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अब अनिल भी जेल में और भड़ास जाम

इतिहास की किताबों में ऐसे बहुत से चरित्रों का वर्णन है जो जैसे दिखते थे वैसे होते नहीं थे. असल जीवन में भी ऐसा होता आया है. आज भी है. जिसे अपने जीवन का सब से करीबी मित्र समझो और हर अच्छे, बुरे में साथ खड़े होने और बचाने वाला वही देखो तो ऐन टाइम पे धोखा दे देता है. जिन पे दूसरों से बचाने की जिम्मेवारी हो वो सबसे सुरक्षित जगह, खुद अपने घर में अपने ही सुरक्षा गार्डों के हाथों मारे जाते हैं. और जिन से उम्मीद हो व्यवस्था परिवर्तन की, वे खुद उस के बागी का मुखौटा पहन कर उस से भी ज़्यादा शोषण करने लगते है.


बहुत सही कहा वसीम बरेलवी ने...'जो देखने में बहुत ही करीब लगता है/उसी के बारे में सोचो तो फासला निकले'.

आम तौर पर ज़ुल्म करने वालों ने वो करवाने के लिए अपनी स्थिति, अपनी ताकत और अपने आदमियों का सहारा लिया है. कई बार तो यों भी कि खुद पात्रों को पता नहीं लगता कि जो वे बोल, कर रहे हैं तो वो वे वैसा कर क्यों रहे हैं. कई बार ज़ुल्म, ज़ुल्म जैसा होता दिखता भी नहीं है. कई बार ज़ुल्मी माफिया का एजेंडा कैरी कर रहे लोग वो सब किसी मजबूरी तो कभी अनजाने में भी कर रहे होते हैं. जैसे, यशवंत के साथ अनिल सिंह. अनिल न भड़ास के मालिक हैं. न उनका उस में कोई स्टेक. नौकरी में भी उसकी शायद वे इस मजबूरी में कर रहे हों कि उस से बेहतर कुछ और मिला न हो. लेकिन सूखे जैसे गीला और गेहूं के साथ जैसे घुन पिस जाता है, अनिल के साथ भी वो हो के रहा है. यशवंत ने अनिल को 'मरवा' दिया.

अनिल सिंह अब दो हफ्ते के लिए जेल के अंदर हैं. उन पर एक ऐसी घटना की खबर छाप देने में शामिल होने का आरोप है जो घटी ही नहीं थी. उन पर भी खबर के बदले में पैसे मांगने में शामिल होने का आरोप है. उन्हें इन सब तरह के कामों में यशवंत का साथ देने के जुर्म में जेल भेजा गया है. यशवंत पहले से जेल में हैं. उन की भड़ास पे आज लगातार दूसरे दिन कोई अपडेट नहीं है. अनिल के रहते यशवंत की गिरफ्तारी के विरोध में फिर कुछ प्रतिक्रियाएं छप गई थीं. अनिल की तो गिरफ्तारी तक की कोई खबर कहीं नहीं छपी है. उधर, अनिल के भी जेल जाने के बाद बाहर ऐसा कोई शुभचिंतक नहीं बचा है यशवंत का कि जिस से कह के यशवंत अपनी साईट को अपडेट ही कराते रह सकते. नतीजा ये है कि साईट सरवर पे होते हुए भी बंद पड़ी है. न कुछ छप रहा है, न कोई मेल ही खोल के देख रहा है कि कहाँ से आया क्या है. कहीं से भी धन, अनुदान और वसूली अब नहीं आ रही. कसाब और हवारा तक को फांसी से बचा के रख सकने वाले इस युग में एक वकील नहीं मिला उन को कि जो उन्हें ज़मानत तक दिला सके.

यशवंत के एक करीबी जानकार के अनुसार 'भड़ास' के सरवर की भुगतान राशि की मियाद समाप्त हो चुकी है. ऐसे में सरवर के साथ ही पहले से ठप्प पड़ा भड़ास कभी भी दिखना तक बंद हो सकता है. पहले कापड़ी और फिर जागरण वाले केस में बंद यशवंत की जमानत याचिका पर ही अगली सुनवाई अभी 17 अगस्त को है. अनिल की ज़मानत का फैसला उन के भी कोई एक हफ्ते बाद होगा. इस बीच उन के खिलाफ एक तीसरा मामला भी तैयार है. अभी की हालत ये है कि अगर कापड़ी और जागरण वाले मालों में सजा उन को हो और वे दोनों सजायें उन्हें एक साथ भी भुगतनी हों तो उन में ही दस साल लग जायेंगे. आरोप, मुक़दमे और नोटिस उन पे और भी हैं. अभी उन का पिटारा खुलने उन के लैपटाप की उस हार्ड डिस्क से भी वाला है जिस में कहते हैं कि ब्लैकमेलिंग और गालियों की पांच सौ घंटे की रिकार्डिंग खुद यशवंत ने संभाल के रख रखी थी. इस हार्ड डिस्क के खुलासे के बाद तो जैसे उन के खिलाफ मुकदमों की झड़ी ही लग जायेगी.

sabhar- journalistcommunity.com