और अब रामदेव की दसवीं (दानिया)

जगमोहन फुटेला



'मेरा नाम जोकर' याद है आपको? एक रशियन लड़की थी उस में. बहुत प्यार करती थी वो राजू से. लेकिन छोड़ के चली जाती है उसे. जाते जाते दसवी दानिया यानि अलविदा, खुदा हाफ़िज़, फिर मिलेंगे कह के. ये भी याद होगा आप को कि क्यों? ...जिन्हें न याद हो तो दिला दें. इस लिए छोड़ के चली जाती है वो कि राजू जोकर था. रामदेव भी वही निकले. अब पार्टी, न पार्टी के चक्कर में उलझे अन्ना आंदोलन की इस बार की असफलता को अभी दस ही दिन बीते हैं कि अब अपने आंदोलन की दसवीं रामदेव ने भी कर ली है. ठीक वही गलती कर के.


याददाश्त इतनी कमज़ोर क्यों है रामदेव की? इत्ता भी क्यों याद नहीं कि अपनी राजनीतिक पार्टी का ऐलान करते ही अन्ना का जमा जमाया आंदोलन ठुस हो गया था. ये भी क्यों समझ नहीं है रामदेव को एक से एक सलाहकार साथ रखने के बावजूद कि भीड़ कभी सफलता का पैमाना नहीं होती. गारंटी तो कतई नहीं. भीड़ ही थी जिस ने अन्ना को आसमान पे बिठा दिया था और भीड़ ही है जो नहीं रही तो सिर्फ इस लिए अन्ना आंदोलन अपनी आत्महत्या तक पे आमादा हो गया....बड़ी सीधी सी बात है जब तक आप किसी भी सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक मुद्दे पे आंदोलन करते रहते हो तो भीड़ आ जाती है. उन लोगों की आपका मुद्दा जिन के दिल के करीब होता है. उन की भी जो चाहते तो वही हैं जो आप चाहते हैं, मगर उन के पास आप जैसे संसाधन नहीं होते कुछ कर सकने के लिए. उन की भी जिनका कोई लेना देना नहीं होता, मगर खड़े हो जाते हैं उत्सुकतावश या महज़ टाइम पास करने के लिए. इस के बावजूद जो भीड़ होती है, वो आती जाती रहती है. आधे भी लोग नहीं होते, सिवाय किसी मदारी के मजमे के, जो अंत तक जमे रह कर पूरा तमाशा देखते हैं. वो भी इस लिए नहीं कि तमाशा देख कर उन्हें उसे सीखना और घर जा के वही सब करना होता है. वो भी अपनी बस या गाडी निकल जाने का खतरा उठा कर भी अंत तक लोग देखते हैं तो इस लिए कि मदारी ने काले कपड़े के नीचे जो लड़की 'काट' के लिटा खी होती है, लोग जाने से पहले देख लेना चाहते हैं कि वो बची या मरी?


अन्ना या रामदेव की भीड़ में वो आखीर वाला कोई क्लाइमेक्स भी नहीं होता. इस लिए भीड़ आती है, चली जाती है, फिर और लोगों की आ जाती है. लगातार उधर बिना खाए, सोये, हगे, नहाए कोई नहीं पड़ा रहता चार चार दिन. बीच बीच में जा के कोई आ भी जाते हैं तो वो जो बाहर बड़ी दूर कहीं से आये होते हैं और उन के पास जाने का कोई और ठिकाना नहीं होता. वे भी तीसरे दिन तक अघाने लगते हैं. जीवनयापन के दस झंझट उन्हें सताने लगते हैं. इस बार दिल्ली जैसे बेरहम शहर की गर्मी, भूख, जान यहाँ, सामान वहां और उधर पीछे घर में बाप कहाँ की सज़ा लायक हालत उन्हें अगली बार आने की प्रेरणा नहीं देती. ऐसे में ये तो बहुत सही सोचा बाबा रामदेव ने कि जो करना, लेना, देना, कमाना, कहना है वो अभी कर लो. हंडिया काठ नहीं, मिट्टी की भी हो तो बार बार नहीं चढ़ती. इस बार इंतजाम भी उन के बहुत बेहतर थे. पढ़े लिखे लोगों की एक टीम भी. लंगर पानी का भी प्रबंध भी जिसने भी किया, था. कुछ तो पुलिस भी लट्ठ नहीं चलाना चाहती थी. कुछ बाबा भी संभल के चले. तैयारी, भाषण, कैसे भी मसाले के लिए हमेशा मचलते चैनल; सब कुछ था. सरकार भले भाव नहीं दे रही थी लेकिन मज़ा चखाने के मूड में भी नहीं थी. आंदोलन का समय भी बाबा ने बड़ा सही चुना था. अन्ना आंदोलन की सफलता, असफलता, हताशा, उपलब्धि के ठीक पीछे और संसद के अधिवेशन के बीच.


लेकिन बाबा ने भी वही गलती की जो अन्ना ने की थी. उस की बात करें उस से पहले उन की भी टीम की बात कर लें. अन्ना की टीम में केजरीवाल, किरण बेदी और कुमार विशवास जैसे बड़बोले लोग थे. तो बाबा की टीम में वैदिक जी और देवेन्द्र शर्मा जैसे संभल के बोलने वाले उन से कहीं ज्यादा बौद्धिक क्षमता वाले लोग. वैदिक जी भले ही कभी कुलदीप नैयर की तरह विद्वान, अरुण शोरी या प्रभाष जोशी की तरह उधेड़ू और कमलेश्वर की तरह किसी विचारधारा के पहरुए न भी रहे हों, लेकिन आम तौर पर शालीन, मृदु भाषी और लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान करने व्यक्ति रहे हैं. देवेन्द्र शर्मा को मैं ज्यादा अच्छे से जानता हूँ. इस लिए कि हम दोनों ही कभी इंडियन एक्सप्रेस संस्थान में एक साथ थे. और मुझे याद है कि आज से बच्चीस बरस पहले जब पर्यावरण पूरी दुनिया में कहीं किसी देश या यू.एन.ओ. तक के एजेंडे पे नहीं था, उन्होंने पार्थेनियम (कांग्रेस घास) के सारे महाद्वीप में बढ़ते खतरे पे एक बड़ी लेखमाला की थी. वे भी निहायत शालीन, सभ्य और सब से बड़ी बात कि बड़ी सकारात्मक सोच वाले इंसान हैं. मगर एक टौम (सलाहकार) ही काफी होता तो सभी गाडफादर न बन जाते? या एक मुकेश मिल जाने से सभी राजकपूर?

गाडफादर ने भी एक दिन उस टौम को त्याग दिया था और राजकपूर को भी राजकपूर किसी मुकेश, शंकर-जयकिशन, नर्गिस, लता या मनमोहन सिंह ने नहीं बनाया. सच तो ये है कि उस तरह से गाना गाना मुकेश को राजकपूर ने सिखाया. शंकर जयकिशन से वैसी धुनें भी उन्होंने ही बनवाईं. शैलेन्द्र और हसरत साहब भी वैसे गीत लिख सके तो इस लिए कि उन्हें बनवाने, गवाने और फिल्माने वाले राज साहब थे. मनमोहन सिंह को कैमरा वहां ले जाना ही पड़ता था जहां राजकपूर बिना बोले भी बहुत कुछ कह रहे होते थे. बाबा रामदेव वैदिक जी और देवेन्द्र शर्मा का साथ होने के बावजूद राजकपूर न हैं. न बन ही सकते हैं कभी. रामदेव बोलते बहुत ज्यादा, सोचते बहुत कम हैं. समझते तो और भी कम हैं. समझ उन में होती तो अपनी,अपने खर्चे पे टिकी, ठहरी, जैसे कहो वैसा ही कर रही, सौ फीसद अपनी स्वामिभक्त भीड़ उस सुब्रह्मनियम स्वामी के आगे परोस देने की ज़रूरत क्या थी जो पूरे देश में एक सांसद या विधायक क्या कहीं किसी पंचायत का एक सरपंच जिता सकने की हालत में नहीं हैं?

चार दिन तक चिल्ला चिल्ला कर कहते रहे आप कि कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं है आपका. नहीं था तो ये कहने की ज़रूरत क्या थी कि भैया कांग्रेस को नहीं जीतने देना. और चलो कहा भी तो कर ही दिखाना था अपने दम पर. शायद हार ही जाती वैसे भी कांग्रेस गुजरात में. आप जाते दस जगह भाषण करते और अरविंद केजरीवाल की तरह आ के डींग मार लेते कि हिसार में कांग्रेस को उन्होंने हराया है.

मेरी समझ से किसी भी आंदोलन को किसी भी दल, उस में चुनाव और उस में भी उस की हार या जीत से नहीं जोड़ देना चाहिए. किसी भी आंदोलन के मुद्दे खालिस गैर सियासी और उस से जुड़े लोग कई पार्टियों से जुड़े भी हो सकते हैं. लेकिन किसी भी एक पार्टी का नाम लेते ही सब से पहले तो आपके निशाने पे आई पार्टी के लोग ही अपनी पार्टी की तरफ भागते हैं. आंदोलन तो हो सकता है पांच दिन भी न चले. मगर अगले पांच साल की रोटी उन्हें चुनाव में झंडे, पोस्टर बना, चिपका के लानी होती है. और फिर आप के पास वो हथियार, हथकंडे भी नहीं होते जो चुनाव में इस्तेमाल होते ही हैं. आप सोचते हो कि फिर भी आप मुकाबला कर सकते हो फिर वहीं करने को क्यों कहते हो जहां मुझ जैसे अनाड़ी आदमी को भी लगता है कि कांग्रेस हारने ही वाली है. आप को लगता है कि पांच दिन के उपवास से सवा सौ साल के इतिहास वाली पार्टी को आप हरा, मिटा सकते हैं तो क्यों नहीं हिमाचल प्रदेश में जा के प्रयोग कर लेते आप? चले जाइए सारे के सारे लोग. अन्ना जैसे सफल, असफल और भी जितने हों देश में, सब को ले जाइए साथ. भाई, अगर आप ओलम्पिक में पंहुचे सुशील कुमार हैं तो ये नहीं कह सकते कि लड़ेंगे अपनी पसंद के पहलवान से और मेडल भी गोल्ड ले के जायेंगे. राजनीति अब आप को करनी है तो दिल्ली से ही क्यों, हिमाचल से क्यों नहीं?


अन्ना आंदोलन की असफलता और फिर उन की टीम में पार्टी बनाने, न बनाने की छिड़ी बेतुकी बहस के बाद आप से बहुत उम्मीद थी बाबा रामदेव. इस लिए भी कि बालकृष्ण की गिरफ्तारी को लेकर आप के दिल को लगी भी हुई थी. दस बीस हज़ार लोगों की भीड़ को कहीं और कितने ही दिन भोजन पानी दे सकने की क्षमता भी है आप में. अभी तो चैनल वाले भी वैसे नहीं ठोकते आप को जैसे अन्ना और उन की टीम को ठोकते हैं. कोई राम सेना भी पीछे नहीं पड़ी आप के जैसे प्रशांत भूषन के पीछे पड़ गई थी. कितने ही शहरों में, कितने ही बंदे भले पे रोल पे रखने पड़ें, कोई दिक्कत नहीं आपको. कहीं से चंदा न भी मिले तो अपनी ही धन, कमाई, बरकत बहुत है. मगर अब आप ने भी नेताओं के साथ हाथ मिला के किया वही है जो अन्ना ने किया. उन ने तो फिर अपनी पार्टी बनाने की बात की. आपने तो बनाई भी नहीं और भाजपा की गोदी में समा गए.

पर, चलो. कोई बात नहीं. कई बार मूर्खों के पास भी कोई न कोई न फार्मूला होता है. अब पूरी तरह नंगे हो के जब चुनावी राजनीति करने का ऐलान कर ही दिया है तो इतना तो बता दो चुनाव भाजपा के साथ मिल के लड़ोगे या अकेले अकेले. और अगर मिल के लड़ोगे तो बिहार में किस के साथ मिल के लड़ोगे, भाजपा के या जदयू के? और आन्ध्र में भाजपा के या तेलुगु देशम के? ...होने को सवाल तो ये भी है कि अगर कांग्रेस भ्रष्ट है तो फिर येदुरप्पा वाली भाजपा क्या है...मगर ये सवाल मैं नहीं पूछूंगा. वरना पलट के पूछोगे कि अन्ना हूँ, रामदेव हूँ, मैं क्या हूँ? राजनीति क्यों कर रहा हूँ मैं? क्यों तुला हूँ अपनी विश्वसनीयता खो कर एक पत्रकार के रूप में आत्महत्या कर लेने पर?

sabhar- journalistcommunity.com

और अब रामदेव की दसवीं (दानिया) और अब रामदेव की दसवीं (दानिया) Reviewed by Sushil Gangwar on August 14, 2012 Rating: 5

No comments