समाचार चैनलों का धंधा और सरकारी नीति

टैम यानी टेलीविजन ऑडिएन्स मेजरमेंट- टेलीविजन दर्शक मापन- को लेकर सरकार की बैचेनी अचानक बढ़ गई है। प्रसार भारती और सूचना प्रसारण मंत्रालय यह बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं कि जब दूरदर्शन देश के बानबे फीसद हिस्से से जुड़ा हुआ है तो उसकी टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग पॉइंट) टैम की रेटिंग में क्यों नहीं झलकती। पहली नजर में सरकार के तर्क सही लग सकते हैं। टैम के मीटर शहर-शहर और गांव-शहर में फर्क कैसे कर सकते हैं, जबकि इन्हीं से समाचार चैनलों की कमाई जुड़ी है। विज्ञापन देने वाली कंपनियां टैम मीटर से निकलने वाली टीआरपी को ही मुख्य आधार बनाती हैं।


जाहिर है, ये सवाल किसी के भी मन में उठ सकते हैं कि टैम मीटर की तरह कहीं सरकार की नीतियां भी विकास का खाका तो नहींं खींच रहीं? विकास की नीतियों की तर्ज पर ही समाचार चैनल चलाने वाले भी अपना विकास तो नहींं देख रहे? अगर वाकई सरकार को लगने लगा है कि टैम मीटर ने समाचार चैनलों में टीआरपी का ऐसा नशा घोल दिया है, जहां समाचार चैनलों में गांव से लेकर बीमार राज्य और हाशिये पर पड़े बहुसंख्यक तबके के सवालों को कोई जगह ही नहींं मिल पा रही है। तो समझना होगा कि क्या सरकार की नीतियां भी टैम मीटर से अलग बुनियादी ढांचे और विकास का कोई पैमाना समूचे देश के लिए खड़ा कर रही हैं।

सरकार इस बात को लेकर खुश है कि भारत की पहचान दुनिया के सबसे बड़े बाजार के तौर पर बढ़ रही है। क्योंकि आज पचीस करोड़ भारतीय उपभोक्ता में तब्दील हो चुके हैं। जबकि देश की आबादी सवा सौ करोड़ है और बाकी सौ करोड़ के लिए सरकार के पास कोई नीति नहींं, बल्कि राजनीतिक पैकेज हैं। खाद्य सुरक्षा विधेयक से लेकर पक्का घर, पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, बालिका-जननी आदि से जुड़ी महात्मा गांधी, नेहरू, इंदिरा, राजीव गांधी के नाम पर दो दर्जन से ज्यादा योजनाएं हैं। और अब गरीबी रेखा से नीचे वालों को मोबाइल देने का भी एलान होने वाला है। यानी सरकार के विकास के नजरिए में अगर उपभोक्ता महत्त्वपूर्ण है तो फिर टैम मीटर भी उन्हीं शहरों को घेरे हुए है। सवाल समाचार चैनलों और टैम मीटर का है, तो फिर यह जानना जरूरी है कि क्या वाकई सरकार का मकसद समाचार चैनलों के जरिए देश की असल खबरों को दिखाना है या फिर चैनल धंधे वालों के हाथ में सौंप कर, कमाई के खेल को धंधे से अलग कर सरकार अपना पल्ला झाड़ना चाहती है। कोई पत्रकार चाह कर भी समाचार चैनल शुरू नहींं कर सकता। चैनल के लाइसेंस का फार्म भरने के लिए उसके पास संपत्ति के तौर पर बीस करोड़ रुपए होने चाहिए, जो असंभव है। पहले लाइसेंस के लिए महज तीन करोड़ का टर्नओवर दिखाने से काम चल जाता था। जिनके पास इतने पैसे होंगे वे समाचार चैनल चलाने के लिए क्या सोच कर आएंगे। बीते सात बरस में समाचार चैनलों का लाइसेंस पाने वाले अस्सी फीसद लोग बिल्डर, चिट-फंड चलाने वाले, जमीन-जायदाद के खेल में माहिर और अपराध के जरिए राजनीति में कदम रख चुके नेता हैं।

हरियाणा के पूर्व गृह राज्यमंत्री गोपाल कांडा के पास पांच चैनलों के लाइसेंस हैं। यह वही कांडा हैं जो एअर होस्टेज गीतिका शर्मा की खुदकुशी के पीछे मुख्य आरोपी हैं। और अब उनके धंधों की फेहरिस्त सामने आ रही है कि कैसे सड़क से राज्य के राज्य गृहमंत्री तक की स्थिति में आ पहुंचे। गोपाल कांडा का समाचार चैनल हरियाणा और उत्तर प्रदेश में चलता है। धर्म का भी एक चैनल चल रहा है। दो लाइसेंस इनके पास पड़े हुए हैं। हरियाणा की सियासी तिकड़म में वे मुख्यमंत्री हुड््डा से कहते रहे हैं कि चुनाव से पहले राष्ट्रीय समाचार चैनल भी शुरू कर लेंगे। फिलवक्त करीब सत्ताईस समाचार चैनलों के लाइसेंस ऐसे ही नेताओं के पास हैं, जो झारखंड से लेकर मुंबई और आंध्र प्रदेश से लेकर हिमाचल तक में चल रहे हैं। बत्तीस समाचार चैनलों को सियासी धंधे में बदलने की कोशिश हो रही है। अठारह समाचार चैनल चिट-फंड के जरिए गांव-गांव में लूट मचा रही कंपनियों के जरिए दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओड़िशा में चल रहे हैं। समाचार चैनलों के सोलह लाइसेंस लेकर चिट-फंड वाले इंतजार कर रहे हैं कि अब धंधे के लिए समाचार चैनल चलाने का वक्त आ गया है। इसी तरह देश भर में उन्नीस समाचार चैनलों के लाइसेंस जमीन-जायदाद के धंधे से जुड़े लोगों या बिल्डरों के पास हैं। कुछ शुरू कर रहे हैं, कुछ लाइसेंस बेच कर तीन करोड़ रुपए तक कमाना चाहते हैं। दो दर्जन से ज्यादा समाचार चैनलों के लाइसेंस बाजार में बिकने को तैयार हैं। इनकी कीमत ढाई से साढ़े तीन करोड़ रुपए तक है। यानी लाइसेंस ले लिया और शुरू नहींं कर पा रहे हैं या फिर लाइसेंस लिया ही इसलिए कि दस से पंद्रह लाख खर्च कर तीन-चार करोड़ रुपए कमा सकें।

तो सवाल है कि क्या सरकार वाकई टैम के जरिए हो रहे धंधे को रोकना चाहती है या फिर जिस धंधे को लाइसेंस देने के नाम पर उसने शुरू किया और जो लाइसेंस लेकर समाचार चैनल के जरिए सौदेबाजी करना चाहते या कर रहे हैं उस तरफ लोगों की नजर न जाए इसलिए नैतिकता का पाठ पढ़ाना चाहती है। क्योंकि टैम से जुड़े टीआरपी का खेल उसी केबल प्रणाली पर टिका है, जिस पर ज्यादातर राज्यों में सत्ताधारी नेताओं का कब्जा है। और किसी समाचार चैनल को माफिया की तरह चल रहे केबल नेटवर्क से जुड़ने के लिए जिस तरह काला धन देना पड़ता है उसका कोई लेखाजोखा नहीं होता। क्योंकि टैम मीटर असल में केबल के जरिए देखे जा रहे समाचार चैनलों की ही रिपोर्ट देता है।

केबल प्रणाली पर जिसका कब्जा होगा अगर वही किसी समाचार चैनल को अपने क्षेत्र या राज्य में न दिखाए तो फिर मीटर की रीडिंग में वह समाचार चैनल आएगा कैसे। जाहिर है, मुफ्त में कोई केबल किसी समाचार चैनल को दिखाएगा नहींं। खासकर तब जब समाचार चैनलों की भरमार हो और सभी तमाशे को ही खबर मान कर परोस रहे हों। यानी कंटेंट की लड़ाई न हो। तो केबल से जुड़ने के लिए समाचार चैनलों को सालाना कोई रकम देनी ही होगी। और आज अगर कोई राष्ट्रीय समाचार चैनल शुरू होता है तो उसे देश भर से जुड़ने के लिए तीस से पैंतीस करोड़ रुपए सिर्फ केबल नेटवर्क से जुड़ने में लगेंगे। इसकी कोई रसीद कोई केबल वाला नहींं देता। यानी तीस से पैंतीस करोड़ रुपए कहां से आए और समाचार चैनल वाले ने इन्हें किसे दिया इसका कोई लेखाजोखा नहींं होता।

टैम मीटर वाले प्रमुख सोलह क्षेत्रों के केबल पर और किसी की नहींं, राजनेताओं की पकड़ है। यानी जिन केबल पर सत्ताधारियों का कब्जा है, उनके खिलाफ कुछ भी हो जाए, कोई समाचार चैनल खबर दिखा ही नहींं सकता। आजमाना हो तो पंजाब में प्रकाश सिंह बादल और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह के खिलाफ कोई समाचार चैनल हिम्मत करके दिखाए। वह चैनल केबल पर ब्लैकआउट हो जाता है। अगर इन सबके बावजूद सरकार को लगता है कि टैम का खेल रोकने से खबरें दिखाई जाने लगेंगी तो हरियाणा में हुड््डा और बिहार में नीतीश कुमार के मीडिया प्रेम को समझना जरूरी है। जो सरकार के प्रचार के बजट से ही खबरों के तेवर और कंटेंट को जोड़ने की हैसियत रखते हैं और अपने खिलाफ कुछ भी प्रसारित नहीं होने देते। यह स्थिति मध्यप्रदेश के शिवराज सिंह चौहान की भी है। राजस्थान के गहलोत भी इस ककहरे को पढ़ने लगे हैं। यानी जब समाचार चैनल के बीज में ही धंधा है तो फिर सवाल संपादक और मीडिया हाउस की नैतिकता को लेकर भी उठेंगे। और इनकी स्थिति को समझने के लिए सरकार के आर्थिक सुधार की हवा के रुख को समझना जरूरी है, जो विकास पर सहमति बनाने के लिए संपादक और मीडिया हाउस को भी अपने साथ खड़ा करने से नहीं हिचक रही। क्योंकि संपादक की महत्ता या उसका कद संयोग से उसी धंधे से जा जुड़ा है, जो कहीं टीआरपी तो कहीं सत्ता के साथ सहमति पर आ टिका है। इसलिए सरकार के निशाने पर टैम के जरिए इस सच को समझना होगा कि आखिर देश में कोई ऐसा राष्ट्रीय समाचार चैनल क्यों नहीं है, जो देश के मुद्दों को लेकर जनमत बना सके और पत्रकार उसमें काम करने के लिए लालायित हों। उसमें काम करने वाले पत्रकारों की देश में साख हो। जिसकी खबरों को देख कर लगे कि मीडिया वाकई लोकतंत्र के चौथे खंभे के तौर पर मौजूद है और सरकार की निगरानी कर रहा है। यह सिर्फ टैम के अस्सी हजार मीटर लगाने से तो होगा नहींं। समाचार चैनलों के धंधे को खत्म करना होगा। क्या सरकार इसके लिए तैयार है!
(मूलतया जनसत्ता में प्रकाशित. जनसत्ता से साभार)


पुण्य प्रसून बाजपेयीपुण्य प्रसून बाजपेयी, ज़ी न्यूज़ (भारत का पहला समाचार और समसामयिक चैनल) में प्राइम टाइम एंकर और सम्पादक हैं। पुण्य प्रसून बाजपेयी के पास प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 20 साल से ज़्यादा का अनुभव है। प्रसून देश के इकलौते ऐसे पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी पत्रकारिता में बेहतरीन कार्य के लिए वर्ष 2005 का ‘इंडियन एक्सप्रेस गोयनका अवार्ड फ़ॉर एक्सिलेंस’ और प्रिंट मीडिया में बेहतरीन रिपोर्ट के लिए 2007 का रामनाथ गोयनका अवॉर्ड मिला।

समाचार चैनलों का धंधा और सरकारी नीति समाचार चैनलों का धंधा और सरकारी नीति Reviewed by Sushil Gangwar on August 23, 2012 Rating: 5

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