जिन्हें नाज़ था यशवंत पे वो कहाँ हैं?

ब कोई डेढ़ महीने से यशवंत के अंदर और उनके कंटेंट एडिटर अनिल सिंह के भी कल गिरफ्तार हो जाने के बाद कहाँ हैं वे जो मानते थे कि यशवंत एक दिलेर, क्रांतिकारी और महान पत्रकार हैं. ये कोई और नहीं खुद यशवंत की 'भड़ास' पूछ रही है. 'भड़ास' जो ये पूछते पूछते कल से ठप्प पड़ी है. कहाँ है किसी भी चैनल, अखबार या ब्लॉग पर उनकी वो खबर जिसे लिखने के लिए वे पकड़े और जेल भेजे गए हैं? इस से भी बड़ा सवाल ये है कि ये जानने की कोशिश तक करने वाले लोग कहाँ हैं कि यशवंत के साथ घुन की तरह पिस रहे बेचारे अनिल सिंह हैं तो कहाँ हैं?

हरियाणा न्यूज़ के मालिक और गीतिका शर्मा कांड के आरोपी गोपाल कांडा के गायब हो जाने की कल दोपहर छपी खबर के बाद 'भड़ास' पर कोई नया कंटेंट या कमेंट भी उन्हीं की तरह गायब है. यशवंत की रिहाई के लिए जेहाद छेड़ने वाले लोग देश या दिल्ली की सड़कों या अपने अपने चैनलों,अख़बारों को तो छोड़िए फेसबुक तक से गायब हैं. लेखक अब उन के लिए लिखते नहीं, कवि मरसिए नहीं गाते और वो चुटकुले अब किसी को गुदगुदाते नहीं जो ब्लैकमेल नहीं करने के एवज में भी नहीं छपी ख़बरों के बीच कभी कुछ पठनीयता प्रदान कर जाया करते थे.

उन के कभी करीबी साथी रहे एक पत्रकार बता रहे थे कि कैसे यशवंत उन्हें अपने मोबाइल में रिकार्डेड वे गालियाँ सुनाने आया करते थे जो उन्होंने रात दारु पी के लोगों को दी होती थीं. बहरहाल पुलिस को उनके पास से ऐसी ब्लैकमेल करने के लिए किए गए फ़ोनों और गालियों का मिनट का एक बड़ा ज़खीरा मिला है. ये सब बाकायदा उनके लैपटाप की हार्ड डिस्क में दर्ज है. पुलिस वो सब खंगाल रही है. वे नाम भी जल्दी ही सामने आ जाएंगे जिन्हें फोन कर कर के वे पैसे मांगते और नहीं मिलने पर गरियाया करते थे. उनकी सूची पुलिस बना रही है. अदालत में पेश भी करेगी. होने को आग्रह तो पुलिस से ये भी है कि कानूनी तरीके से उनकी वेबसाईट ही बंद कराए जो ले दे के ब्लैकमेलिंग का धंधा बन के रह गई है.

लेकिन पुलिस को ये पाप या पुण्य करने की ज़रूरत शायद नहीं पड़ेगी. वो सब वैसे ही हो रहा है. अपने आप. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में गुरु साहब ने फ़रमाया है- करनी आप्पो आप्प्नीं, के नेड़े के दूर (अपना किया सामने आ ही जाता है कुछ पहले या बाद). यशवंत का किया भी सामने आ गया है. गिरफ्तारी के दिन ही कोई रोने पीटने, छुडाने या छुड़ा सकने वाला कोई नहीं था. जोर शोर से प्रचार के बाद भी दिल्ली में जो 'भारी' जमावड़ा हुआ पत्रकारों का तो उस में 'देश भर से आए' दर्जन भर पत्रकार नहीं थे. यशवंत की गिरफ्तारी के बाद भी कोई सवा महीने तक साईट चलती रही उनकी. कहीं किसी से एक धेले की आर्थिक मदद की कोई खबर नहीं छपी उस पर. कोई एक माई का लाल पैदा नहीं हुआ जो रंगदारी के आरोप में कैद यशवंत का हमदर्द दिखने का साहस दिखाए अपने प्रतिष्ठान या परिवार को. साईट फिर भी जैसे तैसे चल रही थी. अब अनिल सिंह के भी नाप जाने के बाद कोई एक शुभचिंतक नहीं है पूरे हिंदुस्तान में कि जो उनकी वेबसाईट को अपलोड करता रह सके. मित्र लोग परिवार को मंहगा शहर छोड़ कर गाँव चले जाने की सलाह देने लगे हैं. केस लंबा होता जा रहा है. सवा महीने की जेल यात्रा के बाद जब कापड़ी वाले केस से ज़मानत मिली तो जागरण वाला केस तैयार था. इस से कुछ राहत मिलने तक एक और केस अपनी बारी की प्रतीक्षा में है. इस बीच, इसी महीने सरवर के पैसे जमा न हुए तो जेल के अनुभव लिख सकने के लिए साईट रहेगी ही नहीं. रही तो और भी नुक्सान हो जाएगा. उस पे पुलिस, अदालत, वकीलों, मुवक्किलों और गवाहों के खिलाफ अभियान चलेगा. इस से मिली मिलाई ज़मानत भी खतरे में पड़ जाएगी. भड़ास का इस्तेमाल अदालती प्रक्रिया के खिलाफ विषवमन करने के लिए हुआ तो ये ज़मानत रद्द करवाने के लिए एक पुख्ता आधार होगा. ये सब तब है कि जब खुद यशवंत के अनुसार उन के खिलाफ सौ से अधिक नोटिस हैं और स्टार न्यूज़ और हिंदुस्तान टाइम्स वाले मामले भी.

राधा बुरी तरह गुंडों में फंस गई है. और बात वो भी नहीं है जो अब तक समझाई जा रही थी. ये सब वेब मीडिया पे कोई हमला नहीं है. वेब मीडिया किसी का प्रतिद्वंद्वी ही होता और हमला भी पूरी पूरी वेब मीडिया पे होता तो वो जर्नलिस्टकम्युनिटी पे भी होना चाहिए था, मीडिया दरबार पे, प्रवक्ता और हस्तक्षेप पे भी. फेसबुक पे तो और भी पहले. वहां जो जैसा छपता और दिखता है कहीं भी नहीं होता. तो हमला यशवंत पे ही क्यों है?...इस लिए कि यशवंत की तरह न कोई किसी से पैसे मांगता है. न, न मिलने पर दारु पी के किसी को गरियाता ही है. न एस.एम.एस. करता है आधी रात किसी की बीवी को कोई. न गालियाँ दे के सुनवाता ही फिरता है कोई. सच बात तो ये है कि यशवंत की वजह से न्यू मीडिया बदनाम हुआ है.

सवाल है, है कोई एक ऐसी खबर कि जिस के भड़ास पे छपने से भ्रष्टाचार के किसी मामले में कोई पकड़ा गया हो. नौकरी लगी हो किसी एक पत्रकार की. वेज बोर्ड लागू हो गया किसी एक जगह. लोकपाल बिल पास हो गया हो या गरीबी मिट गई हो हिंदुस्तान से? युवा अब बेरोजगार न रहने वाले हों या पेंशन शुरू हो गई हो पत्रकारों की? क्या हुआ है, क्या किया है यशवंत ने ऐसा कि पत्रकार या देशवासी उस पे फ़ख्र करें?...सिर्फ धंधा किया है यशवंत ने और वो भी उन्हें करना नहीं आया है. गाली, दारु और नफ़रत दे के तो उन्हें यही मिल सकता था, जो मिला है. यही उनके किये का प्रतिफल, यही गुनाहों का सिला है. दुःख मगर इस बात का है कि उन के किए की सजा पा अनिल सिंह और उनका परिवार भी रहा है.
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जिन्हें नाज़ था यशवंत पे वो कहाँ हैं? जिन्हें नाज़ था यशवंत पे वो कहाँ हैं? Reviewed by Sushil Gangwar on August 11, 2012 Rating: 5

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