बेटी-मार या बेटी के यार क्या हो तुम गोपाल कांडा?

जगमोहन फुटेला


एक होती है बंदे की हैसियत. एक ताकत. एक घमंड. और एक चीज़ होती है फुकरी.


हैसियत वो होती है जो मेहरबान हो के ऊपर वाला देता है. उस में आपका परिश्रम, पुरुषार्थ, पराक्रम सब शामिल होता है. ताकत वो होती है जिस का इस्तेमाल आप उस हस्ती, उपलब्धि को बढ़ाने, फैलाने और आगे बढ़ते चले जाने के लिए करते हो. इस ताकत की परिभाषा आदमी की निजी सोच से प्रभावित होती है. मिसाल के तौर पे अगर वो कोई धार्मिक संत या डेरे समाधि वाला है तो उस के भक्तों और डेरों की संख्या वो बढ़ाएगा. कोई गुंडा, तस्कर, माफिया है तो फिर अपने प्रतिद्वंद्वी गैंग तोड़ेगा. उन्हें मार मिटाने में लगा रहेगा या अपने भीतर जज़्ब कर लेगा उन्हें. ताकत अगर आपकी कोई हास्पिटल चैन है तो फिर इलाज आप मरीजों से पहले अपने मुकाबले में खड़े दूसरे अस्पतालों का करोगे और फिर मरीजों के तो वो इलाज भी कि जो बीमारी भी नहीं होगी उन्हें. पंजाब के मोहाली में एक बड़ी अस्पताल चैन के साठ डाक्टरों को बी.एम.डब्ल्यू. कारें गिफ्ट कीं गईं. वो वो आपरेशन कर अस्पताल का धंधा बढ़ाने के लिए कि जिन की ज़रूरत ही नहीं थी. खबर छपी वो भी हिंदुस्तान टाइम्स जैसे अखबार में. कारवाई तो क्या, कोई जांच तक नहीं हुई. ये ताकत है.



ताकत का सही इस्तेमाल ही विस्तार का असली आधार और साम्राज्यवाद के लिए उस का खूब इस्तेमाल हुआ हथियार है. कांडा के साथ भी यही हुआ. हवाई चप्पल की दुकान किसी भी दुकान की तरह एक दुकानदारी थी उस की. लेकिन किसी भी डरपोक बनिए से ज़्यादा विनम्र था वो. जिस बाज़ार में बड़ा तराजू तान के उसके पुरखे बोरियां तोलते और और फिर झाड़ू के नाम पर नीचे बचा या बचाया खुचाया अनाज समेटते आये थे वो हद दर्जे की चापलूसी और चमचागिरी के बिना संभव भी नहीं था. उस तरह की सामंतवादी व्यवस्था में थोड़ी बहुत इज्ज़त के साथ जी सकने के लिए अपनी तरह के नौकरों, पल्लेदारों और गुमाश्तों का अपना एक सर्कल और दिन त्यौहार कहीं कोई छबील में गिलास उठाने से लेकर किसी धर्मस्थान के बाहर जूतों की सेवा करने तक के काम इस आयवर्ग के लोगों का शौक नहीं, मजबूरी भी रही है. पंजाबी में कहें तो एक तरह के सिरसड़े (कुछ भी कर गुजरने वाले) भी रहे हैं आम तौर से इस तरह के लोग. आप शोध कर के देख लो. बडे से बड़े शहरों में जागरण, जगराते इन रेहडी, सब्जी, खोखे और फड़ी वालों की बदौलत होते हैं और शहर, मोहल्ले के सांझे प्रोग्रामों में बल्ली गाड़ने से लेकर समापन के दिन लंगर के झूठे पत्तल उठाने तक का सिदक भी भगवान ने इन्हीं को दिया है. कांडा भी वही कर रहा था.



रहम उस पर ज़रूर था ईश्वर का. वरना हरियाणा. उस में सिरसा और उस में भी बनिया. ऊपर से दसवीं फेल, अंगूठा टेक. आसान नहीं था राजनीति में तो क्या, समाज में कोई पहचान भी बना पाना. कांडा दसवीं भी पास नहीं कर पाया था कि चौटाला की तूती सिरसा की दसों दिशाओं में गूंजने लगी थी. कांडा के वहां जीत के मंत्री रह चुकने के बाद आज भी कोई सोचता नहीं सिरसा में कि चौटाला जिसे न चाहें वो सफ़ेद कुरता पाजामा पहन के चल भी सकता है कहीं बाज़ार में. किसी भी सिरसड़े की तरह कुछ भी कर सकने का माद्दा था कांडा में. ख़्वाब देखा. चमचागिरी भी की तो सब की और गज़ब की की. जिस शहर में हर तीसरा आदमी प्रापर्टी डीलर हो उस में एक वो भी हो गया था. और ऐसे में सिरसा रह के गए एक बड़े अफसर के साथ ऐसी गोटी फिट हुई उस की कि गुडगाँव जा के कांडा उस के धंधे का पार्टनर और उस से बड़ी बात कि भेदी हो गया. बस फिर कांडा ने पीछे मुड के नहीं देखा.



उधर तारा बाबा की कुटिया पे अक्सर लोगों के पैसे से लगने वाले लंगर से वोट पक्के हो ही रहे थे. 2009 में कुछ ऐसा चक्कर चला कि चौटाला जैसा चतुर नेता भी अपनों के भीतरघात का शिकार हो गया. नाम, न धाम जिस सुशील इंदौरा को कभी एमपी बनाया था उस ने बगावत कर दी. पार्टी से निकालना पड़ा. कांग्रेस के महारथी लछमन दास अरोरा बुढ़ाने और अक्सर भजन लाल के साथी रहे होने के कारण तब तक मुख्यमत्री हो गए हुड्डा को चिढ़ाने लगे थे. सब से टिकट मांगते मांगते कांडा आखिर निर्दलीय खड़े हो गए और जीत भी गए. कुदरत ने हैसियत अभी और भी बख्शनी थी तो किसी को बहुमत नहीं दिया. ऐसी ज़रूरत पड़ी कांग्रेस को उन की कि उद्योग के साथ गृह जैसा मंत्रालय भी माँगा तो देना पड़ा. अब इस तरह आई इस ताकत का इस्तेमाल भी किया ही कांडा ने. दुनिया जहान की विवादित संपत्तियों में टांग अडाने से लेकर खुद सरकार की ज़मीनों पे कब्ज़े करने शुरू किये. अपनी ताकत का प्रदर्शन करने के लिए इनकम टैक्स वाले भी पीटने पड़े तो पीट दिए एक बार. कहते हैं सिरसा में कांग्रेस के सांसद अशोक तंवर को भी पीट दिया उस ने. फिर भी कांग्रेस जैसी पार्टी उस के तलुवे चाटती थी. कांडा हरियाणा में टैरर का दूसरा नाम हो गए थे.



लेकिन कांडा में हैसियत और ताकत के साथ एक और चीज़ उभर आई थी....फुकरी. वो न होती तो तंवर को पीटने की ज़रूरत नहीं थी. खालिस सियासी नज़रिए से भी ये नहीं करना चाहिए था. अरे भाई वो कांग्रेस का सांसद. वो भी राहुल गाँधी का आदमी. तू कांग्रेस की सरकार में आज भी निर्दलीय मंत्री कल भी तकरीबन तय कि बाहर का बंदा. मगर पीट दिया. किसी ने कुछ कहा तो मंत्री वाली गाड़ी और संत्री सब छोड़ के चलता बना. अगर तभी कांग्रेस किनारे कर घर और चार इन्क्वारियाँ बिठा देती तो भूत बना देती. वो नहीं हुआ. हौसले बढ़ गए. ये विशुद्ध फुकरी ही थी कि मंत्री बन जाने पर भी कांडा के खिलाफ सिर्फ चेक बाउंस के तकरीबन सौ के करीब केस चल रहे थे हरियाणा के कई शहरों में. कहीं किसी एक में भी सजा होती तो जुलूस निकल ही जाना था. मंत्री पद से इस्तीफ़ा तब भी देना ही पड़ना था. और इनमे से नब्बे फीसदी मामलों में रकम भी कुल मिला कर शायद नौ लाख की नहीं होगी. मगर फिर भी कांडा ने न रकम अदा की, न कोर्ट की ही परवाह की. देखा आपने कि कांडा का भाई गोबिंद तो अशोक विहार थाने में हीरोगर्दी करते ऐसे ही एक मामले में गिरफ्तार किया गया. वो एक केस ही न होता तो आज दोनों भाई एक साथ जेल में न होते.


गीतिका के मामले में भी सिर्फ अनपढ़ता और आशिकी ही कारण नहीं थे. फुकरी भी थी. जैसे ये कि तू न आई तो मैं तुझे कहीं की नहीं रहने दूंगा. अरे भाई ज़माना और कानूनी हालत भी ये है कि किसी की बीवी भी नहीं चाहेगी तो रात को सोना बच्चों के कमरे में पड़ेगा. तू उस गीतिका को ज़बरन बुलाने और पता नहीं उस से क्या क्या कराने पे तुला था जो तेरे प्यार में तो नहीं ही थी, कंट्रोल में भी नहीं थी. न नौकरी में. न झांसे में. न रोक ही सकता था तू उसे कुछ भी कर सकने से. ये कांडा की ताकत नहीं, फुकरी थी. ग़लतफ़हमी कि वो जो चाहे कर सकता है...और आज नतीजा क्या है? आत्महत्या के लिए उकसाने का केस है ही. किसी की मेल आई.डी. से उसे मेल कर डराने का एक अलग अपराध भी दर्ज हो ही गया है. भले गीतिका के चरित्रहनन के लिए, सिरसा में उस के एक गर्भपात की बात आई है. वो भी अगर हुआ है तो तुम्हें उस मामले में फंसाने के लिए कोई दो गवाह भी काफी होंगे. सजा भी उस में आजीवन कारावास तक की हो सकती है. न भी हो दस दस साल की दो सजायें आगे पीछे भी हों तो गए जिंदगी के बाकी बचे बीस साल? ये हुआ तो ये सब फुकरी की कीमत होगी.



ये जो अकड़ थी कि दो दो हज़ार के चेक बाउंस वाले केस भी लडूंगा मगर पैसे नहीं दूंगा, ये मानसिकता ले डूबी. गीतिका को बाँध के रखने की अकड़ ले डूब ही रही है. अब तक का तुम्हारा व्यवहार साबित तो तुम्हारी आशिकी ही करता है. उसी तरह की पज़ेसिवनेस!.... इस पर अब अपनी बीवी से उसे अपनी बेटी कहलवा के बची खुची शर्म के रिश्तों को भी तार तार कर रहे हो. वो अगर बेटी थी तो बेटी-मार या बेटी के यार क्या हो तुम गोपाल कांडा?

बेटी-मार या बेटी के यार क्या हो तुम गोपाल कांडा? बेटी-मार या बेटी के यार क्या हो तुम गोपाल कांडा? Reviewed by Sushil Gangwar on August 23, 2012 Rating: 5

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