शुरू हुआ तब लोगों ने मुझे बहुत हतोत्साहित किया कि साप्ताहिक का जमाना तो चला गया और संडे पेपर का तो बिल्कुल ही चला गया। मैगजीन निकालना है तो निकालो पर हमको लगा कि कुछ गलत सलाह आ रही है। हमने ‘चौथी दुनिया’ को ग्लॉसी पेपर पर निकाला। इसके बाद,‘टाइम्स आफ इंडिया’ ने क्रस्ट निकाला जो हू-ब-हू ‘चौथी दुनिया’ की नकल है। फिर हमने देखा कि ‘संडे गार्जियन’ भी आ गया। तो हमको जो लोग हतोत्साहित करते थे, वो खामोश हो गये। ‘जागरण’ ने भी अपना राष्ट्रीय अखबार निकाला। हमने हिन्दी के बाद उर्दू और अब अंग्रेजी एडिशन शुरू कर दिया। पाठकों ने हिन्दी और उर्दू के अलावा अंग्रेजी को भी हाथों-हाथ लिया है।
 
आपको देश का सबसे निर्भीक और विश्वसनीय पत्रकार किन मायनों में कहा जाता है?
मैं खुद को इस तरह के विशेषण के खिलाफ मानता हूं। हमारे संस्थान के मार्केटिंग के लोगों ने मुझे देश के निर्भीक और विश्वसनीय पत्रकार के रूप में प्रचारित करना शुरू किया। मैंने उनसे पूछा की कोई भी कहेगा कि भाई आप क्यों निर्भीक है, क्यों साहसी है, क्यों विश्वसनीय हैं। उन्होने कहा की जब कोई पूछेगा तो जवाब देंगे। और मैं आज तक इंतजार कर रह हूं कि कोई उसको चैलेंज करे कि भाई तुम ही निर्भीक और विश्वनीय क्यों हो? पहला सवाल और दूसरा तुम हो, तो हम क्यो नहीं है? मेरे लिए यह बहुत आश्चर्य की बात है कि किसी ने उसे चैलेंज क्यों नहीं किया। एस.पी सिंह ने मुझसे कहा था मै तुम्हें कलम दे सकता हू, रिवाल्वर नहीं दे सकता। वो मेरे लिए आदर्श वाक्य हो गया। मुझे जो कलम एस.पी सिंह ने पकड़ाई मैं उसके सम्मान की रक्षा आज तक कर रहा हूं। और अगर मैं कर सकता हूं तो वो हर पत्रकार कर सकता है जो सच के साथ है।
 
आपका एक नियमित कॉलम है – जब तोप हो मुकाबिल। इस स्तंभ के पीछे क्या कोई कहानी है?
‘तोप मुकाबिल के पीछे’ एक कहानी है। जब पुराना ‘चौथी दुनिया’ था तब एक बार, हमारे साथियों ने हड़ताल की। उन्होंने कुछ मांगे रख दी। उनको भी पता था कि अख़बार लगातार घाटे में जा रहा है। लेकिन वो लोग कह रहे थे कि अख़बार के घाटे से हमें क्या मतलब। हमें तो हमारा पैसा मिलना चाहिये। जार्ज फर्नांडीस भी हड़ताल में शामिल हो गए। बलबीर पुंज भी उस हड़ताल में नेता के तौर पर शामिल हुए। मैं हड़ताल के खिलाफ था, तो ये लोग मुझे धमकाने लगे। मैंने कहा कि कि विज्ञापन नहीं आ रहा है फिर भी हम अख़बार निकाल रहे हैं तो हमारी पहली कोशिश हो कि अखबार निकलता रहे। वहीं से, इस स्तंभ का विचार आया ‘जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालो’। 
 
क्या फिर से राजनीति की ओर लौटने की इच्छा है? 
राजनीति को स्वस्थ बनाने की इच्छा तो है, लेकिन राजनीति में आने की कोई इच्छा नहीं है। और, मैं मानता हूं कि राजनीति को ठीक करने में पत्रकारिता का अहम योगदान है। इसमें आप किसी पार्टी को ध्यान में रख कर नहीं सोचते हैं, बल्कि जनता को ध्यान में रख कर सोचते हैं। अगर, पत्रकारिता से आम जनता को कोई फायदा हो रहा है तो मानना चाहिये की वो पत्रकारिता सफल है।
 
पत्रकारिता के अलावा आपके और शौक क्या हैं?
देखिये मुझे म्यूजिक बहुत पसंद है, मुझे दक्षिण भारतीय फिल्में बहुत पसंद हैं। उसका कारण है जो उत्तर भारत की फिल्में होती हैं उनका ट्रीटमेंट और  दक्षिण भारतीय फिल्मों के ट्रीटमेंट में जमीन-आसमान का अंतर है। वहां जो ड्रामा होता है, वह ड्रामा उत्तर भारत की फिल्मों मे नहीं होता है। पर इधर मैं देख रहा हूं कि दक्षिण भारत की फिल्मों की पूरी नकल यहां भी दिख रही है। चाहे एक्शन में हो ड्रामा में हो या डायलॉग में हो ।
 
संगीत की दिशा में मुझे गजलें बेहद पसंद है।  पॉप संगीत भी सुनता हूं क्योंकि इससे मुझे सोचने में बहुत मदद मिलती है। मेरी पत्रकारिता में फिल्म और म्यूजिक का बड़ा योगदान है।
 
आप एक किताब लिख रहे थे चन्द्रशेखर, वीपीसोनिया गांधी और मैं वह किताब कहां तक पहुंची?
हां, काफी पूरी हो चुकी है। शायद तीन महीने में पूरी हो जाये। लेकिन वक्त नहीं मिल पा रहा है। तीन अखबार और इंटरनेट टीवी के बाद, वक्त कम मिल पा रहा है। लेकिन मेरा दावा है कि जब यह किताब आएगी तो कई चौंकाने वाले राजनीतिक खुलासे होंगे। वीपी सिंह तो कहते थे कि तुम तो हम लोगों के बारे में सब कुछ जानते हो, इसलिए जरूर लिखो। वीपी सिंह और चन्द्रशेखर जी तो चले गये लेकिन सोनिया जी तो हैं, अभी दो और राजनीतिज्ञ हैं, जो इसमें शामिल थे और मैं चाहता हूं कि किताब जल्द से जल्द लोगों के सामने आनी चाहिए।

Sabhar- Samachar4media.com
जो सच के साथ है वही निर्भीक है जो सच के साथ है वही निर्भीक है Reviewed by Sushil Gangwar on September 23, 2012 Rating: 5

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